गूगल (Google) को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) से भी राहत नहीं मिली। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने एंड्रॉयड के दबदबे के दुरुपयोग को लेकर गूगल पर 1338 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। गूगल को यह पेनाल्टी भरने के लिए 30 दिनों का समय दिया गया है। हालांकि टेक सेक्टर की दिग्गज कंपनी के पास अभी भी सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती देने का मौका है। ट्रिब्यूनल ने सुनवाई के दौरान गूगल की इस दलील को खारिज कर दिया कि सीसीआई ने फैसले में किसी प्रकार का पक्षपात किया है।
एनसीएलएटी ने कहा कि स्मार्टफोन कंपनियों को गूगल अपने 11 ऐप्स को प्री-इंस्टॉल करने के लिए कहती है जो अनुचित कारोबारी तरीका है। ट्रिब्यूनल ने यह माना है कि गूगल वास्तव में कंपनियों को अपना खुद का एंड्रॉयड वर्जन (Android Forks) डेवलप करने से रोकती है और इसके लिए वह एंटी फ्रैग्मेंटेशन एग्रीमेंट (AFA) का इस्तेमाल करती है।
Google के पक्ष में भी रहे कुछ निर्देश
एनसीएलएटी ने सीसीआई के चार आदेश को रद्द कर दिया है। जब यूजर्स सीधे वेबसाइट से या किसी अज्ञात स्रोत से ऐप डाउनलोड यानी साइडलोडिंग करते हैं तो उन्हें चेतावनी भेजने में गूगल ने पक्षपात नहीं किया। गूगल को अपना स्वामित्व ऐप प्रोग्राम इंटरफेस (API) थर्ड पार्टी के साथ साझा करने की जरूरत नहीं है। वायरस से बचने के लिए गूगल ने अपने प्ले स्टोर पर थर्ड पार्टी ऐप स्टोर्स की अनुमति नहीं दी, ट्रिब्यूनल के मुताबिक गूगल ने यह सही किया है। इसके अलावा ट्रिब्यूनल इस बात पर सहमत दिखी कि एंड्रॉयड फोन पर गूगल अपने सुइट ऐप्स को अनइंस्टॉल करने से रोक सकता है।
करीब पांच साल पहले 2018 में एंड्रॉयड यूजर्स सीसीआई के पास पहुंचे और आरोप लगाया कि गूगल मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम से जुड़े मार्केट में अपने दबदबे का गलत इस्तेमाल कर रही है जो कॉम्पटीशन एक्ट के प्रावधानों का उल्लघंन है। उन्होंने गूगल की MADA पॉलिसी को अनुचित बताया। इस पॉलिसी के तहत गूगल स्मार्टफोन कंपनियों को अपने हैंडसेट में गूगल मोबाइल सर्विसेज सुइट यानी इसके ऐप को प्री-इंस्टॉल करने को कहता है।
जांच के बाद सीसीआई ने 20 अक्टूबर 2022 को सीसीआई ने इस पर 1338 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया और अनुचित कारोबारी गतिविधियों को रोकने को भी कहा। इस फैसले के खिलाफ गूगल जनवरी में एनसीएलएटी चली गई लेकिन तत्काल राहत नहीं मिली तो यह सुप्रीम कोर्ट चली गई। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसमें हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया लेकिन एनसीएलएटी को इस फैसले पर 31 मार्च तक फैसला सुनाने का निर्देश दिया था। एनसीएलएटी ने इस मामले की सुनवाई 15 फरवरी से शुरू की थी।