Lok Sabha Elections 2024: सही उम्मीदवारों का चयन, साथी दल भी न हो नाराज, फिलहाल कुछ ऐसी चुनौतियों से निपट रही BJP

Lok Sabha Elections 2024: राज्य में चार ऐसी सीट हैं, जहां पर पार्टी क्या निर्णय करती है, उस पर सभी की निगाह लगी हुई है। इनमें से एक सीट पीलीभीत है, जहां से बीजेपी के टिकट पर नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य और मेनका गांधी के बेटे वरुण गांधी चुनाव लड़े थे और जीते भी थे। दूसरी है सुल्तानपुर, यहां से खुद मेनका गांधी चुनाव लड़ी और जीती भी थीं। तीसरी सीट है बदायूं

अपडेटेड Feb 22, 2024 पर 5:21 PM
Lok Sabha Elections 2024: भारतीय जनता पार्टी की नजर इस बार रायबरेली लोकसभा सीट की पर भी है

साल 2019 के लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2024) में भारतीय जनता पार्टी (BJP) उत्तर प्रदेश की 16 सीटों पर चुनाव हार गई थी। उनमें प्रत्याशियों का चयन और सहयोगी दलों को सीटों का बंटवारा बीजेपी नेतृत्व के लिए सबसे मुश्किल चुनौती है। इसके साथ ही राज्य में चार ऐसी सीट हैं, जहां पर पार्टी क्या निर्णय करती है, उस पर सभी की निगाह लगी हुई है। इनमें से एक सीट पीलीभीत है, जहां से बीजेपी के टिकट पर नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य और मेनका गांधी के बेटे वरुण गांधी चुनाव लड़े थे और जीते भी थे। दूसरी है सुल्तानपुर, यहां से खुद मेनका गांधी चुनाव लड़ी और जीती भी थीं। तीसरी सीट है बदायूं। उस सीट पर स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी संघमित्रा 2019 का चुनाव बीजेपी के टिकट पर जीती थीं। उन्होंने मुलायम सिंह यादव परिवार के धर्मेंद्र यादव को लगभग 20,000 वोटों से हरा दिया था।

वरुण गांधी पिछले एक साल से मोदी सरकार से नाराज हैं, वह सरकार के खिलाफ बयान भी देते रहते हैं। इसीलिए सवाल उठ रहे हैं कि क्या बीजेपी इसबार उन्हें पीलीभीत से दोबारा मैदान में उतारेगी या नहीं? दिलचस्प तथ्य यह है कि वरुण गांधी का पीलीभीत के बीजेपी नेताओं से तालमेल बेहतर नहीं है। ज्यादातर स्थानीय बीजेपी नेता उनकी मीटिंग में जाते नहीं हैं।

वरुण गांधी अपनी केदारनाथ यात्रा में राहुल गांधी (Rahul Gandhi) से मिले थे और तब से यह चर्चा और जोर पकड़ गई कि हो सकता है वरुण कांग्रेस में चले जाएं, लेकिन राहुल गांधी ने यह कहकर इनकार किया था कि हमारी और वरुण की विचारधारा में बहुत अंतर है।


वरुण गांधी ने अपनाया नरम रुख

पिछले कुछ दिनों से वरुण गांधी बीजेपी नेतृत्व को लेकर नरम रुख अपनाये हुए हैं। इसलिए यह चर्चा भी चल रही है की हो सकता है बीजेपी नेताओं से वरुण की बातचीत हुई हो। यह साफ है कि अगर वरुण गांधी, बीजेपी के टिकट पर पीलीभीत नहीं लड़ते हैं, तो उनकी मां मेनका गांधी सुल्तानपुर से बीजेपी के टिकट पर न लड़ें। वैसे भी मेनका गांधी सुल्तानपुर से बामुश्किल दस हजार वोटों से जीत पाई थीं।

जहां तक बदायूं सीट का सवाल है, तो बीजेपी सांसद संघमित्रा ने पार्टी के खिलाफ कोई ऐसा बयान नहीं दिया कि उन्हें टिकट न दिया जाए। लेकिन उनके पिता स्वामी प्रसाद मौर्य के बीजेपी विरोधी बयानों और हिंदू धर्म और धर्म ग्रंथो पर उनकी टिप्पणियों का असर भी संघमित्रा पर पड़ा है।

जब संघमित्रा बदायूं से बीजेपी सांसद हुई थीं, तब उनके पिता स्वामी प्रसाद मौर्य बीजेपी सरकार में मंत्री थे। बाद में उनके पिता ने बीजेपी से बगावती तेवर अपनाए और अलग होकर वह समाजवादी पार्टी में चले गए। वह अब सपा से भी बगावत कर अलग हो चुके हैं।

सपा ने बीजेपी के लिए बढ़ाई चुनौती

समाजवादी पार्टी ने पहले बदायूं सीट पर धर्मेंद्र यादव का नाम घोषित किया था, लेकिन अब शिवपाल सिंह यादव को मैदान में उतार दिया है। प्रत्याशी बदल कर सपा ने बीजेपी नेताओं के सामने चुनौती और बड़ी कर दी है।

चर्चा इस बात की चल रही है कि क्या बीजेपी इन तीनों सीटों पर प्रत्याशी बदलेगी या नहीं? यह चर्चा इसलिए शुरू हुई, क्योंकि पिछले एक साल से वरुण गांधी अपनी पार्टी के खिलाफ बयान देते रहे हैं। अब अगर पीलीभीत में बीजेपी उम्मीदवार बदलेगी, तो फिर किसको टिकट देगी?

भारतीय जनता पार्टी की नजर इस बार रायबरेली लोकसभा सीट की पर भी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर सोनिया गांधी चुनाव जीती थीं। जबकि भारतीय जनता पार्टी ने गांधी परिवार के सबसे मजबूत किले अमेठी पर राहुल गांधी को हरा कर कब्जा कर लिया था।

रायबरेली के जमीनी हालात कैसे?

इसलिए यह सवाल जरूर उठ रहे हैं कि इस चुनाव में रायबरेली में क्या होगा? क्योंकि कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी राज्यसभा पहुंच गई हैं और वह लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2024) नहीं लड़ेंगी। ऐसे में इस बार प्रियंका गांधी यहां मैदान में उतर सकती हैं और बीजेपी भी यही मानकर तैयारी कर रही है कि अगर प्रियंका गांधी उतरीं, तो उनके सामने किसको टिकट दिया जाए।

प्रियंका गांधी रायबरेली में लोकप्रिय भी हैं और उन्हें गांधी परिवार का होने कारण फायदा भी मिलेगा। फिलहाल जो लोग मैदान में काम कर रहे हैं, उनमें कोई ऐसा नाम नहीं है, जो बहुत मजबूत माना जाए। सुप्रीम कोर्ट के वकील अजय अग्रवाल एक बार फिर सक्रिय हो गए हैं। यही नहीं दो-तीन दावेदार और हैं, जिनके होर्डिंग, पोस्टर रायबरेली में दिखते हैं, लेकिन इनमें से कोई ऐसा नहीं है, जिसके बारे में यह कह दिया जाए कि वो प्रियंका को कड़ी टक्कर दे सकता है। सवाल यही है की क्या कोई बाहरी प्रत्याशी प्रियंका के खिलाफ मैदान में आएगा?

सहयोगी दलों में कैसे होगा सीट बंटवारा?

बीजेपी के लिए उससे भी कठिन चुनौती सहयोगी दलों को टिकट बंटवारे को लेकर भी है। पिछले चुनाव में गाजीपुर जैसी मुश्किल सीट पर मनोज सिन्हा बीजेपी के टिकट पर मैदान में थे और तब भी वह चुनाव हार गए थे। अब वह जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल हैं। सपा ने उस सीट पर सांसद अफजाल अंसारी को फिर से मैदान में उतार दिया है। इसलिए यह चर्चा जोरों पर है कि अफजाल को कौन टक्कर देगा?

इस सीट पर सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर या उनके बेटे भी मैदान में उतर सकते हैं। यही नहीं बीजेपी की नई सहयोगी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल को भी पश्चिम उत्तर प्रदेश में बीजेपी सीट देगी। बागपत और बिजनौर सीट RLD को देने पर बात पक्की हो चुकी है। क्या मथुरा सीट भी मिलेगी? इस पर चर्चा चल रही है। बागपत से इस बार जयंत चौधरी एक बार फिर लड़ सकते है।

पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी बिजनौर, अमरोहा, मुरादाबाद, सहारनपुर, संभल, रामपुर, नगीना, जौनपुर, अंबेडकर नगर, मैनपूरी, आजमगढ़, गाजीपुर, श्रावस्ती, घोसी, लालगंज सीट हार गई थी। इसमें से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की वे सीट ज्यादा थीं, जो मुस्लिम बहुल हैं।

अमरोहा, नगीना, संभल, रामपुर और मुरादाबाद वो सीट हैं, जहां पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक हैं और BSP से गठबंधन के चलते दलित मतदाता भी एकजुट होकर महागठबंधन के साथ चला गया था। बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उन सीटों पर कैसे पार पाया जाए, जहां मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में है।

यही नहीं गाजीपुर वो सीट है, जहां पर मुस्लिम और यादव मतदाता एकजुट होकर बीजेपी के गणित को बिगाड़ देता है। लेकिन इस बार एक बदलाव भी है। बहुजन समाज पार्टी अलग से चुनाव लड़ रही है और दलित मतदाता समाजवादी पार्टी गठबंधन के साथ नहीं जाएगा। इन सीटों पर बीजेपी उन प्रत्याशियों को खोज रही है, जो किसी भी तरह जीत हासिल कर सकें।

वहीं पूर्वांचल की आजमगढ़, घोसी ,लालगंज और जौनपुर वो सीट रही हैं, जहां पर बीजेपी हमेशा परेशानी में रही है। संजय निषाद, जो निषाद पार्टी के अध्यक्ष हैं, कई सीट मांग रहे हैं, लेकिन उन्हें एक सीट जरूर मिल जाएगी। अपना दल को भी दो या तीन सीट मिल सकती हैं। संभावना यही है कि अपना दल की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल इस बार फिर मिर्जापुर से चुनाव लड़ सकती हैं।

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