Loudspeaker Row: भारत में क्या हैं लाउडस्पीकर इस्तेमाल करने के नियम, अदालतों ने 'शोर' को लेकर दिए कैसे निर्देश?

Loudspeaker Row: लाउडस्पीकर के इस्तेमाल से ध्वनि (Noise) पैदा होती है। इस आवाज को एक सीम के बाद, संभावित स्वास्थ्य खतरे के रूप में माना गया है

अपडेटेड Apr 19, 2022 पर 2:22 PM
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Loudspeaker Row: भारत में क्या हैं लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के नियम (FILE PHOTO)

Loudspeaker Row: भारत में लाउडस्पीकर (Loudspeaker) का मुद्दा गर्म होता जा रहा है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के प्रमुख राज ठाकरे (Raj Thackeray) की तरफ से मस्जिदों पर लाउडस्पीकर (Masjid Loudspeaker) के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के आह्वान के बाद, महाराष्ट्र सरकार राज्य में स्पीकर के इस्तेमाल पर निर्देश जारी करने के लिए आज बैठक करने वाली है।

इस विवाद के मद्देनजर दिल्ली, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और उत्तराखंड समेत कई राज्यों में हनुमान जयंती उत्सव के आसपास सांप्रदायिक हिंसा हुईं। गुजरात और कर्नाटक में और भी दूसरी सांप्रदायिक झड़पें देखी गईं हैं।

जैसे-जैसे इस मुद्दे पर बहस बढ़ रही है, ऐसे में यह जानना जरूरी हो गया है कि भारत में लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल के नियम आखिर क्या हैं?


क्य कहते हैं शोर और प्रदूषक कानून?

लाउडस्पीकर के इस्तेमाल से ध्वनि (Noise) पैदा होती है। इस आवाज को एक सीम के बाद, संभावित स्वास्थ्य और संचार खतरे के रूप में माना गया है, जिसका असर हमारे कानों पर पड़ता है।

यहां एक अंतर समझना जरूरी है कि संगीत वह ध्वनि है, जो सुनने वालों को खुश करती है, जबकि शोर वो है, जिसके कारण सुनने वाले को दर्द और झुंझलाहट हो सकती है। यह भी संभव है कि एक व्यक्ति के लिए, जो संगीत है, वह दूसरे के लिए शोर भी हो सकता है। वायु (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम 1981 की धारा 2(A) में शोर को 'वायु प्रदूषक' (Air Pollutant) बताया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि धारा 2(A) के अनुसार, "वायु प्रदूषक" कोई भी ठोस, तरल या गैसीय पदार्थ है, जिसमें शोर भी शामिल है, जो वातावरण में ऐसी सांद्रता में मौजूद है, जो मनुष्यों, अन्य जीवित प्राणियों, पौधों, संपत्ति या पर्यावरण के लिए हानिकारक है या हो सकता है।

ध्वनि प्रदूषण और शोर, दोनों को अलग तरह से परिभाषित किया गया है। शोर को "एक ऐसी ध्वनि" के रूप में परिभाषित किया गया है, जो कठोर, अप्रिय और ऐसी कोई भी आवाज हो। वहीं प्रदूषण वो है, जब किसी एक विशेष क्षेत्र में शोर की बहुत ज्यादा मात्रा या कानों को न सहने वाली आवाज हो। उदाहरण के तौर पर ट्रैफिक का शोर या हवाई जहाज के इंजन की आवाज।

CPCB और 'ध्वनि' की तय सीमा

CPCB ने अलग-अलग क्षेत्रों के लिए भारत में शोर का लेवल तय किया है। ध्वनि प्रदूषण के नियमों में विभिन्न क्षेत्रों में दिन और रात दोनों के लिए ध्वनि की सीमा तय की गई है।

औद्योगिक क्षेत्रों में तय सीमा दिन के दौरान 75 dB और रात में 70 dB है। रिपोर्ट के अनुसार, दिन और रात के दौरान, कमर्शियल एरिया में यह 65 dB और 55 dB और आवासीय क्षेत्रों में 55 dB और 45 dB तक है।

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पर्यावरण (संरक्षण) नियम, 1986 में मोटर वाहनों, एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, डीजल जनरेटर और कुछ प्रकार के निर्माण उपकरणों के लिए शोर मानक भी शामिल हैं। इसमें डीजल जनरेटर सेट का इस्तेमाल करते समय ध्वनि प्रदूषण मानदंडों का उल्लंघन करने पर सेट को सील किया जा सकता है और सेट के आकार के आधार पर 10,000 रुपए से 100,000 रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

शोर करने वाले निर्माण उपकरण से जुड़े नियमों के उल्लंघन पर 50,000 रुपए का जुर्माना और साथ ही उपकरण को जब्त या सील किया जा सकता है।

लाउडस्पीकरों पर कोर्ट ने क्या दिए आदेश?

सुप्रीम कोर्ट का जून 2005 का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने रात 10 बजे के बीच सार्वजनिक स्थानों पर लाउडस्पीकर और म्यूजिक सिस्टम के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने जुलाई 2005 में सुबह 6 बजे (पब्लिक इमरजेंसी को छोड़कर), ऐसे क्षेत्रों में रहने वालों के स्वास्थ्य पर ध्वनि प्रदूषण के गंभीर प्रभावों का हवाला दिया था।

उत्सव पर SC का आदेश

28 अक्टूबर, 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि साल में 15 दिन उत्सव के मौकों पर आधी रात तक लाउडस्पीकर का इस्तेमाल किया जा सकता है। India Today की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन अध्यक्ष आरसी लाहोटी और जस्टिस अशोक भान की एक बैंच ने एक वैधानिक नियम की संवैधानिकता को बरकरार रखा, जिसमें राज्यों को उत्सव और धार्मिक अवसरों पर आधी रात तक लाउडस्पीकर के इस्तेमाल समेत ध्वनि प्रदूषण मानदंडों में ढील दी गई थी।

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