अमेरिकी बाजारों में तेजी इंडियन मार्केट्स के लिए अच्छा नहीं है, जानिए इसकी वजह

अमेरिकी और भारतीय बाजारों के प्रदर्शन में बड़ा फर्क है। भारत में स्टॉक मार्केट्स का रिटर्न कमजोर बना हुआ है। एसएंडपी 500 और नैस्डेक दोनों नई ऊंचाई पर पहुंच गए। हालांकि, इसमें बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों, एआई इंफ्रास्ट्रक्चर और और सेमीकंडक्टर स्टॉक्स में खरीदारी का बड़ा हाथ है

अपडेटेड Jan 07, 2026 पर 6:46 PM
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इंडियन मार्केट्स का प्रदर्शन जापान और कई उभरते एशियाई बाजारों के मुकाबले भी कमजोर रहा है।

अमेरिकी शेयर बाजार 2026 की शुरुआत में रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गए। वेनेजुएला पर अमेरिका के कब्जे का अमेरिकी बाजारों पर पॉजिटिव असर पड़ा। एसएंडपी 500 और नैस्डेक दोनों नई ऊंचाई पर पहुंच गए। हालांकि, इसमें बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों, एआई इंफ्रास्ट्रक्चर और और सेमीकंडक्टर स्टॉक्स में खरीदारी का बड़ा हाथ है। अमेरिकी बाजारों में बीते तीन सालों से तेजी जारी है।

इंडिया सबसे कम रिटर्न देने वाले बाजारों में शामिल

अमेरिकी और भारतीय बाजारों के प्रदर्शन में बड़ा फर्क है। भारत में स्टॉक मार्केट्स का रिटर्न कमजोर बना हुआ है। इंडिया का बाजार दुनिया में सबसे कम रिटर्न देने वाले बाजारों में शामिल है। जहां अमेरिकी शेयरों का रिटर्न बीते 12 महीनों में 15-16 फीसदी रही है, वही इंडियन मार्केट्स में प्रमुख सूचकांकों का रिटर्न इसके मुकाबले काफी कम रहा है। इंडियन मार्केट के मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों का प्रदर्शन तो और खराब रहा है।


एआई कंपनियों में बढ़ती दिलचस्पी का फायदा इंडिया को नहीं मिला

इंडियन मार्केट्स का प्रदर्शन जापान और कई उभरते एशियाई बाजारों के मुकाबले भी कमजोर रहा है। इससे अब रिटर्न के लिहाज से इंडिया की लीडरशिप पोजीशन नहीं रह गई है। इसका मतलब क्या है? जेफरी की एशिया स्ट्रेटेजी में इंडिया को 'रिवर्स एआई ट्रेड' के बड़े उदाहरण के रूप में पेश किया गया है। भारतीय बाजार ग्लोबल एआई कैपेक्स बूम से काफी दूर रहा है। प्रतिद्वंद्वी बाजारों के मुकाबले भारतीय शेयरों की कीमतें प्रीमियम पर रही हैं।

घरेलू संस्थागत निवेशकों ने इंडियन मार्केट को दिया सहारा

ज्यादा वैल्यूएशंस, सुस्त अर्निंग्स ग्रोथ और विदेशी फंडों के घटते निवेश का असर भारतीय बाजार पर पड़ा है। विदेशी फंडों ने अमेरिका में एआई से जुड़े स्टॉक्स में दिलचस्पी दिखाई है। इधर, इंडिया को घरेलू संस्थागत निवेशकों के भरोसे रहना पड़ा है, जिन्होंने इंडियन मार्केट्स को गिरने नहीं दिया है। अब तक भारतीय निवेशकों का एप्रोच गिरावट पर खरीदारी का रहा है। लेकिन, इससे ग्लोबल रिस्क के दौरान तेजी की गुंजाइश सीमित हो जाती है।

फेडरल रिजर्व की मॉनेटरी पॉलिसी पर टिकी नजरें

कई ग्लोबल एनालिस्ट्स का मानना है कि आगे अमेरिका में मॉनेटरी पॉलिसी पर काफी कुछ निर्भर करेगा। अगर फेडरल रिजर्व की मॉनेटरी पॉलिसी नरम रहती है तो डॉलर कमजोर होगा। ग्लोबल लिक्विडिटी बढ़ेगी और भारत जैसे उभरते बाजारों में इनवेस्टर्स फिर से वैल्यू तलाशेंगे। अगर ऐसा नहीं होता है तो इंडिया के लिए अमेरकी स्टॉक्स का मुकाबला करना मुश्किल होगा, जो अर्निंग्स मोमेंटम और थीम की वजह से चढ़ रहे हैं।

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इंडिया में  बैंक, एनबीएफसी, रियल एस्टेट में दिख सकती है तेजी

जहां तक इंडिया की बात है तो स्ट्रॉन्ग घरेलू डिमांड की वजह से अर्निंग्स ग्रोथ में इम्प्रूवमेंट, कंजम्प्शन में इजाफा, क्रेडिट ग्रोथ और प्राइवेट सेक्टर में कैपिटल एक्सपेंडिचर की वजह से वैल्यूएशन अट्रैक्टिव हो जाएगी। इससे इंडियन मार्केट्स के कुछ पॉकेट्स में जल्द तेजी दिख सकती है। बैंक, एनबीएफसी, रियल एस्टेट और कंजम्प्शन लिंक्ड स्टॉक्स को ग्लोबल और डोमेस्टिक इजिंग साइकिल से सबसे ज्यादा फायदा होगा। फाइनेंशियल कंपनियों को घटती फंडिंग कॉस्ट और लोन ग्रोथ बढ़ने से फायदा हो सकता है।

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