Sedition Law: भगत सिंह, गांधी और नेहरू जैसी कई बड़ी हस्तियों पर दर्ज हुआ मुकदमा, जानें क्या है ब्रिटिश काल से चला आ रहा ये राजद्रोह कानून
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि उसने उचित फोरम की तरफ से राजद्रोह जुड़े कानून का दोबारा से विचार करने का फैसला किया है। आइए जानतें है राजद्रोह कानून का इतिहास
क्या है ब्रिटिश काल से चला आ रहा ये राजद्रोह कानून (FILE PHOTO)
Sedition Law Explained: देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट (SC) ने बुधवार को एक बेहद ही अहम आदेश पारित किया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि राजद्रोह कानून (Sedition Law) पर दोबारा विचार और फिर से जांच पूरी होने तक, IPC की धारा 124A के तहत कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि यह प्रक्रिया पूरी होने तक इस कानून के तहत पहले से मुकदमों का सामने कर रहे आरोपी भी जमानत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
दरअसल केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि उसने उचित फोरम की तरफ से राजद्रोह जुड़े कानून का दोबारा से विचार करने का फैसला किया है। सरकार ने अदालत से यह अनुरोध भी किया कि वह राजद्रोह के दंडनीय कानून की संवैधानिक वैधता का अध्ययन करने में समय नहीं लगाए।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने शीर्ष अदालत में दायर एक हलफनामे में कहा कि उसका निर्णय औपनिवेशिक चीजों से छुटकारा पाने के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विचारों के अनुरूप है। पीएम मोदी नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के सम्मान के पक्षधर रहे हैं। इसी भावना से 1,500 से ज्यादा अप्रचलित हो चुके कानूनों को खत्म कर दिया गया है।
ये सब वे जानकारी थी, जिसके कारण राजद्रोह कानून वर्तमान में चर्चाओं में हैं। अभी एक नजर डालते हैं, इस कानून के एतिहासिक पहलू पर। साथ ही विस्तार से जानते हैं, आखिर इस कानून को 'औपनिवेशिक काल' का कानून क्यों कहा जाता है।
राजद्रोह कानून क्या है?
1837 में ब्रिटिश इतिहासकार-राजनेता थॉमस बबिंगटन मैकाले की तरफ से इसे तैयार किया गया था। राजद्रोह को एक अधिनियम के रूप में परिभाषित किया गया था। इसके तहत, कोई भी ऐसी बात, जो लिखित, मौखिक या संकेतों के जरिए, भारत में कानूनी रूप से बनी सरकार के प्रति अवमानना, असंतोष या द्वेष पैदा करती हो, उसे राजद्रोह माना जाएगा।
राजद्रोह कानून का इस्तेमाल आजादी से पहले ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार प्रमुख भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के लेखन और भाषणों को दबाने के लिए किया करती थी। इस कानून को 1870 में भारतीय दंड संहिता की धारा 124 A में शामिल किया गया था।
महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक और जोगेंद्र चंद्र बोस जैसे नेताओं के लेखन को दबा दिया गया। ब्रिटिश शासन पर उनके बयानों के लिए राजद्रोह कानून के तहत उन पर मुकदमा चलाया गया। शहीद भगत सिंह और जवाहर लाल नेहरू समेत और भी कई बड़े तमाम स्वतंत्रता सेनानियों और नेताओं के खिलाफ अंग्रेजों ने इस कानून का बेजा इस्तेमाल किया।
धारा 124A के अनुसार, राजद्रोह एक गैर-जमानती अपराध है। इसमें तीन साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा और साथ ही जुर्माने का भी प्रावधान है। इस कानून के तहत आरोपि व्यक्ति को सरकारी नौकरी पाने से भी रोक दिया जाता है और उसका पासपोर्ट सरकार जब्त भी सकती है। संयोग से यूनाइटेड किंगडम ने 2010 में राजद्रोह के आरोप को खत्म कर दिया था।
राजद्रोह पर क्या कहता है विधि आयोग?
भारत के विधि आयोग की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, संविधान बनाते समय, संविधान सभा ने तत्कालीन अनुच्छेद 13 के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध के रूप में राजद्रोह को शामिल करने का विरोध किया था। संविधान सभा ने उस प्रावधान को औपनिवेशिक काल का काला साया माना। हालांकि, IPC की धारा 124A के तहत यह अपराध बना रहा।
रिपोर्ट का निष्कर्ष कहता है, “लोकतंत्र में एक ही गीत की किताब से गाना देशभक्ति का पैमाना नहीं है। लोगों को अपने तरीके से अपने देश के प्रति अपना प्रेम दिखाने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। ऐसा करने के लिए, सरकार की नीति में खामियों की ओर इशारा करते हुए, रचनात्मक आलोचना या बहस हो सकती है। इस तरह के विचारों में कुछ भावनाएं कठोर और अप्रिय हो सकती है, लेकिन इससे उन्हें देशद्रोही नहीं कहा जा सकता है।"
इसने कहा कि धारा 124A को केवल उन मामलों में लागू किया जाना चाहिए, जहां किसी भी काम के पीछे का इरादा सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करना या सरकार को हिंसा और अवैध तरीकों से उखाड़ फेंकना है।
आयोग का सुझाव है कि IPC (Sedition) की धारा 124 A बनी रहनी चाहिए। हालांकि, इस बात की जांच की जानी चाहिए कि क्या 'राजद्रो' शब्द को किसी दूसरे शब्द से बदला जा सकता है।
रिपोर्ट में राजद्रोह और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के बीच संतुलन बनाने, राजद्रोह के आरोप के दुरुपयोग के खिलाफ सुरक्षा उपाय बनाने का भी आग्रह किया गया है।
संसद में कब और कैसे उठा ये मुद्दा?
साल 2011 में, CPI सांसद डी राजा ने राज्यसभा में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया, जिसमें प्रस्ताव किया गया कि IPC की धारा 124A IPC को खत्म कर देना। मगर ये बिल पारित नहीं हो पाया।
इसके बाद 2015 में, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने लोकसभा में IPC की धारा 124 A में संशोधन करने के लिए एक निजी सदस्य विधेयक पेश किया। इसमें केवल उन कामों / शब्दों को शामिल किया गया, जो सीधे हिंसा या हिंसा के लिए उकसाने के कारण 'देशद्रोह' की कैटेगरी में आते हैं।
देश में राजद्रोह के कितने मामले?
2020 के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में देशद्रोह के 70 मामले दर्ज किए गए। हालांकि, एक भी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया गया था।
इसी तरह 2019 में 93 मामले दर्ज किए गए, जबकि केवल दो को ही दोषी पाया गया। इसी तरह 2020 में 73 मामले दर्ज किए गए और किसी पर भी देशद्रोह का आरोप साबित नहीं हो पाया।
मणिपुर ने 2020 में सबसे ज्यादा राजद्रोह के मामले (15), उसके बाद असम (12), कर्नाटक (9), उत्तर प्रदेश (7), हरियाणा (6) और दिल्ली (5) दर्ज किए।