चंदन श्रीवास्तव
चंदन श्रीवास्तव
पति-पत्नी दोनों राजघराने के हैं। वैसे तो वह ब्रिटिश प्रिन्स है लेकिन ओप्रा विन्फ्रे के इंटरव्यू में अपनी अमेरिकन पत्नी की हां में हां मिलाने के बाद से सिर्फ हैरी भर रह गया है-बहुत कुछ उतना ही उदास और अकेला जितना कि घर से बगावत कर अपनी प्रेमिका से शादी की जिद में निकला कोई लड़का हो सकता है।
यों तो इस प्रिन्स से शादी के बाद वह अमेरिकन एक्ट्रेस नहीं सिर्फ डचेस ऑफ ससेक्स बनकर रह गई थी और दुनिया भर की औरतों को लगा था कि एक परीकथा सच हुई है, प्रिन्सेस को उसका प्रिन्स मिल गया है मगर ओपरा विन्फ्रे के इंटरव्यू में ब्रिटिश राजघराने के भितरखाने चलने वाले रंगभेद-नस्लभेद पर अंगुली उठाने के बाद मेगन मार्केल सिर्फ औरत होकर रह गई है!
-फकत औरत ! जो घर बसाने की जिद में सारी उम्र गुजारती है और उम्र की एक ढलान पर पहुंचकर उसे लगता है कि घर तो कहीं है ही नहीं, सिर्फ एक के घर से निकलना और दूसरे के घर में जाना भर हुआ है और इस सच को उसका दिल ठीक से मंजूर करे इसके पहले ही दुनिया के सारे घरों से उसे हमेशा के लिए निकाल दिया जाता है !
दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है..
ओपरा विनफ्रे का मशहूर टॉक-शो... प्रिन्स हैरी और मेगन मार्केल का इंटरव्यू... फेसबुक पर मानों आग लगी है, औरत होने के सारे दुख दहक रहे हैं। फेसबुक पर चढ़ी एक पोस्ट लाइकस् बटोरती दूसरी पोस्ट से हैरत से कह रही है-देखो तो दुनिया को सभ्यता सिखाने का दावा करने वाला ब्रिटिश राजघराने को !... इस राजमहल में इतिहास अपने को दोहरा रहा है..
परायेपन का जो बरताव लेडी डायना के साथ हुआ कुछ वही सलूक राजमहल में डायना की बहू मेगन मार्केल के साथ किया इन लोगों ने। यह घराना तो इस इक्कीसवीं सदी में भी नहीं बदला, कोख में पलते बच्चे की चमड़ी के बारे में पूछ रहा है कि रंग उसका उतना उजला होगा या नहीं जितना कि ब्रिटिश राजकुंवर और राजकुंवरियों का होता आया है !
बहू ताने-उलाहने से घुटकर आत्महत्या करना चाहती है, मदद मांगती है कि कोई मेरा इलाज करा दे, इलाज के पैसे दे दे। लेकिन राजघराने में बहू की बात सुनने के लिए मोटी-मोटी दीवारें हैं, आदमी नहीं। बहू की आवाजें राजघराने की दीवारों से टकराकर उसी तक लौट आती हैं ! दुख से दहकते, हैरत से लबरेज होते फेसबुक के पोस्ट को पढ़ते हुए प्रभा खेतान के उपन्यास (आओ, पेपे घर चलें) की याद आती है। इस उपन्यास की एक किरदार कहती हैः “ दुनिया का ऐसा कोई कोना बताओ जहां औरत के आंसू नहीं गिरे..औरत कहां नहीं रोती और कब नहीं रोती। वह जितना भी रोती है, उतनी ही औरत होती जाती है..। ”
मेगन मार्केल ओपरा विनफ्रे के उस लंबे टॉक-शो में रोयी नहीं, सहज बनी रही। दुखों के दाग सीने में छिपाकर लोगों के सामने आने की यह सहजता दुनिया भर की औरतों को घुट्टी में पिलायी जाती है। लेकिन, स्वभाव बनाकर ओढ़ा दी गई इस पारदर्शी सहजता से झांक रहा है कि राजमहल में वह कई बार रोयी, इंटरव्यू इस बात की गवाही दे रहा है।
मेगन की रुलाइयों के मायने तलाशने के लिए आपको पीछे लौटना होगा, उन सालों में जब वह किसी प्रिन्स की प्रिन्सेस ना थी, किसी के बच्चे की मां ना थी, किसी राजघराने की बहू और किसी राजमहल इज्जत ना थी। वह सिर्फ मेगन मार्केल थी-एक अभिनेत्री, एक लेखिका, लाइफ स्टाइल ब्रांड द टिग की एडिटर इन चीफ, अपना खाना आप पकाने और रोज के हिसाब-किताब कंप्यूटर पर नहीं कागज पर कलम से लिखने वाली एक लड़की !
हाफ ब्लैक एंड हाफ व्हाइट...?
अब से कोई पांच साल पहले मेगन मार्केल ने ELLE मैगजीन में छपी अपनी आपबीती में इन्हीं शब्दों में अपना परिचय दिया था। और, दर्ज किया था कि दुनिया को उसके इस परिचय से संतोष नहीं होगा। अमेरिका में सब जानना चाहेंगे कि वह दरअसल है कौन ? और, इसके पीछे ये जानने की मंशा होगी कि उसकी मां किस मूल की है, पिता किस रंग-ओ-नस्ल के हैं। मेगन ने लिखाः मेरे पिता कॉकेशियन(गोरी प्रजाति) हैं, मां अफ्रीकन अमेरिकन..आय ऐम हाफ ब्लैक एंड हाफ ह्वाईट !
मेगन ने लिखा कि ना मैं इस पार थी ना उस पार आपको पूरा का पूरा गोरा होना होता है, आपको पूरा का पूरा काला होना है लेकिन अगर आप इन दोनों के बीच के हुए तो फिर आपकी पहचना पर एक नीम-अंधेरा छाया रहता है, आप दरअसल दूसरों की नजर में कहीं के नहीं होते, आपका वजूद उनके लिए एक धोखा होता है।
सन् 1980 के दशक के शुरुआती वक्त में जब मेगन दूध पीती बच्ची थी तो उसकी मां दुनिया की बाकी माताओं की ही तरह अपनी संतान का जी बहलाने के ख्याल से किसी शाम पड़ोस के बगीचे में निकली तो देखने वालों ने समझा भूरी चमड़ी वाली इस बच्ची को साथ निकली काली चमड़ी की यह औरत निश्चित ही उसकी देखभाल करने वाली दाई होगी।
चमड़ी के रंगत के आधार पर बच्चे की मां और दाई के बीच फर्क करने वाले अस्सी की इसी अमेरिकन सेंस्बिलिटी के खिलाफ लड़ने की जिद के साथ मेगन की परवरिश हुई। मेगन ने ELLE मैगजीन के लेख में याद किया है कि उसे बचपन में बार्बी डॉल के साथ खेलना बहुत पसंद था।
बार्बी डॉल का एक सेट Heart Family के नाम से मिलता था। इसमें एक मॉम डॉल, एक डैड डॉल और इनकी संतान के रुप में दो डॉल और होते थे। गुड्डे-गुड़िों का यह संसार भी रंगभेदी था। आप चाहें तो खालिस गोरे रंग के गुड्डे-गुड़ियों वाली Heart Family ले सकते थे या फिर खालिस काले रंग की। मेगन के पिता ने दोनों ही सेट खरीदे और मेगन की रंगत के हिसाब से उसकी Heart Family बनायी। गुड्डे-गुड़ियों का एक ऐसा परिवार बनाया जिसमें मॉम डॉल काले रंग की थी, डैड डॉल गोरे रंग का और इनके दोनों बच्चे भी इसी तरह अलग-अलग रंगत के। मेगन को क्रिसमिस की संध्या पर गुड्डे-गुड़ियों की ऐसी ही Heart Family उपहार में मिली थी।
आप अपने घर के लोकतंत्र में अपनी पसंद की रंगत का परिवार बना सकते हैं लेकिन राजसत्ता कितनी भी लोकतांत्रिक हो, उसके भीतर जातीय शुद्धता का ख्याल एक ना एक रुप में चला ही आता है। घर में अपनी पसंद की Heart Family से खुश मेगन जब स्कूल पहुंची तो सांतवे दर्जे में इंग्लिश की क्लास में उसे एक पेपर भरने को मिला। जैसे हिन्दुस्तान में धर्म और जाति के खाने बनाकर पूछा जाता है, आप हिन्दू हैं या मुसलमान, आप एससी-एसटी और ओबीसी हैं या सामान्य, उसी तरह नब्बे के दशक के अमेरिकी स्कूल की उस इंग्लिश की क्लास में पेपर पर दर्ज खानों में मेगन को बताना था कि वह हिस्पानी मूल की है या एशियन, वह ब्लैक है या ह्वाईट ?
मेगन ने लिखा हैः मेरे शिक्षक ने कहा कि तुम कॉकेशियन वाले खाने में टिक लगा दो क्योंकि तुम वैसी ही गोरी रंगत की दिखती हो। लेकिन आप सिर्फ एक ही चुन सकते थे जिसका मतलब होता या तो मैं अपने पिता की रंगत को अपनी रंगत मानकर चुनती या फिर मां की रंगत को अपना मानकर किसी खाने में टिक लगाती। मैंने अपनी कलम रोक ली, किसी प्रतिरोध के भाव से नहीं बल्कि भ्रम की हालत में कि करुं तो क्या ? मां को पता चलेगा कि मैं अपनी रंगत को उसकी रंगत से अलग मानती हूं तो मां कितना उदास होगी! मैंने अपनी जातीय पहचान बताने वाले खाने में कुछ ना भरा। मैंने अपनी पहचान को खाली रहने दिया--- एक प्रश्न चिह्न की तरह, एक चरम अधूरेपन की तरह, ठीक वैसा ही जैसा कि मैं हूं।
आखिर इस दर्द की दवा क्या है...
ना हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा की तर्ज पर कहें तो मेगन की कोशिश बहुनस्ली अमेरिका में अपने को निखालिस इंसान बनकर दिखाने की थी। उसने अपनी जातीय पहचान के खाने को हमेशा अधूरा रखा और उस अधूरेपन को अपने लेखक, संपादक और एक्ट्रेस होने की पहचानों से पाटना चाहा था।
आज चालीस की उम्र की दहलीज पर खड़ी यह लड़की कुछ साल पहले ब्रिटिश राजकुमार के प्रेम में पड़ी। उसे लगा होगा कि प्रेम उसे सारी पहचानों के पार ले जायेगा। प्रेम सबसे पहले यही तो करता है, दुनिया आपके ऊपर जितनी पहचान ओढ़ाती है, वह एक झटके में पहचानों के सारे आवरण उतार ले जाता है। आप एकबारगी सारी पहचानों से आजाद हो जाते हैं लेकिन दुनिया कहती है, आप नंगे हैं। मुगल-ए-आजम के दरबार में एक अनारकली शहंशाह के सामने पूरी ढीठाई से यों ही थोड़े बोले थी कि पर्दा नहीं जब कोई खुदा से बंदो से पर्दा करना क्या?
लेकिन मेगन के लिए राजकुमार से प्रेम करना महंगा पड़ा। राजकुमार भले ही उसके साथ खड़ा रहा लेकिन राजघराना उसके पीछे पड़ गया। इस राजघराने का एक इतिहास है। यह राजघराना रिवायतों से चलता है। इस घराने में परित्यक्ता स्त्री से प्रेम करने वाले राजकुमार को राजगद्दी से बेदखल कर दिया जाता है। याद कीजिए लगभग एक सदी पहले की किंग जार्ज अष्टम की प्रेम कहानी। लंदन के नाइटक्लब में भेंट हुई थी किंग जार्ज अष्टम की वैलिस सिम्सन से। मेगन की तरह वह भी तलाकशुदा और अमेरिकन थी।
सिम्सन और जार्ज अष्टम की प्रेमकहानी का क्या हुआ ? प्रधानमंत्री स्टेनले बाल्डविन ने साफ कह दिया कि चाहे तो राजा बनना चुन लो या फिर सिम्सन का पति बनना क्योंकि चर्च ऑफ इंग्लैंड तलाकशुदा औरत से राजे-महाराजे को शादी की इजाजत नहीं देता और परंपरा के अनुसार तुम खुद ही चर्च ऑफ इंग्लैंड के प्रधान हो। किंग जार्ज ने चर्च ऑफ इंग्लैंड और राजघराने की इज्जत और रिवायत को बचाया, राजगद्दी छोड़ दी, सिम्पसन का पति भर बनकर रहना मंजूर कर लिया।
राजकुमार के प्रेम में पड़ी मेगन को यह इतिहास पता होगा लेकिन इतिहास से उसने सबक नहीं लिया। उसने समझा होगा कि वक्त बदल गया है, राज नहीं रहा तो घराना भी बदल गया होगा। लेकिन यहीं उससे चूक हुई। घराना अब भी रिवायतों से चलता है, ग्रेट ब्रिटेन के सांवैधानिक राजतंत्र में धर्म के सिर्फ प्रोटेस्टेंट ही राजा-रानी बन सकते हैं और हां, उनकी रगों में शाही खून का दौड़ता होना भी जरुरी है, वही शाही खून जो उन्हें खालिस गोरा बनाता है।
आप कहेंगे, उत्तराधिकार की लंबी ऋंखला में प्रिन्स हैरी और डचेस मेगन मार्केल बहुत दूर खड़े थे, छठे नंबर पर। उनकी बारी कहां आने को थी राजगद्दी संभालने की? बात ठीक है, लेकिन राजगद्दी संभालने का एक मतलब राजघराना संभालना भी होता है। और, राजघराना तलाकशुदा, हाफ-ह्वाईट, हाफ ब्लैक मैगन मर्केल के होने, उसके मां बनने और राजमहल में राजसी परंपराओं के पालन के साथ रहने में अपनी रिवायत की हानि देख रहा था।
शादी के बाद मर्केल भले ही अपनी पहचान एक फेमिनिस्ट के रुप में गढ़ रही थी और उसे फेमिनिस्ट साबित करने वाली कहानियां अखबारों में छपा करती थीं लेकिन अपने इतिहास को अपना धरोहर समझने वाला राजघराना हमेशा मर्केल में यही देखा करता था कि वह एक औरत है जिसे घराने की रिवायत पर चलते हुए गोरी चमड़ी के राजकुंवर जनने हैं।
शादी के बाद मर्केल फेमिनिस्ट होना और दिखना चाहती थी, लेकिन राजघराना और राजघराने के प्रेम में पड़े लोग उसका बेबी बंप देख और दिखा रहे थे। शादी के बाद मर्केल वेडिंग गाऊन में थी, बेबी बंप था। वह मां थी, पत्नी थी, राजकुंवरी थी, फकत एक औरत भर थी लेकिन अपनी पहचान का खाना खाली रखने की जिद पर टिकी और इंसान बनने को निकली मेगन ना थी।
राजघऱाने ने मर्केल को औरत बताने और समझाने वाली कहानियां गढ़ीं, मर्केल उन कहानियों की कैद में होकर रह गई। परीकथाओं का एक अंत ऐसा भी होता है, राजे और राजघराने रह जाते हैं, उनके भीतर चलने वाली प्रेम-कहानियां दम तोड़ जाती हैं।
(लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक स्कॉलर हैं)
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