पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था: झूठे आंकड़ों से भरा बजट, क्या श्रीलंका की राह पर निकल पड़ा पाक?

आज जब पाकिस्तान अपना ख़र्च चलाने के लिए भी जूझ रहा है। ऐसे में साफ तौर पर पता चल रहा है कि वो भी श्रीलंका बनने की राह पर चल पड़ा है। विदेश मुद्रा भंडार काफी नीचे चला गया है

अपडेटेड Jul 04, 2022 पर 4:46 PM
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पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार 9 अरब डॉलर से भी नीचे चला गया है।

SUSHANT SAREEN 

विदेशी मुद्रा भंडार 9 अरब डॉलर से भी नीचे चले गए हैं. इसका मतलब ये है कि पाकिस्तान के पास विदेश से सिर्फ़ एक महीने की ज़रूरत का सामान आयात करने लायक़ विदेशी मुद्रा भंडार बचा है; खुले बाज़ार में एक डॉलर अब 216 पाकिस्तानी रुपए (PKR) का मिल रहा है, यानी डॉलर के मुक़ाबले पाकिस्तानी रुपए की क़ीमत पिछले एक साल में 33 प्रतिशत से भी ज़्यादा गिर चुकी है; विदेशी मुद्रा बचाने के लिए पाकिस्तान के बैंकों ने आयातकों को क़र्ज़ देना बंद कर दिया है; तो, विदेशी बैंक तेल के आयात के बदले में 100 फ़ीसद नक़दी की मांग कर रहे हैं।

तेल आयात करने की दिक़्क़तों के चलते, पाकिस्तान की कई तेल रिफ़ाइनरी बंद होने की कगार पर हैं; 10-12 घंटे की बिजली कटौती आम हो चली है, जिसका कारोबार और उद्योगों और उनके साथ निर्यात पर बेहद बुरा असर पड़ रहा है; पिछले एक महीने में ही पेट्रोल की क़ीमत 84 रुपए (PKR) और डीज़ल के दाम 120 रुपए बढ़ चुके हैं और पूरी आशंका है कि पेट्रोल-डीज़ल अभी और महंगा होगा.


इसकी एक वजह पेट्रोलियम उत्पादों पर लगाया गया टैक्स कुछ हद तक तेल के बाज़ार का हाल भी है; बिजली सेक्टर का घाटा कम करने के लिए बिजली की दरों में 100 फ़ीसद तक का इज़ाफ़ा होना क़रीब क़रीब तय है; महंगाई आसमान छू रही है और स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़, वित्तीय वर्ष 2023 में पाकिस्तान की महंगाई दर में 25 फ़ीसद तक का उछाल आ सकता है; पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक, स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान (SBP) की नीतिगत ब्याज दरें पहले ही बेहद ऊंची यानी 13.75 प्रतिशत हैं.

अटकलें ये लगाई जा रही हैं कि महंगाई पर लगाम लगाने के लिए पाकिस्तान का स्टेट बैंक, नीतिगत ब्याज दर में एक प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कर सकता है, जिसका मतलब ये होगा कि निजी क्षेत्र के लिए क़र्ज़ लेने की ब्याज दर 14.75 फ़ीसद से ऊपर चली जाएगी. इसका न केवल निजी क्षेत्र पर बुरा प्रभाव पड़ेगा बल्कि, पाकिस्तान सरकार के क़र्ज़ चुका पाने की हैसियत पर भी चोट पहुंचेगी.

दिवालियेपन की कगार पर

सपाट लफ़्ज़ों में कहें तो पाकिस्तान की जेब ख़ाली हो चुकी है. पाकिस्तान की संघीय राजस्व परिषद के एक पूर्व अध्यक्ष के मुताबिक़, पाकिस्तान की हालत दिवालिया होने की हालत में पहुंचने वाली नहीं, बल्कि वो दिवालिया हो चुका है. उन्होंने ये बयान यूक्रेन युद्ध और उसके चलते तेल और खाने-पीने के सामान में आए उछाल के कई महीनों पहले दिए थे. पाकिस्तान अपने पैरों पर खड़े होने लायक़ मुल्क नहीं है, ये बात साल दर साल और स्पष्ट होती जा रही है. 1990 के दशक के दौर से ही पाकिस्तान, हर तीन-चार बरस में कभी उछाल तो कभी सुस्ती के दौर से गुज़रता आ रहा है, जो उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के कार्यक्रम को स्वीकार करने को मजबूर करते हैं. पिछले दो दशकों में पाकिस्तान 11 बार मुद्रा कोष की योजना का हिस्सा बन चुका है और 1958 के बाद से वो 20 से ज़्यादा बार इसे अपनाने के लिए मजबूर हो चुका है.

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पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की बड़ी संरचनात्मक कमज़ोरियों को दूर करने की ईमानदार कोशिश कभी भी नहीं की. इसके बजाय वहां की हुकूमतों ने सुधारों के सुझाव को हमेशा ठोकर ही मारी है. इसका नतीजा ये हुआ है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के सामने खड़ा होने वाला हर नया संकट पिछले से कहीं ज़्यादा गंभीर होता है.

हर संकट से निपटने का पाकिस्तान का एक बंधा-बंधाया तरीक़ा भी है. जब भी कोई आर्थिक संकट पैदा होता है, तो पाकिस्तान सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मदद की गुहार लगाता है, ताकि कुछ राहत मिल सके. इसके साथ साथ, उसके हुक्मरान फिर भीख का कटोरा लेकर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और चीन के सामने खड़े होते हैं, जिससे उन्हें मुफ़्त में कुछ मदद मिल जाए. इसके एवज़ में वो इन देशों से वादा करते हैं कि ये आख़िरी मौक़ा है. जैसे ही ये फौरी आर्थिक बला टलती है, तो पाकिस्तान फिर से मुफ़्त के माल पर शहाना ज़िंदगी बसर करने की राह पर लौट जाता है.

ये शाहख़र्ची कुछ बरस चलती है और फिर नया संकट आ जाता है. हालांकि, इस बार दिक़्क़त ये है कि पाकिस्तान को आसानी से इमदाद मिल नहीं पा रही है. सऊदी अरब ने क़र्ज़ देने के बदले में सख़्त शर्तें सामने रख दी हैं और कोई मदद देने से पहले ये मांग भी की है कि पाकिस्तान, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के कार्यक्रम का हिस्सा बने. कहा जा रहा है कि संयुक्त अरब अमीरात ने क़र्ज़ देने के एवज़ में पाकिस्तान की कुछ सरकारी संपत्तियों को गिरवी रखने की शर्त रखी है.

चीन भी पहले की तुलना में इस बार दान देने से गुरेज़ कर रहा है. इन तीनों ही देशों से पाकिस्तान को इस बार जो मदद मिल पायी है, वो पुराने क़र्ज़ की वापसी में रियायत के तौर पर ही हासिल हो सकी है. ज़ाहिर है, पाकिस्तान को अतिरिक्त मदद के तौर पर बहुत मामूली रक़म ही दी जा रही है.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मदद के लिए गिड़गिड़ाना

ये साफ़ है कि अगर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) मदद नहीं करता है, तो पाकिस्तान अपना क़र्ज़ चुका पाने में नाकाम रहेगा और वो भी श्रीलंका जैसे आर्थिक संकट से दो-चार होगा और फिर उसे बचाने के लिए भी फ़ौरी मदद की दरकार होगी. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने शर्त रखी है कि मदद की नई किस्त (EFF) वो तभी देगा, जब पाकिस्तान को अपने पुराने वादे को निभाते हुए ज़रूरी क़दम उठाए. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने साफ़ कर दिया है कि, पहले की तरह पाकिस्तान द्वारा आधे-अधूरे उपाय करने या मुद्रा कोष को दिखाने भर के क़दम उठाने से इस बार काम नहीं चलने वाला है.

वित्त मंत्री मिफ़्ताह इस्माइल ने सोचा था कि ईंधन पर सब्सिडी में कुछ कटौती करके, वो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को पाकिस्तान की मदद का कार्यक्रम (EFF) दोबारा शुरू करने के लिए राज़ी कर लेंगे. हालांकि, IMF पर पाकिस्तान द्वारा उठाए गए फ़ौरी क़दमों का कोई असर नहीं पड़ा. पिछले कई बरस से पाकिस्तान के साथ काम करके अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को भी उसके हुक्मरानों की चालाकियों का बख़ूबी अंदाज़ा हो चुका है.

इसी वजह से उसने पाकिस्तान के ग़रीबों की मदद के नाम पर अपनी शर्तों में ज़रा भी रियायत देने से इनकार कर दिया. क्योंकि, IMF को पता है कि ग़रीबों और मध्यम वर्ग के नाम पर उससे रियायती क़र्ज़ लेने वाला पाकिस्तान, सारी ज़ुल्मतें आख़िर में इसी तबक़े पर थोप देता है. वहीं, समाज के ऊपरी तबक़े के लोग और शासक वर्ग को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा लागू की गई शर्तों से पूरी तरह बचाकर रखा जाता है.

एक मुल्क के तौर पर पाकिस्तान पर सामंतवादी तबक़े की पकड़ इस क़दर मज़बूत है कि जिस वक़्त पाकिस्तान की हुकूमत अपने अवाम से ये गुज़ारिश कर रही है कि वो अपने वतन के नाम पर इन मुश्किलों को बर्दाश्त कर लें और क़ुर्बानियां दें, उस वक़्त पाकिस्तान के सत्ताधारी तबक़े को किसी भी तरह की मुश्किल से पूरी तरह महफ़ूज़ रखा गया है. वित्तीय वर्ष 2022-23 के लिए आम बजट में सरकारी मुलाज़िमों की तनख़्वाह में 15 प्रतिशत के इज़ाफ़े का ऐलान किया गया है.

इसके अलावा बड़े अफ़सरों (और शायद फ़ौज के अधिकारियों को भी) इस बात की इजाज़त दी गई है कि ‘वो अपनी बेसिक सैलरी के 150 फ़ीसद के बराबर एक अधिकारी भत्ता लेने के हक़दार होंगे.’

इसी दौरान, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से पैसे हासिल करने की बेक़रारी में पाकिस्तान ने पेट्रोलियम उत्पादों पर सभी तरह की सब्सिडी ख़त्म कर दी है और यहां तक कि पाकिस्तान सरकार ने 2022-23 के बज़ट में इन पर टैक्स बढ़ाने का भी इशारा किया है. जब पाकिस्तान ने अमेरिका से घिघियाकर अपील की, तब जाकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने आर्थिक मदद के बदले में लगाई गई शर्तों में कुछ रियायतें दीं.

हालांकि पाकिस्तान को इसके बदले में अपने राजस्व की आय में 436 अरब पाकिस्तानी रुपए का संशोधन करना पड़ा जो 10 जून को पाकिस्तान की अवामी असेंबली में पेश किए गए बजट में 7 ख़रब रुपए के अनुमानित राजस्व के अलावा रक़म है.

झूठे आंकड़ों से भरा हुआ बजट

पाकिस्तान का आम बजट भी विचित्र क़िस्म का दस्तावेज़ था. वैसे तो इसे नेशनल असेंबली के सामने पेश किया गया था (और शायद असेंबली ने उसे पारित भी कर दिया). लेकिन, बजट के आंकड़ों से साफ़ था कि इसका मक़सद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को प्रभावित करना था. बजट के सार में दिये गये कम-ओ-बेश हर आंकड़े में नीचे फुटनोट में लिखा था कि, ‘ये आंकड़े अस्थायी हैं. अंतिम आंकड़े बजट सत्र के दौरान मुहैया कराये जाएंगे.’ या फिर ये लिखा था कि ‘बजट के आंकड़े अनुमानित हैं, जिन्हें बजट को केंद्रीय कैबिनेट की मंज़ूरी के बाद अंतिम रूप दिया जाएगा.’

इसमें कोई शक नहीं कि बजट में पेश की गई संख्या, संसद में बहस के बाद बदल सकती है. हालांकि इससे पहले कभी भी किसी बजट में इस तरह अनुमानित आकलन के बारे में फुटनोट नहीं लिखे गए थे. क्योंकि बजट को पेश किए जाने से पहले इसे कैबिनेट से मंज़ूरी दी जाती है. ऐसे में किसी भी सरकार द्वारा ये कहना कि अंतिम आंकड़े बजट सत्र के दौरान मुहैया कराए जाएंगे, ये इस बात का सुबूत है कि ये आंकड़े महज़ संकेत के लिए इस्तेमाल किए गए थे. आम तौर पर बजट दस्तावेज़ और आर्थिक सर्वे में अनुमानित आंकड़े होते हैं. लेकिन बाद में उन्हें संशोधित कर दिया जाता है और ये काम बजट सत्र के दौरान नहीं होता.

जहां तक अनुमानित या अस्थायी आंकड़ों का सवाल है, तो भी वित्तीय वर्ष 2022-23 का बजट, न केवल आमदनी और ख़र्च के ख़याली आंकड़ों से भरा है, बल्कि इससे भी बुरी बात ये है कि ये पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था की हक़ीक़त का पर्दाफ़ाश करता है. आसान लफ़्ज़ों में कहें तो हुकूमत-ए-पाकिस्तान, जो एक रुपए की कमाई करती है, उसके बदले में वो लगभग दो रुपए ख़र्च करती है.

पाकिस्तान का कुल केंद्रीय राजस्व 4.9 ख़रब रुपए (PKR) का है. वहीं, संघीय सरकार का कुल ख़र्च 9.5 ख़रब रुपए का है. यानी संघीय बजट 4.6 ख़रब रुपए के घाटे वाला है. हालांकि, समस्या ये है कि सरकार की आमदनी के आंकड़े बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं. इसका मतलब ये भी है कि घाटे का आंकड़ा कम करके बताया गया है. कुल राजस्व में 7 ख़रब पाकिस्तानी रुपए टैक्स से और 2 ख़रब पाकिस्तानी रुपए ग़ैर कर वाली आमदनी से बताया गया है. हालांकि इस दो ख़रब रुपए की गैर टैक्स आमदनी में, पेट्रोलियम पदार्थों पर लगाया जाने वाला 750 अरब रुपए का शुल्क शामिल है. इसे पेट्रोल पर पचास रुपए प्रति लीटर का शुल्क लगाकर वसूला जाना है.

इससे इतर, पाकिस्तान की हुकूमत का अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ जो समझौता हुआ है, वो पेट्रोल पर एकमुश्त 50 रुपए लीटर टैक्स लगाने की बात नहीं करता. बल्कि, इसे पांच रुपए प्रति महीने तब तक बढ़ाने का ज़िक्र करता, जब तक ये शुल्क पचास रुपए प्रति लीटर न पहुंच जाए. दूसरे शब्दों में कहें, तो बजट में प्रस्तावित पेट्रोलियम पदार्थों पर शुल्क से 750 अरब रुपए की कमाई का आकलन ग़लत साबित होना तय है.

वित्तीय घाटे का लक्ष्य हासिल करने के लिए बजट में प्रस्ताव रखा गया है कि पाकिस्तान के चार सूबे अपने संसाधनों से 800 अरब रुपए की अतिरिक्त कमाई करेंगे. हालांकि, ये पूरी तरह से काल्पनिक आंकड़ा है क्योंकि पाकिस्तान के सूबे इतना अतिरिक्त राजस्व जुटाते ही नहीं हैं. वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में सूबों के अतिरिक्त राजस्व के तहत 570 अरब रुपए का ज़िक्र किया गया था. वित्त वर्ष 2022-23 का बजट ये दावा करता है कि पाकिस्तान के चारों सूबों ने ये अतिरिक्त कमाई की थी.

हालांकि, सूबों के बजट पर नज़र डालें, तो पता चलता है कि पंजाब सूबे का बजट 116 अरब रुपए सरप्लस था. वहीं सिंध का बजट 10 अरब रुपए के घाटे वाला था. ऐसे में ये कहना पर्याप्त होगा कि पिछले वित्त वर्ष में सूबों के सरप्लस से जिस 570 अरब पाकिस्तानी रुपए की आमदनी का अंदाज़ा लगाया गया था, वो किसी भी सूरत में पूरा नहीं हुआ था. इसी तरह अगले वित्त वर्ष में पंजाब ने 125 अरब रुपए अतिरिक्त आय वाला बजट पेश किया है.

बलूचिस्तान ने 72 अरब रुपयों के घाटे वाला बजट पेश किया तो सिंध ने 34 अरब रुपयों के घाटे वाला बजट पेश किया. वहीं ख़ैबर पख़्तूनख़्वा ने एक संतुलित बजट पेश किया है. दूसरे लफ़्ज़ों में कहें तो संघीय बजट में सूबों की जिस 800 अरब रुपयों की अतिरिक्त आमदनी का ज़िक्र किया गया है, वो रक़म तो कहीं दिखती नहीं. इसमें अगर हम पेट्रोलियम पदार्थों पर शुल्क लगाकर होने वाली आमदनी की कमी को जोड़ दें, तो संघीय बजट घाटे में एक ख़रब रुपए का इज़ाफ़ा हो जाता है.

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वित्तीय ब्लैकहोल

बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए आमदनी के इन आंकड़ों का सीधा असर सरकार की माली हैसियत पर पड़ने वाला है. इस वक़्त जो तस्वीर दिख रही है, उसके मुताबिक़ पाकिस्तान की संघीय सरकार के कुल 4.9 ख़रब रुपए की राजस्व आमदनी का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा या 3.95 ख़रब रुपए तो क़र्ज़ चुकाने में ही ख़र्च हो जाएंगे. इसमें अगर हम 1.52 ख़रब रुपए के रक्षा बजट को जोड़ दें, तो पता चलता है कि पाकिस्तान तो अपने रक्षा बजट का भी एक बड़ा हिस्सा उधार से पूरा करता है.

सरकार की बाक़ी सभी गतिविधियां- सब्सिडी, पेंशन, सरकार चलाने का ख़र्च और विकास की परियोजनाओं को और उधार लेकर चलाया जाता है. हालांकि, अगर पाकिस्तान सरकार की आमदनी वैसी नहीं होती है, जिसका अंदाज़ा बजट में लगाया गया है, जिसकी पूरी संभावना है, तो संघीय सरकार की कुल आमदनी क़र्ज़ चुकाने में चली जाएगी.

वहीं उसका रक्षा बजट पूरी तरह से क़र्ज़ की बिनाह पर चलेगा. अगर महंगाई पर क़ाबू पाने के लिए ब्याज दरें बढ़ाई गईं, तो ये हालात अगले वित्तीय वर्ष में और भी बिगड़ जाएंगे. किसी भी स्थिति में चूंकि पाकिस्तान पर क़र्ज़ का बोझ उसकी GDP की विकास दर से कहीं तेज़ी से बढ़ रहा है, तो इसका मतलब ये है वो क़र्ज़ पर ज़िंदा है और उसके जाल में पूरी तरह फंस चुका है.

वित्त वर्ष 2022-23 में पाकिस्तान सरकार को कस्टम ड्यूटी से 953 अरब रुपए की आमदनी होने का अंदाज़ा लगाया गया है. पाकिस्तान आज क़र्ज़ चुका पाने में मुश्किल का सामना तेज़ी से बढ़ रहे चालू खाते के घाटे (CAD) की वजह से कर रहा है. पिछले वित्त वर्ष में अंदाज़ा लगाया गया था कि देश के अप्रत्यक्ष करों का एक बड़ा हिस्सा- लगभग 46 प्रतिशत– पाकिस्तान कस्टम विभाग द्वारा आयात शुल्क के तौर पर जुटाया गया था.

दूसरे शब्दों में कहें तो कस्टम शुल्क, बिक्री कर, विदहोल्डिंग टैक्स और संघीय आबकारी शुल्क, जिसे आयात पर टैक्स लगाकर वसूला गया था, वो सरकार की अप्रत्यक्ष करों से आमदनी का एक बड़ा हिस्सा था. इसका अर्थ ये है कि सरकार की अच्छी राजस्व वसूली आयात पर आधारित थी और इसका अर्थ ये है कि अगर चालू खाते का घाटा कम करने के लिए आयात में कटौती की जाती है, तो सरकार के राजस्व में गिरावट आएगी.

इन हालात में पाकिस्तान से ये उम्मीद करना बेमानी है कि वो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की वित्तीय घाटे को सीमित रखने की शर्त पूरी कर पाएगा. ये तभी मुमकिन है, जब जमा-ख़र्च तैयार करने में खयाली घोड़े दौड़ाए जाएं.

अर्थव्यवस्था का अवास्तविक ढांचा

बजट से जुड़ी बाक़ी सभी बुनियादी दिक़्क़तों के साथ साथ, जिस व्यापक आर्थिक रूप-रेखा में इसे तैयार किया गया है, वही हक़ीक़त से परे लगती है. मिसाल के तौर पर पाकिस्तानी रुपए (PKR) की डॉलर से तुलना को ही लें. जिस वक़्त एक डॉलर 216 पाकिस्तानी रुपए से भी महंगी दर पर मिल रहा है, उस समय बजट के जोड़-जमा, डॉलर का रेट 183 पाकिस्तानी रुपए रहने का अंदाज़ा लगाकर किया गया है. हालांकि, जिन अजीब बुनियादी आंकड़ों की बिनाह पर ये बजट तैयार किया गया है, उसकी ये इकलौती मिसाल नहीं है.

अगले वित्त वर्ष में महंगाई की दर 11.4 प्रतिशत रहने का अंदाज़ा लगाया गया है, वो भी तब जब महंगाई की दर पहले ही 13 प्रतिशत से ऊपर जा चुकी है और ईंधन, बिजली की दरों और टैक्स बढ़ने से इसमें और इजाफ़ा ही होने वाला है. इसी तरह बजट में पाकिस्तान की GDP विकास दर 5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है, जिसकी संभावना बेहद कम है. सच तो ये है कि बहुत से स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि पाकिस्तान की विकास दर में भारी गिरावट आएगी और ये 2.5 से 3 फ़ीसद ही रहने वाली है. बहुत ज़्यादा उम्मीदें लगाने वाले अर्थशास्त्री भी GDP विकास दर 4 फ़ीसद से अधिक होने की बातें नहीं कर रहे हैं.

पाकिस्तान के निर्यात में ज़्यादातर इज़ाफ़ा सरकार से मिलने वाली सब्सिडी की बुनियाद पर हुआ था, जिनमें अब आगे चलकर कटौती होने वाली है. पाकिस्तान ऐसी सब्सिडी जारी रखने का बोझ नहीं उठा सकता, जिनसे होने वाला लाभ, सब्सिडी के नुक़सान की भरपाई करने लायक़ भी नहीं होता. चालू खाते का घाटा जो GDP का लगभग पांच प्रतिशत है, उसके अगले वित्तीय वर्ष में तीन फ़ीसद रहने का अनुमान लगाया गया है.

लेकिन कैसे? कस्टम ड्यूटी से होने वाली आमदनी का आकलन, चालू खाते में दो प्रतिशत की गिरावट से मेल नहीं खाते हैं. पिछले वित्तीय वर्ष में जो बजट घाटा नौ फ़ीसद के आस-पास रहा था, उसके इस वित्त वर्ष में घटकर महज़ पांच प्रतिशत रहने का अंदाज़ा लगाया गया है. इसका मतलब GDP के चार फ़ीसद के बराबर होता है, जो सीधे शब्दों में कहें तो होने नहीं जा रहा है.

डूबते जहाज़ की साज-सज्जा

पाकिस्तान क़र्ज़ के बोझ तले डूब चुका है. ये बात बजट में पेश किए गए आंकड़ों से साफ़ है, भले ही वो बनावटी ही क्यों न हों. सच तो ये है कि जब कोई संस्था दिवालिया होने वाली होती है, तो वो आंकड़ों में हेरा-फेरी से ख़ुद को बचाने की कोशिश करती है. समस्या ये है कि पाकिस्तान में हमेशा संकट को फ़ौरी तौर पर टालने पर ही ज़ोर होता है, ताकि पाकिस्तान के समय पर क़र्ज़ न लौटा पाने की चुनौती से तुरंत निपटा जा सके.

ये माना जाता है कि अगर पाकिस्तान, मौजूदा संकट से उबर गया, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा. हो सकता है कि ऐसा हो भी जाए, तो ये हालात दो-चार बरस से ज़्यादा टिकने वाले हैं नहीं. उसके बाद पाकिस्तान फिर उसी मकाम पर पहुंच जाएगा. परेशानी इस बात की है कि पाकिस्तान में ऐसा कोई भी नहीं है जो अर्थव्यवस्था में बड़े सुधार करने को तैयार हो, जिससे मुल्क को टिकाऊ विकास की पटरी पर लाया जा सके.

अपनी औक़ात से ज़्यादा फूलने और ख़र्च करने की पाकिस्तान की आदत और विदेश नीति के ख़र्चीले अभियान चलाने की फ़ितरत उस पर भारी पड़ने लगी है. पाकिस्तान ने सोचा था कि अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका पर जीत से वो एक क्षेत्रीय सुपरपावर बन जाएगा. हालांकि आज अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान पर बहुत बड़ा बोझ बन चुका है जहां उसके लाखों डॉलर और महंगे खाद्यान्न ख़र्च हुए जा रहे हैं.

जबकि पाकिस्तान ख़ुद अनाज के मामले में अपना पेट भर पाने की हैसियत में नहीं है और अपनी खपत का एक बड़ा हिस्सा उसे आयात से पूरा करना पड़ता है. स्थानीय मुद्रा में अफग़ानिस्तान से कारोबार करना भी पाकिस्तान को बहुत महंगा पड़ रहा है. जबकि, जो सामान वो अफग़ानिस्तान को देता है, उसका भुगतान पाकिस्तान को डॉलर में करना पड़ता है. इन हालात के बावजूद, पाकिस्तान के बहुत से विशेषज्ञ पूरे आत्मविश्वास से कहते हैं कि दुनिया एक एटमी ताक़त वाले देश को तबाह नहीं होने देगी.

वो भूल जाते हैं कि पूर्व सोवियत संघ के साथ पहले ऐसा हो चुका है. पाकिस्तान के ये विशेषज्ञ ये भी यक़ीन करते हैं कि उनके मुल्क के दोस्त उन्हें बचा लेंगे. लेकिन, पाकिस्तान के दोस्त भी अब ‘शंकालु’ होते जा रहे हैं और उसे अपनी हालत दुरुस्त करने के मशविरे दे रहे हैं. पाकिस्तान की मुफ़्तख़ोरी के दिन ख़त्म हो चुके हैं और आज उसे जो कुछ मिल रहा है, वो भीख में फेंके जाने वाले टुकड़ों से ज़्यादा कुछ नहीं है।

orfonline.org से सांभार

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