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मुस्लिम विवाह हिंदू विवाह की तरह संस्कार नहीं, बल्कि करार है- Karnataka High Court

मुस्लिम तलाक के बाद कई प्रकार के कर्तव्यों को पूरा नहीं करते हैं

MoneyControl Newsअपडेटेड Oct 21, 2021 पर 8:27 AM
मुस्लिम विवाह हिंदू विवाह की तरह संस्कार नहीं, बल्कि करार है-  Karnataka High Court

मुस्लिम विवाह ये एक करार होता है जिसके कई शेड होते हैं। ये हिंदू विवाह की तरह संस्कार नहीं है। मुस्लिम तलाक के बाद सामने आये कई अधिकार और कर्तव्यों को पूरा नहीं करते हैं। बंगलुरू के भुवनेश्वरी नगर में एजाजुर रहमान द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने ये टिप्पणी की।

लोकसत्ता में छपी खबर के मुताबिक रहमान ने शादी के कुछ महीनों के बाद ही 5 हजार रुपये मेहर देकर अपनी पहली पत्नी सायरा बानू को 5 नवंबर 1991 को तलाक दे दिया था। तलाक के बाद रहमान ने दूसरी शादी कर ली और उसको एक बेटा भी है। इस बीच साल 2002 में पहली पत्नी सायरा बानू ने निर्वाह निधि के लिए दीवानी न्यायालय में मुकदमा दायर किया।

इस पर फैमिली कोर्ट ने आदेश दिया कि सायरा बानू को मुकदमें की तारीख से उसकी मृत्यू होने तक या उसका पुनर्विवाह होने तक या पति की मृत्यू होने तक निर्वाह निधि के रूप में हर महीने 3 हजार रुपये दिये जायें।

इसके बाद साल 2011 में सायरा बानू ने फिर से न्यायालय में याचिका दायर करके हर महीने 25 हजार की निर्वाह निधि की मांग की। न्यायालय ने सायरा बानू की ये याचिका खारिज कर दी। न्यायाधीश कृष्णा दीक्षित ने अपने आदेश में कहा कि मुस्लिम विवाह एक करार है और इसमें विविध शेड हैं। ये हिंदू विवाह की तरह संस्कार नहीं है। मुस्लिम विवाह में तलाक के बाद सामने आने वाले कई अधिकारों और कर्तव्यों की पूर्ति नहीं की जाती। ऐसे विवाह तलाक के बाद खतम हो जाते हैं। मुस्लिम विवाह ये एक करार के साथ शुरू होता है। फिर वह विवाह किसी सुशिक्षित व्यक्ति का हो चाहे सामान्य नागरिक का हो।

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