भारत वास्तव में एक स्टैंडअलोन कोर एसेट क्लास के रूप में उभर रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था की गति तेजी से बढ़ने के साथ ही FIIs जल्द ही भारतीय इक्विटी में खरीदारी करते नजर आयेंगे
नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (National Securities Depository Ltd (NSDL) के पास उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने इस कैलेंडर वर्ष में 1.79 लाख करोड़ रुपये की भारतीय इक्विटी बेची है। विश्लेषकों की नजरिये से पैसों की तंगी, बढ़ती ब्याज दरें, महंगा वैल्यूएशन इस बिकवाली के पीछे के कई कारणों में शामिल हैं।
मनीकंट्रोल के Muhurat Roundtable में हमने दलाल-स्ट्रीट के दिग्गजों को एफआईआई सेलिंग और उनकी अनुपस्थिति में रिटेल निवेशकों को बचाव में आने को डिकोड करने के लिए कहा। इसमें कुछ दिग्गजों ने इस पर अपनी राय इस प्रकार दी-
क्या इंडिया को रूस के करतूतों की कीमत चुकानी पड़ी ?
इस साल 24 फरवरी को रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण करने के तुरंत बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई कड़े प्रतिबंध और सेंट्रल बैंक प्रतिबंध लगाए। चुनिंदा रूसी बैंकों को स्विफ्ट नेटवर्क से हटा दिया गया। देश के इक्विटी बाजार को "निवेश के लिए अयोग्य (uninvestable)" माना गया। रूस की कार्रवाइयों के खिलाफ कड़ा रुख नहीं अपनाने के चलते चीन पर भी प्रतिबंध लगाए गए थे।
इसके बाद 2 मार्च को, MSCI ने रूस को अपने एमर्जिंग मार्केट इंडेक्स से हटाने की घोषणा की। वर्ष की शुरुआत में इंडेक्स में रूस का लगभग 4 प्रतिशत हिस्सा था। लेकिन 9 मार्च को रूस का वेटेज जीरो हो गया।
MK Ventures के मधु केला ने कहा "रूस के बाजार ढह गये, चीन के बाजार ढह गये। सामान्य रूप से एमर्जिंग मार्केट्स ढह गए। रूस में पूरी व्यवस्था चरमरा गई। इससे इंडिया का वेटेज वास्तव में बढ़ गया। अधिकांश बड़े संस्थान जो पैसे के निवेश के लिए weighted system अपनाते हैं उन्हें भारतीय इक्विटी बेचनी पड़ी क्योंकि हमारा वेटेज बहुत अधिक था। ”
Enam Holdings के मनीष चोखानी ने कहा, "विदेशी निवेशक चीन में इक्विटी नहीं बेच सकते थे। इसके साथ ही वे रूस में इक्विटी नहीं बेच सकते थे। इसलिए आप वहीं बेचते हैं जहां आपको बेचने में फायदा हो रहा है इसलिए विदेशी निवेशकों ने भारत में इक्विटी बेची। ”
रिटेल निवेशकों ने कैसे भारतीय बाजारों को संभाला ?
ब्लूमबर्ग के डेटा से पता चलता है कि डीआईआई या घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 2022 में अब तक 2.62 लाख करोड़ रुपये की भारतीय इक्विटी खरीदी है। फंड मैनेजर प्रशांत जैन ने बताया कि इक्वटी में रिटेल निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़ना अच्छी खबर है। उन्होंने कहा “भारत में बड़े स्तर पर बचत करने वाले वर्ग ने इक्विटी में दांव लगाने का विकल्प चुना। भारत में लोग वित्तीय बचत के रूप में सालाना 300 अरब डॉलर की बचत करतें हैं।"
उन्होंने कहा कि एफआईआई की सेलिंग से बाजार की वोलैटिलिटी को रोकने के लिए स्थानीय बचत राशि का बाजार में निवेश होना अहम होगा।
Abakkus Asset के सुनील सिंघानिया का मानना है कि मासिक एसआईपी (SIP) लगभग 2 अरब डॉलर का निवेश स्थिर बना रहेगा। “भारतीय रिटेल नियमित रूप से निवेश करने की अवधारणा को समझ चुके हैं और उन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था पर भरोसा है।
भारतीय बाजारों में FIIs की वापसी कब होगी?
बाजार के दिग्गजों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था के तेज गति से बढ़ने के साथ ही एफआईआई जल्द ही भारतीय इक्विटी में खरीदारी करते नजर आयेंगे। “भारत वास्तव में एक स्टैंडअलोन कोर एसेट क्लास के रूप में उभर रहा है। यह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। ये दुनिया का चौथा सबसे बड़ा बाजार है।”
“जब FIIs ने बिकवाली की तो बाजार में स्थानीय निवेशकों ने खरीदारी करके बाजार को संभाल लिया। जब FIIs खरीदने आएंगे तो बाजार का क्या होगा? इस पर मधु केला ने कहा कि हम केवल वेट एंड वॉच कर सकते हैं।
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