भारी क्रैश के बाद कैसे रिकवरी करता है शेयर बाजार, कितना लगता है समय; जानिए पुराने आंकड़े

भू-राजनीतिक संकट या बड़ी गिरावट के बाद शेयर बाजार कैसे संभलता है। पुराने आंकड़े बताते हैं कि शुरुआती झटके के बाद सेंसेक्स अक्सर मजबूत रिकवरी करता है। जानिए बाजार को उबरने में कितना समय लगता है।

अपडेटेड Mar 23, 2026 पर 4:28 PM
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भारी क्रैश के बाद औसतन तीन महीने के भीतर सेंसेक्स में 10 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़त देखी गई है।

इस समय शेयर बाजार में घबराहट का माहौल बना हुआ है। सेंसेक्स और निफ्टी 50 अपने हालिया उच्च स्तर से करीब 14 प्रतिशत नीचे आ चुके हैं। युद्ध, आतंकी हमले या महामारी जैसी भू-राजनीतिक घटनाएं अक्सर बाजार में तेज गिरावट लेकर आती हैं।

हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। पुराने आंकड़े बताते हैं कि ऐसे संकटों के बाद बाजार में अक्सर मजबूत तेजी देखने को मिलती है, खासकर उन निवेशकों के लिए जो धैर्य बनाए रखते हैं।

जाने-माने निवेशक और Equity Intelligence India के फाउंडर और सीईओ पोरीनजू वेलियाथ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कुछ आंकड़े साझा किए हैं। इनसे पता चलता है कि अलग-अलग संकटों के दौरान सेंसेक्स ने किस तरह प्रतिक्रिया दी। आमतौर पर शुरुआत में बाजार में घबराहट की वजह से तेज गिरावट आती है, लेकिन कुछ समय बाद बाजार संभल जाता है और रिटर्न भी देता है।


संकट के बाद पहले आता है तेज झटका

किसी भी बड़े भू-राजनीतिक संकट के तुरंत बाद बाजार में डर का माहौल बन जाता है और बिकवाली बढ़ जाती है। खाड़ी युद्ध, 9/11 के आतंकी हमले, लेहमैन ब्रदर्स का दिवालिया होना और कोविड-19 महामारी जैसे घटनाक्रमों के बाद भी बाजार में ऐसी ही तेज गिरावट देखी गई थी।

इन घटनाओं के दौरान सेंसेक्स में कभी एक अंक की गिरावट तो कभी 30 प्रतिशत से ज्यादा तक की गिरावट दर्ज हुई।

उदाहरण के लिए, 2008 में लेहमैन ब्रदर्स के पतन के दौरान सेंसेक्स करीब 29 प्रतिशत गिर गया था। वहीं 2020 की शुरुआत में जब पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी की चपेट में थी, तब सेंसेक्स में लगभग एक महीने के भीतर करीब 37 प्रतिशत की गिरावट देखी गई थी।

अनिश्चितता कम होते ही शुरू होती है रिकवरी

ऐतिहासिक आंकड़े यह भी बताते हैं कि शुरुआती झटके के बाद बाजार धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है और फिर रिकवरी शुरू होती है।

औसतन देखें तो ऐसे घटनाक्रमों के तीन महीने के भीतर सेंसेक्स में 10 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़त देखी गई है। समय के साथ यह रिकवरी और मजबूत होती जाती है। छह महीने में औसत रिटर्न करीब 17 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। वहीं, नौ महीने में यह लगभग 26 प्रतिशत तक हो जाता है।

इस तेजी की एक वजह यह भी होती है कि गिरावट के बाद कई अच्छे शेयर सस्ते वैल्यूएशन पर मिलने लगते हैं। जैसे-जैसे निवेशक दोबारा बाजार में लौटते हैं, बाजार की रिकवरी और तेज हो जाती है।

हर संकट में दिखा लगभग एक जैसा पैटर्न

एशियाई वित्तीय संकट, कारगिल युद्ध, यूरोपीय कर्ज संकट या कोविड-19 महामारी- इन सभी घटनाओं में एक जैसा पैटर्न देखने को मिला है। पहले बाजार में तेज गिरावट आती है और उसके बाद धीरे-धीरे रिकवरी शुरू हो जाती है। दिलचस्प बात यह है कि अलग-अलग तरह के संकटों के बावजूद बाजार का व्यवहार काफी हद तक एक जैसा ही रहा है।

कई मामलों में शुरुआती गिरावट काफी बड़ी थी, लेकिन कुछ समय बाद बाजार न सिर्फ संभल गया बल्कि मजबूत तेजी भी दिखाई। कई बार सेंसेक्स ने अपनी पूरी गिरावट की भरपाई कर ली और कुछ महीनों के भीतर अच्छा खासा रिटर्न भी दिया।

लंबी अवधि के निवेशकों के लिए क्या संदेश

लंबी अवधि के निवेशकों के लिए ये आंकड़े एक अहम बात बताते हैं। भू-राजनीतिक संकटों के दौरान जल्दबाजी में फैसले लेना अक्सर नुकसानदेह हो सकता है। इसके बजाय तेज गिरावट को अच्छे शेयरों को कम कीमत पर खरीदने के मौके के रूप में देखना चाहिए।

इतिहास बताता है कि भले ही संकट के समय बाजार में शॉर्ट टर्म गिरावट देखने को मिलती है। लेकिन लंबे समय में बाजार अक्सर इन घटनाओं से आगे निकल जाता है।

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