ईरान युद्ध के चलते ग्लोबल इकोनॉमी पर असर साफ दिखने लगा है। महंगाई बढ़ रही है, करेंसी कमजोर हो रही है और शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है। ऐसे हालात में कई देश अपने पुराने संकट वाले उपाय फिर से लागू कर रहे हैं, ताकि नुकसान को संभाला जा सके।

ईरान युद्ध के चलते ग्लोबल इकोनॉमी पर असर साफ दिखने लगा है। महंगाई बढ़ रही है, करेंसी कमजोर हो रही है और शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है। ऐसे हालात में कई देश अपने पुराने संकट वाले उपाय फिर से लागू कर रहे हैं, ताकि नुकसान को संभाला जा सके।
भारत में भी स्थिति दबाव में है। रुपया एशिया की सबसे कमजोर करेंसी में शामिल हो गया है। ऐसे में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने रुपये को स्थिर रखने के लिए नए कदम उठाए हैं।
रुपये को कैसे सहारा दे रहा RBI
RBI ने बुधवार देर रात रुपये को संभालने के लिए कई फैसले लिए। पिछले शुक्रवार को बैंकों के नेट ओपन रुपये पोजिशन को $100 मिलियन तक सीमित कर दिया गया। पहले यह सीमा बैंक की कुल पूंजी के 25% तक थी। इसका मतलब कि अब बैंक बड़ा दांव नहीं लगा सकते, क्योंकि सरकार ने उनकी ट्रेडिंग की लिमिट घटाकर कंट्रोल में कर दी।
इसके कुछ दिन बाद बैंकों को रुपये के नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड (NDF) देने से रोक दिया गया, चाहे ग्राहक देश के हों या विदेशी। RBI ने साफ किया कि अधिकृत डीलर अब रुपये से जुड़े कुछ नॉन-डिलिवरेबल कॉन्ट्रैक्ट नहीं दे सकेंगे। हालांकि हेजिंग के लिए डिलिवरेबल फॉरेक्स कॉन्ट्रैक्ट की अनुमति बनी रहेगी, लेकिन इन पोजिशन को ऑफशोर ट्रेड से एडजस्ट नहीं किया जा सकेगा।
बैंकों को बंद करने पड़े $30 अरब के सौदे
इन नए नियमों से पहले बैंक रुपये से जुड़े अलग-अलग बाजारों (ऑनशोर और ऑफशोर) में दाम के फर्क का फायदा उठाकर कमाई करते थे। इसे आर्बिट्राज ट्रेड कहते हैं। RBI के नए नियमों के बाद ऐसे सौदे करना मुश्किल हो गया। इसलिए बैंकों को अपने करीब $30 अरब के पुराने सौदे जल्दी-जल्दी बंद करने पड़े।
जब इतनी बड़ी रकम एक साथ बाजार से निकलती है, तो डिमांड-सप्लाई अचानक बदल जाती है। इसी वजह से बाजार में हलचल बढ़ी और उतार-चढ़ाव तेज हो गया।
2013 जैसा माहौल क्यों दिख रहा है?
मौजूदा स्थिति 2013 के 'टेपर टैंट्रम' जैसी लग रही है। उस समय अमेरिकी फेड के चेयरमैन Ben Bernanke ने संकेत दिया था कि अमेरिका अब बाजार में डाला जा रहा अतिरिक्त पैसा (क्वांटिटेटिव ईजिंग) धीरे-धीरे कम करेगा।
इसका सीधा असर यह हुआ कि ग्लोबल निवेशक अपना पैसा उभरते बाजारों से निकालकर अमेरिका ले जाने लगे, क्योंकि वहां रिटर्न बेहतर दिखने लगा। इससे भारत जैसे देशों की करेंसी पर दबाव बढ़ा, बाजार गिरा और अर्थव्यवस्था में अस्थिरता आ गई। भारत में चालू खाता घाटा बढ़ गया। मैन्युफैक्चरिंग, रियल एस्टेट और फाइनेंस जैसे सेक्टर भी दबाव में आ गए।
2013 में भारत ने कैसे संभाला संकट?
उस समय रघुराम राजन RBI गवर्नर थे, जब भारत 'Fragile Five' देशों में शामिल था। इसका मतलब था कि भारत उन अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा था, जो बाहरी झटकों के लिए ज्यादा कमजोर मानी जाती थीं।
राजन ने तेजी से कई कदम उठाए। बैंकों को विदेशी मुद्रा जमा जुटाने के लिए FCNR(B) स्वैप स्कीम दी गई, जिससे सिर्फ तीन महीने में $26 अरब आए। गोल्ड इम्पोर्ट पर ड्यूटी बढ़ाकर 10% कर दी गई और 80:20 नियम लागू किया गया। महंगाई को काबू करने और रुपये को सहारा देने के लिए रेपो रेट 8% तक बढ़ाया गया। साथ ही सरकार ने खर्च में 10% कटौती कर फिस्कल घाटे को नियंत्रित करने की कोशिश की।
1997 एशियाई संकट से क्या सबक मिला?
1997 का एशियाई वित्तीय संकट थाईलैंड से शुरू होकर कई देशों में फैल गया, जिससे करेंसी तेजी से गिरी, क्रेडिट संकट आया और कई अर्थव्यवस्थाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं। उस समय भारत अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा, क्योंकि उसने पूंजी खाते को पूरी तरह खुला नहीं किया था। उस दौर में RBI गवर्नर बिमल जालान (Bimal Jalan) ने संतुलित कदम उठाकर हालात को संभालने में अहम भूमिका निभाई।
उन्होंने बैंक रेट और CRR बढ़ाकर मौद्रिक सख्ती की। रुपये को एकदम बचाने की कोशिश करने के बजाय धीरे-धीरे करीब 18% तक गिरने दिया, जिससे एक्सपोर्ट प्रतिस्पर्धी बने रहे और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव नहीं पड़ा। बाहरी कर्ज पर नियंत्रण रखा गया और 1998 में Resurgent India Bonds लॉन्च करके $4 अरब जुटाए गए।
अब क्या संकेत मिल रहे हैं?
इतिहास बताता है कि जब भी बाहरी दबाव बढ़ता है, भारत आमतौर पर तीन रास्तों का इस्तेमाल करता है- मौद्रिक सख्ती, कैपिटल कंट्रोल और जरूरत के हिसाब से लिक्विडिटी सपोर्ट।
अभी भी वही रणनीति अपनाई जा रही है, क्योंकि रुपया दबाव में है और ग्लोबल हालात अनिश्चित बने हुए हैं। आने वाले समय में बाजार और करेंसी की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान युद्ध किस दिशा में आगे बढ़ता है।
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