बांग्लादेश फिर बारूद के ढेर पर बैठा! अवामी और BNP से परे देश में अब किसी थर्ड फ्रंट की है मांग
Bangladesh Violence: बांग्लादेश से जो तिस्वीरें सामने आई हैं और जिस तरह से शेख हसीना देश छोड़कर निकलीं। इसने कुछ साल पहले की याद ताजा कर दी, जब एक और दक्षिण एशियाई देश- श्रीलंका में भी लोग ऐसे ही सड़क से लेकर संसद तक संग्राम कर रहे थे और राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा
बांग्लादेश फिर बारूद के ढेर पर बैठा! अवामी और BNP से परे देश में अब किसी थर्ड फ्रंट की है मांग
बांग्लादेश एक बार फिर उबल रहा है। 1971 के मुक्ति संग्राम के बाद से देश ने इतना खून खराबा कभी नहीं देखा, जितना पिछले कुछ महीनों में। कथित तौर पर बांग्लादेश सेना की सलाह पर प्रधान मंत्री शेख हसीना ने इस्तीफा दे दिया और देश छोड़ दिया। खबर लिखे जाने तक जानकारी ये थी कि वो दिल्ली के पास हिंडन IAF बेस पर उतर गईं और NSA अजीत डोबाल ने उनसे मुलाकात।
अजीत डोभाल की मुलाकात के बाद सुरक्षा पर कैबिनेट समिति (CCS) की देर शाम 7, लोक कल्याण मार्ग यानी प्रधानमंत्री आवास पर बैठक हुई। बैठक में PM नरेंद्र मोदी को बांग्लादेश के हालात के बारे में जानकारी दी गई।
बांग्लादेश से जो तिस्वीरें सामने आई हैं और जिस तरह से शेख हसीना देश छोड़कर निकलीं। इसने कुछ साल पहले की याद ताजा कर दी, जब एक और दक्षिण एशियाई देश- श्रीलंका में भी लोग ऐसे ही सड़क से लेकर संसद तक संग्राम कर रहे थे और राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।
हालांकि, इस समय बांग्लादेश में जो कुछ भी हो रहा है, वो काफी हद तक 2011 में अरब स्प्रिंग के दौरान मिस्र में होस्नी मुबारक को सत्ता से बदखल किए जाने से काफी मिलता-जुलता है।
क्यों और कैसे बिगड़ बात?
बांग्लादेश (Bangladesh) के केस में, छात्रों की नाराजदी, सरकार पर गंभीर आरोप, अपने लिए अवसर खोजता विपक्षा ये सब देखने को मिल रहा है। इसका अलावा कई बांग्लादेशी बाहरी हस्तक्षेप के आरोप लगाते भी मिल जाएंगे।
'स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन' ग्रुप की ओर से सरकार नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन पिछले महीने जुलाई में शुरू हुआ था। हाई कोर्ट ने 1971 के मुक्ति संग्राम के नेताओं के परिवार वालों के लिए सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत कोटा बहाल किया था।
कई लोगों को ऐसा लगता है कि कोटा सिस्टम सत्तारूढ़ अवामी लीग पार्टी के रिश्तेदारों को ज्यादा फायदा पहुंचा रही है, क्योंकि बांग्लादेश के सबसे ज्यादा "मुक्तिजोद्धा" इसी पार्टी में हैं।
AFP के मुताबिक, जब तक कि प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा बलों के साथ झड़प नहीं हुई, तब तक तो विरोध प्रदर्शन काफी हद तक शांतिपूर्ण था। इन झड़पों में 200 से ज्यादा लोग मारे गए और 11,000 गिरफ्तार किए गए।
अधिकार समूहों ने अपनी सरकार पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बहुत ज्यादा बल प्रयोग करने का आरोप लगाया है। बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने 21 जुलाई को ज्यादातर आरक्षण खत्म कर दिया।
बड़ी बात ये है कि इन जिन चीजों को शांति से हल किया जा सकता था, उसे भी बड़ा मुद्दा बना दिया गया। प्रदर्शनकारी पिछले हफ्ते कुछ मांग लेकर फिर से लौटे थे, जिसमें हिंसा के लिए हसीना की ओर से खुली माफी, इंटरनेट शुरू करना, कॉलेज और यूनिवर्सिटी को फिर से खोलना और गिरफ्तार किए गए लोगों की रिहाई शामिल थी।
रविवार, 4 अगस्त को हसीना को सत्ता से बेदखल करने के लिए "स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन" देशभर में 'असहयोग आंदोलन' की शुरुआत की।
नए सिरे से विरोध प्रदर्शन के बाद शेख हसीना (Sheikh Hasina) ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारी अब छात्र नहीं बल्कि "आतंकवादी" हैं, जो देश को "अस्थिर करना" चाहते हैं।
1 अगस्त को सरकार ने जमात-ए-इस्लामी और उसकी छात्र शाखा - छात्र शिबिर पर बैन लगा दिया। विरोध प्रदर्शन फिर शुरू हो गया।
विपक्ष ने फैलाई अशांति?
विपक्षी बांग्लादेश नेशनल पार्टी (BNP) और उसके सहयोगी कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी संगठन, जो पाकिस्तान की जमात की शाखा है और जिसने बांग्लादेश नरसंहार में भी सबसे आगे था, दोनों के छात्र विंग विरोध प्रदर्शन में बढ़ चढ़कर शामिल हुए।
जो लोग विरोध स्थलों पर मौजूद थे, उन्होंने बताया "'स्वतंत्रता सेनानियों के चेहरे पर जूते मारो' जैसे नारे लिखी तख्तियां मिलीं। बांग्लादेश के संस्थापक बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की एक मूर्ति को भी आज तोड़ दिया गया और गिरा दिया गया।
इस बीच सेना प्रमुख ने जल्दबाजी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आश्वासन दिया है कि जल्द ही एक अंतरिम सरकार बनेगी और फिर निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से चुनाव की मांग की गई।
शेख हसीना बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं। एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक उदारवादी मुस्लिम देश के रूप में बांग्लादेश की मुक्ति और विकास में उनके परिवार का योगदान काफी ज्यादा है।
उनके कार्यकाल में बांग्लादेश ने विकास में कई जबरदस्त सुधार देखे हैं। हाल तक, बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक थी।
हसीना के तहत, बांग्लादेश ने युद्ध अपराध न्यायाधिकरण बनाया, जिसने बंगाली खून वाले कट्टरपंथी जमात नेताओं को फांसी पर चढ़ा दिया।
फिर भी, हसीना का शासन तेजी से निरंकुश और भ्रष्ट हो गया था। धार्मिक कट्टरपंथियों और पाकिस्तानी समर्थक जमात तत्वों को दूर रखते हुए, उनकी सरकार तेजी से एक-पार्टी, एक-परिवार का शो बन गई थी, जिसमें भाई-भतीजावाद हावी था। 2009 से सत्ता में, पिछले दो चुनाव असल में बिना किसी विरोध के हुए थे, जिनके हजारों सदस्य जेल में थे।
अवामी लगी की जगह कट्टरपंथी!
बांग्लादेश में अवामी लीग का एकमात्र विकल्प सिर्फ ISI के समर्थन वाला BNP-जमात गठबंधन है। इस बाइनरी को ध्यान में रखते हुए किसी तीसरे मोर्चे को उभरने की अनुमति नहीं दी गई है।
इसलिए, भारत, जिसके साथ अवामी लीग के पारंपरिक रूप से घनिष्ठ संबंध रहे हैं, हमेशा हसीना के पक्ष में रहा है। इसमें भारत अकेला नहीं है, चीन भी हसीना का समर्थक है, जिसने ऐतिहासिक कारणों से अमेरिका से दूरी बनाए रखी है।
अमेरिका और ब्रिटेन, जिनके साथ BNP के अच्छे संबंध हैं, वो हसीना सरकार के विरोध प्रदर्शनों को संभालने के तरीके की बेहद आलोचना कर रहे हैं।
इससे पहले भी वाशिंगटन बांग्लादेश चुनाव की निष्पक्षता को लेकर चिंता जता चुका है। वाशिंगटन बांग्लादेश को लेकर इसलिए भी भी परेशान था, क्योंकि हसीना चीन के करीब जी रही थीं।
इसलिए जब हाई कोर्ट ने कोटा सिस्टम को फिर से लागू किया, तब बांग्लादेश बारूद के ढेर पर बैठा था। राजनीतिक मामले में देश को किसी थर्ड फ्रंट की जरूरत है।