सेबी ओपन ऑफर के नियमों को सख्त बना सकता है। वह टेकओवर के उन डील्स पर प्रतिबंध लगा सकता है, जिसमें प्रमोटर्स को ओपन ऑफर के जरिए डिस्कवर्ड हायर प्राइस पर एग्जिट की इजाजत मिलती है। लीगल सूत्रों ने बताया कि रेगुलेटर टेकओवर कोड में बदलाव कर सकता है। सेबी टेकओवर के नियमों की खामियां दूर करने के लिए इन पर विचार कर रहा है।
कमेटी ने दिया है यह सुझाव
सूत्रों के मुताबिक, टेकओवर के नियमों को रिव्यू करने के लिए बनाई गई समिति ने अपनी रिपोर्ट दे दी है। इसमें कहा गया है, "ओपन ऑफर के बाद अधिग्रहण करने वाली कंपनी और प्रोसेस से जुड़े व्यक्ति ओपन ऑफर के प्राइस से ज्यादा प्राइस पर किसी नेगोशिएटेड डील में शामिल नहीं हो सकते। इनमें ब्लॉक डील और बल्क डील भी शामिल होंगे।"
रेगुलेशन 8(10) में हो सकता है बदलाव
कमेटी ने सेबी को मौजूदा टेकओवर नियमों के रेगुलेशन 8(10) में बदलाव करने की सलाह दी है। सूत्र ने बताया कि इसकी जरूरत 2022 की एक डील के बाद महसूस की गई। उस डील में भारत के सबसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर ग्रुप ने दिल्ली के एक मीडिया हाउस के प्रमोटर्स से शेयर खरीदे थे। यह डील ओपन ऑफर टेंडर प्रोसेस के जरिए तय कीमत से 25 फीसदी ज्यादा पर हुई थी।
इस मामले से सेबी ने लिया सबक
इस मामले में प्रमोटर्स को चुकाई जाने वाली ज्यादा कीमत की जानकारी ओपन ऑफर क्लोज होने के 18 दिन बाद सार्वजनिक की गई। बाद में अधिग्रहण करने वाले कंपनी को माइनरिटी शेयरहोल्डर्स को हुए नुकसान की भरपाई करनी पड़ी। जिन शेयरहोल्डर्स ने ओपन ऑफर में अपने शेयर टेंडर किए थे, उन्हें प्रति शेयर अतिरिक्त 48.65 रुपये का पेमेंट किया गया।
सेबी ने दिया था यह प्रस्ताव
सेबी ने इस मामले के बाद टेंडरिंग प्रोसेस के लिए मौजूदा 26 हफ्तों का समय बढ़ाने का प्रस्ताव पेश किया था। इस दौरान पब्लिक शेयरहोल्डर्स ऑफर प्राइस और अधिग्रहण करने वाली कंपनी की तरफ से चुकाई गई ज्यादा कीमत के बीच का फर्क पाने का हकदार होता है। सेबी का मानना था कि प्राइस में इस फर्क की जानकारी उन पब्लिक शेयरहोल्डर्स के साथ शेयर करना जरूरी है, जो ओपन ऑफर में अपने शेयर टेंडर करते हैं।
मॉइनरिटी शेयरहोल्डर्स को होगा फायदा
हालांकि, यह बड़ा मसला यह सामने आया कि जिन शेयरहोल्डर्स ने ओपन ऑफर में अपने शेयर टेंडर नहीं किए हैं, उन्हें भी ज्यादा कीमत पर अपने शेयर टेंडर करने की इजाजत मिलनी चाहिए। रेगुलेशन 8(10) इस सिद्धांत पर आधारित है कि 26 हफ्तों के अंदर चुकाई गई ज्यादा कीमत ऑरिजिनल ऑफर प्राइस होना चाहिए। अगर यह सिद्धांत स्वीकार कर लिया जाता है तो जो शेयरहोल्डर्स अपने शेयर टेंडर नहीं करने का फैसला करते हैं, उन्हें बाद में ज्यादा कीमत पर अपने शेयर बेचने का हक मिल सकता है।