इंग्लैंड के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने विश्वास मत हासिल कर लिया है। इस तरह फिलहाल उनकी कुर्सी सुरक्षित रहेगी। खास बात यह है कि उनकी अपनी ही पार्टी के सदस्यों ने विश्वास मत पेश किया था। इससे पता चलता है कि अपनी पार्टी में उनके खिलाफ अंसतोष है। इस तरह भले ही उन्होंने विश्वास मत हासिल कर लिया है, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुई हैं।
सोमवार को पेश वोट ऑफ कॉन्फिडेंस (Vote of Confidence) में जॉनसन के पक्ष में 211 सांसदों ने मतदान किया, जबकि विरोध में 148 ने मतदान किया। विश्वास मत हासिल करने के लिए जॉनसन को 180 सासंदों के वोट की जरूरत थी। इस तरह यह साफ हो गया है कि उनके खिलाफ पार्टी में असंतोष के बावजूद उनकी कुर्सी को लेकर खतरा खत्म हो गया है।
इससे पहले 2018 में पूर्व प्रधानमंत्री थेरेसा मे को विश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा था। वह इसमें जीत गई थीं। लेकिन छह महीने बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। एक्सपर्ट्स का कहना है कि जॉनसन की जीत बहुत कम मतों से हुई है, जिससे निकट भविष्य में उन्हें दूसरे वोट ऑफ कॉन्फिडेंस का सामना करना पड़ सकता है।
ब्रिटेन में लोकतांत्रिक परंपरा के मुताबिक, अगर कोई प्रधानमंत्री कॉन्फिडेंस वोट जीतने में सफल रहता है तो अगले 12 महीने तक उसके खिलाफ दूसरा कॉन्फिडेंस मोशन पेश नहीं किया जा सकता। विश्वास मत जीतने के बाद जॉनसन ने संवाददाताओं से कहा, "मैं साथियों का अहसानमंद हूं, जिन्होंने मेरा सपोर्ट किया... अभी हमें बतौर एक सरकार और एक पार्टी एकजुट होने की जरूरत है।"
पिछले महीने आई एक रिपोर्ट के बाद जॉनसन के खिलाफ असंतोष बढ़ गया था। कॉन्फिडेंस वोट की मांग जोर पकड़ने लगी थी। कोविड-19 के लॉकडाउन के दौरान जॉनसन और सरकार के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के पार्टी में शामिल होने को लेकर काफी आलोचना हुई थी।
कॉन्फिडेंस वोट से पहले लेबर पार्टी के नेता कीर स्टार्मर ने अपने सासंदों को जॉनसन के खिलाफ मतदान करने को कहा था। उन्होंने कहा था कि यह मौका लीडरशिप दिखाने और जॉनसन से छुटकारा पाने का है। पिछले कुछ समय से इंग्लैंड की जनता में जॉनसन को लेकर सोच बदली है। विपक्ष इस मौके का फायदा उठाना चाहता है।