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नेचुरल फार्मिंग की चुनौतियों से निपटने के लिए ठोस तैयारी जरूरी

2019-20 के आम बजट में पहली बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने ‘जीरो बजट खेती’ को सरकारी प्राथमिकता में शामिल करने की घोषणा की तो ऐसा लगा कि अब शायद इस क्षेत्र में कुछ विशेष प्रगति देखने को मिल सकती है। लेकिन वास्तविकता यह है कि बीते दो वर्षों में सरकार की ओर से नीतिगत तौर पर शायद ही जीरो बजट खेती या जैविक खेती या प्राकृतिक खेती जैसे मॉडलों की दिशा में कोई गंभीर प्रयास किया गया है

Bhuwan Bhaskarअपडेटेड Jul 11, 2022 पर 7:49 AM
नेचुरल फार्मिंग की चुनौतियों से निपटने के लिए ठोस तैयारी जरूरी
प्राकृतिक और जैविक खेती के प्रति वकालत को भी भावनात्मक स्तर से आगे ले जाकर नीतिगत समर्थन दिए जाने की जरूरत है

भुवन भास्कर

प्राकृतिक खेती या नेचुरल फार्मिंग का क्रेज दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। यह अलग बात है कि इस मॉडल से होने वाली खेती की राह में चुनौतियों की भरमार है और इसलिए कई विशेषज्ञ इसे भारत जैसे देश के लिए, जहां खेती की नीति बनाने में खाद्य सुरक्षा सबसे शीर्ष पर होती है, एक अव्यावहारिक अवधारणा मानते हैं।

लेकिन 2019-20 के लिए पेश मोदी सरकार 2.0 के पहले आम बजट में पहली बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने ‘जीरो बजट खेती’ को सरकारी प्राथमिकता में शामिल करने की घोषणा की तो ऐसा लगा कि अब शायद इस क्षेत्र में कुछ विशेष प्रगति देखने को मिल सकती है। लेकिन वास्तविकता यह है कि बीते दो वर्षों में सरकार की ओर से नीतिगत तौर पर शायद ही जीरो बजट खेती या जैविक खेती या प्राकृतिक खेती जैसे मॉडलों की दिशा में कोई गंभीर प्रयास किया गया है।

इस लिहाज से रविवार 10 जुलाई को गुजरात के सूरत में आयोजित नेचुरल फार्मिंग कॉनक्लेव एक महत्वपूर्ण सरकारी हस्तक्षेप कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे संबोधित करते हुए प्राकृतिक खेती को भारत का भविष्य बताया। लेकिन प्रधानमंत्री के भाषण से भी ज्यादा महत्वपूर्ण इस कॉनक्लेव की पृष्ठभूमि है।

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