Loksabha Election 2024: झांसी का वो पहला सांसद, जिसे हिंदी बोलने की मिली थी सजा! नेहरू ने काट दिया था टिकट

Loksabha Election 2024: राजनीति की जानकारी रखने वाले बताते हैं कि रघुनाथ विनायक धुलेकर (Raghunath Vinayak Dhulekar) को हिंदी बोलने और हिंदी की पैरवी करने की सजा मिली थी। इसके बावजूद धुलेकर ने पार्टी का सम्मान रखा और डॉ. नैय्यर के लिए प्रचार भी किया

अपडेटेड Apr 16, 2024 पर 4:00 PM
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Loksabha Election 2024: रघुनाथ धुलेकर को हिंदी बोलने की मिली थी सजा, नेहरू ने काट दिया था टिकट

Loksabha Election 2024: लोकसभा चुनाव से जुड़े कई रोचक किस्सें आपने सुने होंगे, लेकिन आज हम आपको झांसी-ललितपुर लोकसभा सीट (Jhansi Lok Sabha Seat) के एक अनोखा किस्सा सुनाने जा रहे हैं, जब एक मौजूदा सांसद को हिंदी बोलने की सजा मिली। ये कहानी है कि झांसी के पहले सांसद आचार्य रघुनाथ विनायक धुलेकर (Raghunath Vinayak Dhulekar) की। रघुनाथ धुलेकर 1952 से 1957 तक झांसी के सांसद रहे, लेकिन, पंडित जवाहरलाल नेहरू से अनबन के चलते, उन्हें दोबारा टिकट नहीं मिला। राजनीति के जानकार बताते हैं कि रघुनाथ धुलेकर को हिंदी बोलने और हिंदी की पैरवी करने की सजा मिली थी।

1891 में जन्मे रघुनाथ विनायक धुलेकर मूल रूप से मराठी थे। इसके बावजूद उन्हें हिंदी से बेहद लगाव था। अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के उपाध्यक्ष हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि रघुनाथ धुलेकर शुरुआत से ही हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने की वकालत करते थे।

एक बार वो संसद में हिंदी में भाषण दे रहे थे। इस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें टोक दिया था। नेहरू ने कहा कि संसद में अलग-अलग भाषा को जानने वाले लोग हैं। आप बात अंग्रेजी में रखेंगे, तो सभी को समझ आएगी।


10 भाषाओं के थे जानकार

नेहरू की यह बात सुनने के बाद धुलेकर ने अंग्रेजी के साथ ही मराठी, गुजराती, उड़िया, बंगाली, मलयालम, कन्नड़, संस्कृत समेत 10 भाषाओं में भाषण दिया। धुलेकर ने नेहरू से कहा कि हिंदी भारत को एक सूत्र में जोड़ने वाली भाषा है। इसे राजभाषा का दर्जा देना चाहिए।

इसके बाद नेहरू और धुलेकर के बीच अनबन हो गई। 1957 के लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2024) में झांसी से डॉ. सुशीला नैय्यर को टिकट दिया गया। इसके बावजूद धुलेकर ने पार्टी का सम्मान रखा और डॉ. नैय्यर के लिए प्रचार भी किया।

हिंदी की पैरवी करने की मिली सजा!

हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि 1957 के बाद रघुनाथ धुलेकर ने केंद्र की राजनीति से संन्यास ले लिया। हिंदी की पैरवी करने की सजा उन्हें दी गई। इसके बाद वह छह साल तक उत्तर प्रदेश की विधान परिषद के सभापति भी रहे। कार्यकाल पुरा होने के बाद उन्होंने राजनीति से भी संन्यास ले लिया।

रिपोर्ट: शाश्वत सिंह

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