अक्सर एक्सपर्ट्स बताते हैं कि हमें अपने पैसे कहां इनवेस्ट करने चाहिए। पैसे सही जगह सही वक्त पर लगाने से अच्छा रिटर्न कमाने में मदद मिलती है। लेकिन, खुद एक्सपर्ट्स कहां इनवेस्ट करते हैं यह जानना दिलचस्प है। मनीकंट्रोल ने Tata Mutual Fund के चीफ इनवेस्टमेंट अफसर (इक्विटीज) राहुल सिंह से यह जानने की कोशिश की कि वह अपने पैसे को कहां-कहां निवेश करते हैं। हमारा मकसद रीडर्स को यह बताना है कि दूसरों को सलाह देने वाले एक्सपर्ट्स खुद निवेश के मामले में किस तरह की रणनीति अपनाते हैं। उन्होंने निवेश की अपनी 40: 40: 20 स्ट्रेटेजी के बारे में बताया। इस रणनीति के तहत सिंह ने 40 फीसदी पैसा बैलेंस्ड एडवांटेज फंड्स (BAF) में लगाया है। उन्होंने 40 फीसदी का निवेश डायवर्सिफायड इक्विटी में किया है। बाकी 20 फीसदी का निवेश एग्रेसिव प्रोडक्ट्स में किया है।
40: 40: 20 स्ट्रेटेजी का क्या है मतलब?
डायवर्सिफायड इक्विटी फंड्स में मल्टीकैप, लार्जकैप और मिडकैप फंड्स शामिल हैं। एग्रेसिव प्रोडक्ट्स का मतलब स्मॉलकैप फंड्स से है। इस स्ट्रेटेजी की खासियत यह है कि पोर्टफोलियो का 40 फीसदी हिस्सा रिस्क मैनेज करता है। बाकी 40 फीसदी से लगातार रिटर्न मिलता रहता है। बाकी 20 फीसदी कुल पोर्टफोलियो के रिटर्न को बढ़ाने में मददगार होता है। रिटेल निवेशकों को निवेश की इस रणनीति को समझने की जरूरत है। उन्हें यह ध्यान में रखना होगा कि जब ज्यादातर रिटेल इनवेस्टर्स ज्यादा रिटर्न कमाने के लिए शेयरों को जल्द खरीदने और बेचने में लगे हैं तब राहुल सिंह जैसे मार्केट एक्सपर्ट म्यूचुअल फंड्स के जरिए शेयरों में निवेश करना पसंद करते हैं।
क्या सीधे शेयरों में पैसे लगाना सही है?
बड़ा सवाल यह है कि क्या एक रिटेल निवेशको को सीधे स्टॉक्स में पैसे लगाने चाहिए? यह सवाल पूछने पर सिंह बताते हैं कि आम तौर पर होता यह है कि स्मॉल इनवेस्टर्स अच्छी सोच के साथ निवेश करना शुरू करते हैं। वे आम तौर पर स्टॉक को 3-5 साल तक रखने और 12-15 फीसदी CAGR से रिटर्न कमाना चाहते हैं। लेकिन, जल्द उनकी सोच शॉर्ट टर्म ट्रेडिंग की हो जाती है। कई इनवेस्टर्स तो डे-ट्रेडिंग और फ्यूचर एंड ऑप्शंस (F&I) में पैसे लगाना शुरू कर देते हैं। यहीं से दिक्कत शुरू हो जाती है। दरअसल यह फिसलन भरा रास्ता है।
सेबी की स्टडी क्या बताती है?
SEBI के डेटा के मुताबिक, FY22 में एफएंडओ में निवेश करने वाले हर 10 में से 9 निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ा। उनका औसत लॉस 1.1 लाख रुपये था। अगर एक्टिव ट्रेडर्स की बात की जाए जिन्होंने साल में F&O में पांच बार से ज्यादा निवेश किए हैं तो सिर्फ 6 फीसदी ने FY22 में प्रॉफिट कमाए हैं। औसत प्रॉफिट सिर्फ 3,400 रुपये रहा है। डराने वाले इस डेटा के बावजूद F&O ट्रेडिंग में रिटेल इनवेस्टर्स की दिलचस्पी घटने का कोई संकेत नहीं है।
निवेशकों को खुद अपने ट्रैक रिकॉर्ड क्यों देखना चाहिए?
सिंह बताते हैं, "बतौर एक फंड मैनेजर मैं इनवेस्टर्स को यह सलाह नहीं दे सकता कि उन्हें F&O में ट्रेडिंग करनी चाहिए या नहीं। मेरी सलाह सिर्फ यह है कि निवेशकों को डेटा को ध्यान से देखना चाहिए। आपको अपने खुद के ट्रैक रिकॉर्ड को देखना चाहिए। उसके बाद आपको फैसला लेना चाहिए। आखिर में यह फ्री-मार्केट है।" फ्री-मार्केट में रिस्क यह है कि अच्छी जानकारी और प्रोफेशनल ओवरसाइट के अभाव में यह 'फ्री फॉर ऑल' मार्केट बन जाता है। यहीं वजह यह है कि सिंह जैसे एक्सपोर्ट वेल्थ क्रिएशन के लिए 40-40-20 की स्ट्रेटेजी का इस्तेमाल करते हैं।