अडानी ग्रुप (Adani Group) की एंट्री से सीमेंट इंडस्ट्री के स्ट्रक्चर में बुनियादी बदलाव आया है। ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के बाद बिल्डिंग मैटेरियल कंपनियों पर कर्ज का बोझ काफी बढ़ गया। इंडिया सहित उनकी सब्सिडियरी की एक ही मांग थी-पेरेंट कंपनियां ज्यादा डिविडेंड का ऐलान करें ताकि कर्ज का उनका बोझ घट जाए। कैपिटल एलोकेशन के इस फैसले की वजह से पिछले दशक में इंडिया में मौजूद मल्टीनेशनल सीमेंट कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी में कमी आई।
फाइनेंशियल ईयर 2006-07 में Ambuja, ACC और हेडलबर्ग की इंडिया में बाजार हिस्सेदारी 24 फीसदी थी। यह घटकर फाइनेंशियल ईयर 2021-22 में 17 फीसदी रह गई। Jaypee, Ultratech Cement और Shree Cement जैसी घरेलू कंपनियों ने इसका फायदा उठाया। उन्होंने अपनी क्षमता और वॉल्यूम तेजी से बढ़ाई। Ultratech ने जेपी के एसेट्स का अधिग्रहण किया, जिसके बाद सीमेंट इंडस्ट्री में बदलाव दिखा। अब गौतम अडानी ग्रुप के होलसिम इंडिया के एसेट्स को खरीद लेने के बाद फिर से सीमेंट इंडस्ट्री की तस्वीर बदलने जा रही है।
पिछले 10 साल से अल्ट्राटेक और श्री सीमेंट की बाजार हिस्सेदारी 40 फीसदी से ज्यादा है। अब दोनों के लिए अपनी बाजार हिस्सेदारी को बनाए रखना काफी मुश्किल होगा। अडानी ग्रुप न सिर्फ छोटी कंपनियों बल्कि अल्ट्राटेक और श्री सीमेंट की बाजार हिस्सेदारी में भी सेंध लगाएगा। अडानी समूह पहले से लॉजिस्टिक्स (पोर्ट्स, रेलवेज और कनटेनर्स), पावर और फ्लाइ ऐश के बिजनेस में मौजूद है। उसे इसका फायदा मिलेगा। इंडस्ट्री के लिए रिस्क यह है कि अडानी ग्रुप अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए कॉस्ट सेविंग का फायदा ग्राहकों को देगा।
अल्ट्राटेक की कैपेसिटी में 2.2-2.3 करोड़ टन इजाफा में हैरानी की कोई बात नहीं है। कंपनी नेट-कैश बैलेंसशीट की तरफ बढ़ रही थी। हमारा मानना है कि कैपिटल के इस्तेमाल का उसके पास इससे बेहतर दूसरा कोई ऑप्शन नहीं था। इस पूंजीगत खर्च से उसके रिटर्न ऑन कैपिटल इंप्लॉयड (ROCE) में कमी आ सकती है। यह फाइनेंशियल ईयर 2023-24 तक 100 बेसिस प्वॉइंट्स घट सकता है। अल्ट्राटेक फाइनेंशियल ईयर 2024-25 तक अपनी कैपेसिटी में 10 फीसदी CAGR की दर से वृद्धि कर रही है। यह इंडस्ट्री की वॉल्यूम ग्रोथ से ज्यादा है।
इस विस्तार से इंडस्ट्री के Clinker Utilization में कमी आएगी। यह फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में 70 फीसदी पर आ जाएगी। हमें पहले से फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में सीमेंट कैपेसिटी 6 फीसदी CAGR से बढ़ने का अनुमान है। यह पिछले तीन साल की 5 फीसदी CAGR से ज्यादा है। इसमें अडानी का कैपेसिटी एक्सपैंशन शामिल नहीं है। अडानी के अलावा दूसरी कंपनियां भी एक्सपैंशन प्लान का ऐलान कर सकती हैं।
क्या ऊंचे एनर्जी प्राइसेज की वजह से EBITDA कम बना रहेगा?
कमोडिटी की कीमतों में गिरावट का असर एनर्जी सेक्टर पर नहीं पड़ा है। चीन में लॉकडाउन और अमेरिकी डॉलर इंडेक्स में तेजी के बावजूद एनर्जी के प्राइसेज ऊंचे स्तर पर बने हुए हैं। सप्लाई में दिक्कत से इसे सपोर्ट मिल रहा है। एनर्जी सहित कमोडिटी की दुनिया में पिछले कुछ सालों में ज्यादा पूंजीगत खर्च देखने को नहीं मिला है। इसकी वजह यह है कि कंपनियों ने कैपेसिटी एक्सपैंशन के बजाय कैपिटल रिटर्न पर ज्यादा फोकस किया है। पिछली कुछ तिमाहियों में एनर्जी की ऊंची कीमतों के बावजूद इस रुख में बदलाव नहीं आया है।
क्या ग्लोबल रिसेशन की वजह से 1980 के दशक की तरह ऑयल प्राइसेज में बड़ी गिरावट आएगी? इसकी संभावना है। इसके लिए कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिपेंडेंट स्टेट्स (CIS) और पश्चिमी एशिया से ज्यादा सप्लाई की जरूरत होगी। इसके अलावा ग्लोबल रिसेशन के बाद ही एनर्जी प्राइसेज में कमी आएगी।
अगर एनर्जी प्राइसेज में कमी आती हो तो भी इनफ्लेशन पर सरकार के रुख को देखते हुए सीमेंट कंपनियां क्या इस मार्जिन सपोर्ट का फायदा नहीं उठा सकेंगी? एनर्जी की ऊंची कीमतें सीमेंट कंपनियों के लिए एक बड़ी मुश्किल बनी रहेगी।
सीमेंट कंपनियों की वैल्यूएशन पिछले 6-7 साल में अपने निचले स्तर से बढ़ी है। लेकिन, छोटी अवधि में सीमेंट मार्जिन में सुधार की उम्मीद नहीं दिखती। कैपिटल कॉस्ट बढ़ने के बीच कम प्रॉफिटबिलिटी की वजह से पूंजी के मामले में अनुशासन पर फोकस बढ़ेगा। इसके चलते बाद में मार्जिन में वृद्धि दिखेगी, लेकिन अभी ऐसा होने नहीं जा रहा है।
श्री सीमेंट और अल्ट्राटेक ने पिछले एक दशक में जैसा प्रदर्शन किया है, वैसा अब मुश्किल लग रहा है। इस वजह से डी-रेटिंग की जरूरत पड़ेगी। डी-रेटिंग से बचने का एकमात्र रास्ता यह है कि अडानी की एंट्री के बाद मार्जिन में स्ट्रक्चरल बदलाव आए। सीमेंट इंडस्ट्री में कुछ ही कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा रही है। लेकिन अब ऐसा नहीं लगता।