Stock Markets में लड़ाई के समय किस तरह की स्ट्रेटेजी काम करती है? जानिए क्या कहता है Nifty का इतिहास

Stock Markets: 2003 से अब तक के शेयर बाजार के प्रदर्शन को देखने पर दिलचस्प ट्रेंड का पता चलता है। तब से अब तक शेयर बाजार ने छह लड़ाइयां देखी हैं। हर लड़ाई की शुरुआत के बाद शेयर बाजार में डर और बड़ी गिरावट देखने को मिली थी। उसके बाद तेज रिकवरी आई

अपडेटेड Mar 10, 2026 पर 5:01 PM
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बाजार इमोशन से ज्यादा आर्थिक असर को अहमियत देता है।

Stock Markets: निफ्टी जनवरी के अपने ऑल-टाइम हाई से करीब 9 फीसदी गिरा है। इसमें अमेरिका-इजरायल और ईरान की लड़ाई का हाथ है। इससे इंडिया वीआईएक्स में बीते एक महीने में तेज उछाल दिखा है। कई एनालिस्ट्स क्रूड ऑयल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक जाने का अनुमान जता रहे हैं। सवाल है कि क्या यह शेयर बाजार में गिरावट बढ़ने का संकेत है?

हर लड़ाई की शुरुआत में बाजार में डर होता है

2003 से अब तक के शेयर बाजार के प्रदर्शन को देखने पर दिलचस्प ट्रेंड का पता चलता है। तब से अब तक शेयर बाजार ने छह लड़ाइयां देखी हैं। हर लड़ाई की शुरुआत के बाद शेयर बाजार में डर और बड़ी गिरावट देखने को मिली थी। उसके बाद तेज  रिकवरी आई। इससे यह पता चलता है कि जियोपॉलिटिकल टेंशन का शेयर बाजार पर कुछ समय के लिए असर पड़ता है।


लड़ाई खत्म होने के बाद मार्केट में तेज रिकवरी

2003 में इराक युद्ध और 2006 में लेबनान युद्ध के समय मार्केट में गिरावट आई थी। निफ्टी पहले हफ्ते में क्रमश: 2 फीसदी और 8 फीसदी गिरा था। लेकिन, दोनों ही बार एक साल में मार्केट में तेज रिकवरी आई। मार्केट का रिटर्न क्रमश: 68 फीसदी और 41 फीसदी रहा। अनिश्चितता खत्म होने और स्ट्रॉन्ग इकोनॉमिक फंडामेंटल का मार्केट पर पॉजिटिव असर पड़ा।

बाजार की नजरें लड़ाई से ज्यादा उसके आर्थिक असर पर 

आनंद राठी की स्टडी के मुताबिक, 2000 से अब तक हुई लड़ाइयों में से ज्यादातर के समय निफ्टी में तेजी दिखी। चरम अनिश्चितता वाले वक्त में निफ्टी में मीडियन गिरावट करीब 4 फीसदी रही। इसका मतलब है कि भारतीय शेयर बाजारों पर जियोपॉलिटिकल डेवलपमेंट से ज्यादा असर ग्लोबल मॉनेटरी स्थितियों और घरेलू आर्थिक हालात का पड़ता है।

अर्निंग्स ग्रोथ बढ़ने पर मार्केट में आती है रिकवरी

एक्सिस एएमसी के डेटा से पता चलता है कि जियोपॉलिटिकल झटकों का सिर्फ कुछ असर भारतीय मार्केट पर पड़ता है। 2011 में अरब स्प्रिंग, क्रीमिया में 2024, 2016 में उड़ी में सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 में बालाकोट एयर स्ट्राइक, 2022 में रूस-यूक्रेन की लड़ाई, 2023 में इजरायल-हमास टकराव और 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के समय भी एक जैसा पैटर्न देखने को मिला। कुछ समय तक तेज उतार-चढ़ाव के बाद अर्निंग्स ग्रोथ और अच्छी लिक्विडिटी से मार्केट में रिकवरी आई।

निवेशक डर की वजह से बेच देते हैं शेयर

एक्सिस एएमसी की रिपोर्ट के मुताबिक, "बाजार इमोशन से ज्यादा आर्थिक असर को अहमियत देता है। यह स्पष्ट होने के बाद कि सप्लाई में रुकावट कुछ समय के लिए है और ग्रोथ पर ज्यादा असर पड़ने वाला नहीं है, रिस्क प्रीमियम घटने लगता है।" लड़ाई के समय कई निवेशक डरकर शेयर बाजार से पैसे निकाल लेते हैं। पिछली लड़ाइयों के दौरान ऐसा देखने को मिला है। ऐसे निवेशक बाद में आने वाली रिकवरी का फायदा उठाने का मौका चूक जाते हैं।

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लड़ाई के समय बेस्ट इनवेस्टमेंट स्ट्रेटेजी

लड़ाई के समय निवेश बनाए रखने, पोर्टफोलियो में डायवर्सिफिकेशन और बाजार में गिरावट के मौके पर निवेश बढ़ाने की स्ट्रेटेजी के शानदार नतीजे मिले हैं। अगर इतिहास के संकेतों को माना जाए तो ऐसा लगता है कि लड़ाई की वजह से शेयर बाजार में आई बड़ी गिरावट निवेशकों को शेयरों में निवेश करने का बड़ा मौका देती है।

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