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बांग्लादेशी प्रदर्शनकारियों का उमड़ा पाक प्रेम! 1971 में पाकिस्तानी सेना के सरेंडर वाली मूर्तियां तोड़ी

Bangladesh Crisis: बांग्लादेश में इस्लामी चरमपंथियों द्वारा हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाकर किए गए जघन्य कृत्यों के खिलाफ प्रदर्शन के लिए 300 से अधिक भारतीय-अमेरिकी और बांग्लादेशी मूल के हिंदू रविवार सुबह ह्यूस्टन के शुगर लैंड सिटी हॉल में एकत्र हुए

Akhileshअपडेटेड Aug 12, 2024 पर 12:08 PM
बांग्लादेशी प्रदर्शनकारियों का उमड़ा पाक प्रेम! 1971 में पाकिस्तानी सेना के सरेंडर वाली मूर्तियां तोड़ी
Bangladesh Crisis: बांग्लादेश की मुक्ति की याद में बनाई गई एक ऐतिहासिक प्रतिमा को उपद्रवियों ने तोड़ दिया है

Bangladesh Crisis: कांग्रेस नेता शशि थरूर ने सोमवार (12 अगस्त) को कहा कि बांग्लादेश की मुक्ति की याद में बनाई गई एक ऐतिहासिक प्रतिमा को "भारत विरोधी उपद्रवियों" ने तोड़ दिया है। थरूर ने टूटी हुई प्रतिमा की एक तस्वीर शेयर की, जिसमें 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान के आत्मसमर्पण के पल को दर्शाया गया है। बता दें कि बांग्लादेश में बीते कुछ समय से जारी हिंसा के बीच पड़ोसी देश में सत्ता बदल गई है। शेख हसीना के इस्तीफे और फिर संसद भंग होने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश में अंतरिम सरकार बनी है। नई सरकार की ओर से हिंसा बंद करने की कई अपील के बावजूद देश में अराजकता रुकने का नाम नहीं ले रही है।

तिरुवनंतपुरम के सांसद ने X (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में कहा, "मुजीबनगर में 1971 के शहीद स्मारक परिसर में स्थित प्रतिमाओं को भारत विरोधी उपद्रवियों द्वारा नष्ट किए जाने की ऐसी तस्वीरें देखना दुखद है।" उन्होंने कहा, "यह भारतीय सांस्कृतिक केंद्र, मंदिरों और कई स्थानों पर हिंदू घरों पर अपमानजनक हमलों के बाद हुआ है, जबकि मुस्लिम नागरिकों द्वारा अन्य अल्पसंख्यक घरों और पूजा स्थलों की रक्षा करने की खबरें भी आई हैं।"

1971 में क्या हुआ था?

1971 के युद्ध में भारत ने न केवल बांग्लादेश को आजाद कराया, बल्कि पाकिस्तान को भी करारा झटका दिया। इस प्रतिमा में पाकिस्तानी सेना के मेजर जनरल अमीर अब्दुल्ला खान नियाजी द्वारा भारतीय सेना और बांग्लादेश की मुक्ति वाहिनी के समक्ष 'समर्पण के दस्तावेज' पर हस्ताक्षर किए जाने को दर्शाया गया है। मेजर जनरल नियाजी ने अपने 93,000 सैनिकों के साथ भारत के पूर्वी कमान के तत्कालीन जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण था।

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