शेयरों पर लोन का मतलब क्या है? RBI ने इस पर क्यों जताई है चिंता?

RBI ने पिछले कुछ हफ्तों में कुछ एनबीएफसी के खिलाफ सख्त कदम उठाया है। सबसे ताजा मामला जेएम फाइनेंशियल का है। केंद्रीय बैंक ने इस एनबीएफसी पर शेयरों के एवज में लोन देने पर रोक लगा दी है

अपडेटेड Mar 13, 2024 पर 1:33 PM
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आम तौर पर हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल (HNI) शेयरों पर लोन लेते हैं। वे स्टॉक्स और डेरिवेटिव में निवेश करते हैं, जिसके लिए वे लोन के पैसा का इस्तेमाल करते हैं।

RBI ने पिछले हफ्ते JM Financial के शेयरों पर लोन के साथ ही आईपीओ के लिए लोन देने पर रोक लगा दी। शेयरों पर लोन का मतलब यह है कि इनवेस्टर्स अपने शेयर गिरवी रखकर उस पर एनबीएफसी से लोन लेते हैं। इसे लोन एगेंस्ट शेयर्स (LAS) कहा जाता है। एनबीएफसी इस लोन पर 10.5 से 13 फीसदी इंटरेस्ट लेते हैं। इंटरेस्ट रेट इस बात पर निर्भर करता है कि शेयर किस कंपनी के हैं और क्लाइंट के साथ एनबीएफसी का रिलेशन कैसा है। आम तौर पर हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल (HNI) शेयरों पर लोन लेते हैं। वे स्टॉक्स और डेरिवेटिव में निवेश करते हैं, जिसके लिए वे लोन के पैसा का इस्तेमाल करते हैं। आइए इस पूरे मामले को समझते हैं।

एनबीएफसी शेयरों पर कितना लोन दे सकती है?

एनबीएफसी शेयरों की मार्केट वैल्यू के 50 फीसदी से ज्यादा लोन नहीं दे सकती। इसे लोन टू वैल्यू (LTV) कहा जाता है। लोन लेने वाले को एनबीएफसी को यह बताना पड़ता है कि वह किस लिए लोन ले रहा है।


शेयरों पर लोन का मार्केट कितना बड़ा है?

एक अनुमान के मुताबिक यह मार्केट 50,000 से 55,000 करोड़ रुपये के बीच हो सकता है।

क्या एनबीएफसी सभी शेयरों पर लोन देती हैं?

नहीं, आरबीआई की गाइडलाइंस के तहत वे सिर्फ एनएसई के ग्रुप 1 शेयरों के बदले में लोन दे सकती हैं। ग्रुप 1 शेयरों का मतलब ऐसे शेयरों से है जिनमें पिछले छह महीनों में कम से कम 80 दिन कारोबार हुआ है। इनका मिन इम्पैक्ट कॉस्ट 1 फीसदी के बराबर या इससे कम होनी चाहिए। इम्पैक्ट कॉस्ट का मतलब उस एडिशनल कॉस्ट से है, जो निवेशक बड़ी संख्या में शेयरों को खरीदने या बेचने पर चुकाता है।

इम्पैक्ट कॉस्ट चुकाना क्यों जरूरी है?

यह इसलिए जरूरी है क्योंकि शेयरों को बेचने और खरीदने पर उनकी कीमतों में गिरावट या तेजी देखने को मिलती है। लो इम्पैक्ट कॉस्ट का मतलब यह है कि कीमतों पर ज्यादा असर के बगैर बड़ी संख्या में शेयरों को खरीदा या बेचा जा सकता है। क्लाइंट के मार्जिन के मामले में डिफॉल्ट करने पर एनबीएफसी शेयरों को बेचकर अपना पैसा रिकवर करती है। इम्पैक्ट कॉस्ट ज्यादा होने पर शेयरों को बेचने पर उसकी कीमत में तेज गिरावट आ सकती है। इससे एनबीएफसी अपना पैसा रिकवर नहीं कर पाएगी।

RBI की चिंता की क्या वजह है?

जेएम फाइनेंशियल के मामले में आरबीआई की चिंता आईपीओ और NCD में निवेश के लिए दिए जाने वाले लोन को लेकर है। केंद्रीय बैंक ने LAS को लेकर अपनी चिंता के बारे में नहीं बताया है। मार्केट से जुड़े लोगों का मानना है कि केंद्रीय बैंक को लगता है कि शेयरों के बदले लिए जाने वाले लोन की वजह से स्टॉक मार्केट में शेयरों की कीमतों में बुलबुला बना है। ऐसा माना जाता है कि कुछ एनबीएफसी शेयरों पर लोन देने के लिए नियमों का पालन नहीं कर रही हैं या ऐसे शेयरों पर लोन दे रही हैं जो एनएसई ग्रुप 1 लिस्ट में शामिल नहीं हैं।

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