Get App

Banks vs NBFCs: 5 वजहों से बैंकिंग शेयरों की चमक फीकी, एनबीएफसी ने मारी बाजी

Banks vs NBFCs: एक साल में बैंकिंग स्टॉक्स ने एनबीएफसी स्टॉक्स की तुलना में कम रिटर्न दिया है। ऐसा नहीं है कि बैंकों का लोन बुक नहीं बढ़ रहा हो, या एसेट क्वालिटी कमजोर हो रही हो बल्कि इन मोर्चे पर बैंक मजबूत हो रहे। इसके बावजूद बैंकिंग स्टॉक्स की चमक फीकी पड़ रही, जानिए इसकी पांच मुख्य वजह और ऐसे हालात में निवेशकों को क्या करना चाहिए

Edited By: Jeevan Deep Vishawakarmaअपडेटेड Sep 20, 2026 पर 9:11 AM
Banks vs NBFCs: 5 वजहों से बैंकिंग शेयरों की चमक फीकी, एनबीएफसी ने मारी बाजी
निवेशकों की पसंद में बदलाव स्टॉक मार्केट में भी दिखने लगा है। एक साल में निफ्टी बैंक 3.51% मजबूत हुआ है लेकिन निफ्टी फाइनेंशिल सर्विसेज 2.5% कमजोर हुआ है। (File Photo- Pexels)

Banks vs NBFCs: लोन बुक में बढ़ोतरी, एसेट क्वालिटी की मजबूती बने रहने और बैड लोन के रिकॉर्ड निचले स्तर के आस-पास होने के बावजूद बड़े बैकों के शेयर निवेशकों को लुभा नहीं पा रहे। वहीं नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनीज (NBFC) को लेकर निवेशकों की काफी दिलचस्पी दिख रही है। सैमको सिक्योरिटीज के सीईओ और फाउंडर जिमीत मोदी का कहना है कि इसका मतलब यह नहीं है कि बैंकों का मैनेजमेंट खराब है बल्कि बैंकिंग सेक्टर के हालात बदल गए हैं। उन्होंने इसके पीछे की पांच अहम वजह बताई है, जिसके बारे में नीचे दिया जा रहा है।

घट रहे बैंकों के रिटर्न

बड़े प्राइवेट बैंकों के शेयरहोल्डर्स का रिटर्न अब कम हो रहा तो दिग्गज एनबीएफसी में RoE (रिटर्न ऑन इक्विटी) बढ़ रहा है। लंबे समय तक बैंकों का RoE मजबूत बना रहा क्योंकि उनके पसा बड़ा डिपॉजिट बेस था, जिसके दम पर वे शेयरहोल्डर्स के निवेश की तुलना में अधिक लोन बांट पाते थे तो दूसरी तरफ एनबीएफसी को यह सुविधा नहीं थी और उन्हें अपनी पूंजी पर निर्भर रहना पड़ता था। हालांकि अब लेंडिंग मार्जिन कम होने से अधिक लेवरेज का असर बैंकों के RoE पर निगेटिव दिखने लगा तो बेहतर मार्जिन और कम लेवरेज वाली NBFCs का रिटर्न बेहतर बना हुआ है।

रेपो-लिंक्ड लोन ने बढ़ाई बैंकों की दिक्कत

फरवरी 2025 से आरबीआई ने रेपो रेट में 125 बेसिस पॉइंट्स की कटौती की है। बैंकों के लगभग 60% लोन इसी रेट से जुड़े होते हैं तो रेपो रेट कम होने से इनकी ब्याज दर लगभग तुरंत कम हो गईं। वहीं डिपॉजिट के मामले में स्थिति थोड़ी अलग है क्योंकि इनकी दरें तभी बदलती हैं, जब वे मैच्योर होते हैं, जिसमें आमतौर पर छह से बारह महीने लगते हैं। ऐसे में बैंकों की इनकम पहले घटी, जबकि लागत बाद में कम हुई। वहीं नॉन-बैंक लेंडर्स यानी NBFCs के मामले में स्थिति बिल्कुल उल्टी रही। उनके अधिकतर लोन फिक्स्ड रेट वाले होते हैं, जैसे- ऑटो, गोल्ड और SME लोन। ऐसे में उनकी इनकम कम नहीं हुई और लोन के लिए फंड जुटाने की लागत कम हो गई। इस तरह रेपो रेट में कटौती का असर बिल्कुल अलग-अलग दिखा और इसने मार्जिन में फर्क डाल दिया।

सब समाचार

+ और भी पढ़ें