भुवन भास्कर

भुवन भास्कर
प्राकृतिक खेती या नेचुरल फार्मिंग का क्रेज दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। यह अलग बात है कि इस मॉडल से होने वाली खेती की राह में चुनौतियों की भरमार है और इसलिए कई विशेषज्ञ इसे भारत जैसे देश के लिए, जहां खेती की नीति बनाने में खाद्य सुरक्षा सबसे शीर्ष पर होती है, एक अव्यावहारिक अवधारणा मानते हैं।
लेकिन 2019-20 के लिए पेश मोदी सरकार 2.0 के पहले आम बजट में पहली बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने ‘जीरो बजट खेती’ को सरकारी प्राथमिकता में शामिल करने की घोषणा की तो ऐसा लगा कि अब शायद इस क्षेत्र में कुछ विशेष प्रगति देखने को मिल सकती है। लेकिन वास्तविकता यह है कि बीते दो वर्षों में सरकार की ओर से नीतिगत तौर पर शायद ही जीरो बजट खेती या जैविक खेती या प्राकृतिक खेती जैसे मॉडलों की दिशा में कोई गंभीर प्रयास किया गया है।
इस लिहाज से रविवार 10 जुलाई को गुजरात के सूरत में आयोजित नेचुरल फार्मिंग कॉनक्लेव एक महत्वपूर्ण सरकारी हस्तक्षेप कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे संबोधित करते हुए प्राकृतिक खेती को भारत का भविष्य बताया। लेकिन प्रधानमंत्री के भाषण से भी ज्यादा महत्वपूर्ण इस कॉनक्लेव की पृष्ठभूमि है।
दरअसल मोदी ने मार्च 2022 में गुजरात पंचायत महासम्मेलन के दौरान अपने भाषण में कहा था कि हर गांव में कम से कम 75 किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाना चाहिए। इसी के बाद सूरत जिले में किसान संगठनों, चुने हुए प्रतिनिधियों, सहकारी समितियों, बैंकों और कृषि उत्पाद विपणन समितियों (APMC) को प्राकृतिक खेती से जुड़े विभिन्न पहलुओं के प्रति जागरूक करने का काम शुरू हुआ। किसानों को 90 क्लस्टरों में प्रशिक्षित किया गया और इस तरह सिर्फ 3 महीनों में सूरत जिले के 41,000 किसानों को प्राकृतिक खेती में प्रशिक्षित कर दिया गया।
रविवार को आयोजित कॉनक्लेव दरअसल सूरत जिले के इन सब भागीदारों का एक जलसा था। प्राकृतिक खेती कार्यक्रम की शुरुआत के लिहाज से इस कॉनक्लेव को पूरी तरह सफल कहा जा सकता है। लेकिन पूरे कार्यक्रम के लिए यही तमगा देने में अभी कुछ वर्षों की प्रतीक्षा करनी होगी। दरअसल नरेंद्र मोदी ने इस कॉनक्लेव में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई उत्साहजनक बातें कहीं।
लेकिन यह समझने की जरूरत है कि बड़े पैमाने पर भारतीय किसानों को प्राकृतिक खेती के पाले में करने के लिए प्रेरक शब्दों से आगे भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। लेकिन इससे पहले कि हम यह समझे कि क्या कुछ करने की जरूरत है, पहले यह समझना जरूरी है कि प्राकृतिक खेती है क्या और क्यों सरकार का फोकस इस पर लगातार बढ़ रहा है।
दरअसल जैविक खेती पहले ही बहुत लोकप्रिय हो चुकी है, लेकिन प्राकृतिक खेती और जैविक खेती दो भिन्न मॉडल हैं। जैविक खेती में जहां खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल होता है, भले ही वे जैविक विधि से तैयार किए गये हों, वहीं प्राकृतिक खेती में किसी भी कृत्रिम उपाय से न तो कीट मारे जाते हैं और न ही जैविक खाद डाला जाता है।
प्राकृतिक खेती में किसान पूरी तरह कुदरती उपायों का सहारा लेकर खेती करता है, जैसे अव्वल तो कीटनाशकों का प्रयोग किया ही नहीं जाता, और यदि करना ही पड़े तो प्राकृतिक तरीके से उसे तैयार किया जाता है, जैसे दही, शहद इत्यादि का प्रयोग कर। उसी तरह खाद में भी गाय के गोबर, सूखे पत्तों, ढैंचा और केंचुए से तैयार खाद का ही इस्तेमाल किया जाता है।
सवाल यह है कि सरकार को एकाएक प्राकृतिक खेती और जैविक खेती जैसे वैकल्पिक खेती मॉडलों की याद क्यों आने लगी है?
जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया की खेती और खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन कर उभर रहा है। जलवायु परिवर्तन के लिए अंतरसरकारी पैनल (IPCC) के मुताबिक इस सदी के उत्तरार्द्ध में धरती की सतह का तापमान औसतन 0.4 से 2.6 डिग्री तक बढ़ सकता है। कृषि इस पूरे चक्र में न सिर्फ सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली है, बल्कि इस परिस्थिति को पैदा करने वाले कारणों में कृषि की भूमिका प्रमुख है। कृषि और भोजन उत्पादन प्रक्रिया बड़े पैमाने पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन करते हैं और इसलिए जलवायु परिवर्तन की गति को और तेज करते हैं। दूसरी ओर, जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पादन घटता है और खाद्य सुरक्षा को खतरा बढ़ता जाता है।
चावल, गेहूं, मक्का और सोयाबीन इंसानी जरूरत का दो-तिहाई कैलोरी प्रदान करते हैं। लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के असर से बचने के लिए इन फसलों में CO2 फर्टिलाइजेशन, प्रभावी अनुकूलन और जेनेटिक सुधार की जरूरत होगी, और यदि ये न किए गए तो तापमान में हर डिग्री की बढ़ोतरी के साथ गेहूं की यील्ड में 6%, धान में 3.2%, मक्के में 7.4% और सोयाबीन में 3.1% की कमी आएगी। प्राकृतिक खेती जलवायु परिवर्तन के इस खतरे को दोनों ही तरफ से कम करती है। एक तरफ तो रासायनिक खादों का प्रयोग न होने से ग्रीन हाउस उत्सर्जन न्यूनतम स्तर पर आ जाता है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति के साथ मिलकर खेती करने से प्रभावी अनुकूलन में मदद मिलती है।
जलवायु परिवर्तन तो एक वैश्विक परिस्थिति है। लेकिन इसके अलावा भारत के संदर्भ में पिछले 50 सालों में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल, और भूजल के बेहिसाब शोषण ने खेती के पारिस्थितिक तंत्र के लिए असाधारण खतरा पैदा कर दिया है। पंजाब और दिल्ली जैसे कुछ राज्यों में तो भूजल स्तर पूरी तरह खत्म होने की कगार पर पहुंच चुका है, वहीं पूरे देश में ऐसे जिले या क्षेत्र बन गए हैं, जहां भूजल के लिए किसानों को 600-1000 फुट तक नीचे जाना पड़ता है। इससे खेती की लागत बढ़ रही है। रासायनिक खादों और कीटनाशकों के बेहिसाब प्रयोग ने कई जगहों पर भूजल को जहरीला बना दिया है। ये सारी परिस्थितियां मिलकर भारत में खेती का भविष्य अनिश्चित बना रही हैं।
प्राकृतिक या जैविक खेती इन्हीं परिस्थितियों को वापस पटरी पर लाने का उपाय है, जिसके लिए अब सरकार गंभीर हो रही है। लेकिन यह गंभीरता सिर्फ शब्दों, नारों या संपादकीय पृष्ठों पर लाने से कुछ नहीं होगा। क्योंकि 130 करोड़ लोगों का पेट भरने और उन्हें आवश्यक पोषक तत्वों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सरकार को दो मोर्चों पर तैयारी करनी होगी।
यह सच है कि जैविक और प्राकृतिक खेती में खेतों की उत्पादकता सामान्य होने से पहले थोड़ी घटती है। बाद में यह उत्पादकता फिर बढ़ती है, लेकिन लागत में जबर्दस्त कमी आ जाती है। यानी कुल मिलाकर यह किसानों के लिए फायदे का सौदा है। फिर भी, अगले 15-20 सालों तक, जब तक प्राकृतिक या जैविक खेती कुल खेती में कम से कम 50% हिस्सेदारी न ले ले, सरकार को इन उत्पादों के बाजार की व्यवस्था करनी होगी।
इसके साथ ही सरकार को प्राकृतिक खेती के लिए जरूरी इनपुट को सुलभ बनाने के लिए कुछ उसी तरह का सिस्टम तैयार करना होगा, जैसा कि अभी रासायनिक खादों के लिए है। एक तरफ तो यूरिया और DAP पर भारी सब्सिडी दी जाए, और दूसरी ओर किसानों को जैविक और प्राकृतिक खेती पर शिफ्ट होने को कहा जाए, तो ऐसे नीतिगत भ्रम का परिणाम अच्छा नहीं हो सकता।
सार संक्षेप यह है कि किसान के लिए खेती को मुनाफे का धंधा बनाए बिना कोई भी मॉडल लोकप्रिय नहीं हो सकता और यह मुनाफे का धंधा तब तक नहीं बन सकता जब तक उत्पादन में वृद्धि और लागत में कमी न सुनिश्चित हो जाए। प्राकृतिक और जैविक खेती के प्रति वकालत को भी भावनात्मक स्तर से आगे ले जाकर नीतिगत समर्थन दिए जाने की जरूरत है।
(लेखक कृषि मामलों के जानकार हैं)
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