SME IPOs ने लिस्टिंग पर दिए जबरदस्त रिटर्न, लेकिन लंबी अवधि में निकले 'फुस्स'

SME IPOs: छोटी और मझोली कंपनियों (SME) के आईपीओ हाल के सालों में निवेशकों के बीच जबरदस्त चर्चा का विषय रहे हैं। इन छोटे आईपीओ ने लिस्टिंग के दिन निवेशकों को शानदार रिटर्न तो दिए, लेकिन लंबी अवधि में इनका प्रदर्शन टिकाऊ नहीं रहा। ऐसा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नई स्टडी रिपोर्ट में सामने आया है

अपडेटेड Oct 22, 2025 पर 3:12 PM
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SME IPOs: सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने SME IPO सेगमेंट में कई नियामकीय कदम उठाए हैं

SME IPOs: छोटी और मझोली कंपनियों (SME) के आईपीओ हाल के सालों में निवेशकों के बीच जबरदस्त चर्चा का विषय रहे हैं। इन छोटे आईपीओ ने लिस्टिंग के दिन निवेशकों को शानदार रिटर्न तो दिए, लेकिन लंबी अवधि में इनका प्रदर्शन टिकाऊ नहीं रहा। ऐसा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नई स्टडी रिपोर्ट में सामने आया है।

इस रिपोर्ट को RBI के अर्थशास्री भाग्यश्री चट्टोपाध्याय और श्रोमोना गांगुली ने मिलकर तैयार किया गया है। इस रिपोर्ट में देश की छोटी और मझोली कंपनियों के आईपीओ के जरिए पैसे जुटाने की प्रक्रिया और उससे जुड़े ट्रेंड का अध्ययन किया गया है। इस रिपोर्ट में वित्त वर्ष 20224 और 20225 में लिस्ट हुईं SME कंपनियों के शेयरों का अध्ययन किया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कई SME कंपनियों के आईपीओ ने लिस्टिंग के दिन निवेशकों को शानदार रिटर्न दिया। लेकिन लिस्टिंग के बाद उनका प्रदर्शन बेहद अस्थिर और उतार-चढ़ावा वाला रहा है। RBI की इस रिपोर्ट में SME और मेनबोर्ड के जरिए लिस्ट होने IPOs के रिटर्न की चार अवधियों में तुलना की गई है। एक सप्ताह, एक महीना, तीन महीना और छह महीना।


इस तुलना में यह पाया गया कि पहले सप्ताह में दोनों सेगमेंट के रिटर्न लगभग शून्य के आसपास रहते हैं,लेकिन SME IPOs में अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। वहीं एक महीने के बाद कुछ SME कंपनियां बेहद ऊंचे रिटर्न देती हैं, जबकि बाकी में गिरावट आती है।

तीन महीने की अवधि में मेनबोर्ड IPOs का प्रदर्शन स्थिर रहता है, जबकि SME IPOs में कुछ मामलों में बेहद ही अधिक रिटर्न देखने को मिलते हैं। हालांकि छह महीने बाद मेनबोर्ड कंपनियां सीमित लेकिन स्थिर रिटर्न दिखाती हैं। वहीं SME IPOs में कई शेयर शून्य या नेगेटिव रिटर्न तक पहुंच जाते हैं।

रिटेल निवेशकों की भीड़ और ओवरवैल्यूएशन की समस्या

रिपोर्ट के मुताबिक, SME शेयरों में रिटेल निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी से लिस्टिंग के समय कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ जाती हैं। सीमित संख्या में शेयरों का आवंटन और अधिक मांग के चलते प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेशियो कई बार इंडस्ट्री औसत से बहुत ऊपर पहुंच जाता है।

वित्त वर्ष 2024 और वित्त वर्ष 2025 में लिस्टेड 100 SME IPOs में से लगभग 20% शेयरों के वैल्यूएशन अपने इंडस्ट्री औसत से काफी अधिक पाए गए। RBI के मुताबिक, निवेशक तुरंत लाभ कमाने की उम्मीद में अक्सर कंपनियों की फंडामेंटल्स और वित्तीय सेहत को नजरअंदाज कर देते हैं।

SEBI की सख्ती, नए नियमों की तैयारी

ऐसी अस्थिरता और सट्टेबाजी को देखते हुए सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने SME IPO सेगमेंट में कई नियामकीय कदम उठाए हैं। इनका उद्देश्य कीमतों में स्थिरता लाना और यह सुनिश्चित करना है कि कंपनियों का वैल्यूएशन उनके वास्तविक बिजनेस प्रदर्शन से मेल खाए।

युवा निवेशक बढ़ा रहे हैं जोखिम

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि युवा निवेशकों की बढ़ती भागीदारी SME शेयरों में अस्थिरता को और बढ़ा रही है। NSE के आंकड़ों के मुताबिक, 30 साल से कम उम्र के निवेशकों की हिस्सेदारी अब 39% तक पहुंच चुकी है, जबकि साल 2019 में यह आंकड़ा 22.6% थी। निवेशकों की औसत आयु अब घटकर 33 वर्ष रह गई है। डिजिटल फ्रेंडली युवाओं की तेजी से बढ़ती भागीदारी और लॉक-इन नियमों की अनुपस्थिति ने SME शेयरों में सट्टा व्यवहार को बढ़ावा दिया है।

महाराष्ट्र और गुजरात में SME लिस्टिंग का दबदबा

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो वित्त वर्षों में महाराष्ट्र SME लिस्टिंग्स में सबसे आगे रहा, उसके बाद गुजरात और दिल्ली का स्थान रहा। इन राज्यों की मजबूत इंडस्ट्रियल बुनियाद, डायवर्सिफाइड व्यापारिक ढांचा और राज्य सरकार की सहायक नीतियां इस सफलता का कारण हैं। तमिलनाडु और गुजरात जैसे राज्य अब SME फंडरेजिंग को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं भी चला रहे हैं, जिससे उद्यमशीलता और औपचारिक अर्थव्यवस्था को बल मिल रहा है।

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