Syria War: टैंक और विमानों में नहीं था फ्यूल, ताश के पत्तों की तरह ढह गई असद की सेना, 2 हफ्तों के ऑपरेशन में विद्रोहियों ने ऐसे खत्म की 50 साल की सत्ता
Syria Civil War: सीरिया में विद्रोहियों के हावी होने और असद की सेना की कमजोर पड़ने के पीछे कई बडे़ कारण सामने आए हैं। इस विद्रोह में एक बड़ा रोल तुर्की का भी है। Reuters ने योजना की जानकारी रखने वाले दो सूत्रों के हवाले से बताया कि करीब छह महीने पहले ही विद्रोहियों ने तुर्की को एक बड़े हमले की योजना के बारे में बताया था। हालांकि, तुर्की ने इस पर कुछ नहीं कहा और विद्रोहियों ने इसे उसकी मौन स्वीकृति माना
Syria War: टैंक और विमानों में नहीं था फ्यूल, ताश के पत्तों की तरह ढह गई असद के सेना
सीरिया 13 साल से गृह युद्ध की आग में झुलस रहा था। बशर अल-असद की सत्ता के पतन के बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि ये सिविल वॉर का अंत है। सीरिया की राजधानी दमिश्क में विद्रोहियों के घुसने और राष्ट्रपति बशर-अल असद के देश छोड़कर भागने के साथ ही असद परिवार के 50 साल के शासन का रविवार सुबह नाटकीय ढंग से अंत हो गया। असद सरकार के गिरने का लोगों ने सड़कों पर उतरकर जश्न मनाया और खुशी में हवा में गोलियां भी चलाईं।
सीरिया में विद्रोहियों के हावी होने और असद की सेना की कमजोर पड़ने के पीछे कई बडे़ कारण सामने आए हैं। इस विद्रोह में एक बड़ा रोल तुर्की का भी है। Reuters ने योजना की जानकारी रखने वाले दो सूत्रों के हवाले से बताया कि करीब छह महीने पहले ही विद्रोहियों ने तुर्की को एक बड़े हमले की योजना के बारे में बताया था। हालांकि, तुर्की ने इस पर कुछ नहीं कहा और विद्रोहियों ने इसे उसकी मौन स्वीकृति माना।
दो हफ्ते पहले शुरू हुआ ऑपरेशन
बमुश्किल दो हफ्ते पहले शुरू हुए इस ऑपरेशन में विद्रोहियों ने सीरिया के दूसरे बड़े शहर, अलेप्पो पर कब्जा कर लिया। इस शुरआती जीत और ऑपरेशन की रफ्तार ने सभी को चौंका दिया था।
इसके बाद 10 दिन से भी कम समय में विद्रोही अलायंस राजधानी दमिश्क पहुंच गया और रविवार को असद परिवार के पांच दशकों के शासन को खत्म कर दिया।
असद की कमजोरी ने ही उनकी विरोधी सेना के सितारे बुलंद कर दिए थे। असद की सेना टूट चुकी थी और थकी हुई थी, उनके मुख्य सहयोगी, ईरान और लेबनान का हिजबुल्लाह, इजरायल के साथ चल रही लड़ाई में व्यस्त है और काफी कमजोर भी पड़ गया है। सीरिया का सबसे बड़ा सैन्य समर्थक रूस भी यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा हुआ है, इसलिए फिलहाल वो असद में ज्यादा रुचि नहीं दिखा रहा था।
तुर्की की मौन स्वीकृती
रिपोर्ट में इलाके के एक राजनयिक और सीरियाई विपक्ष के एक सदस्य, सूत्रों ने कहा कि विद्रोही तुर्की को बिना बताए आगे नहीं बढ़ सकते थे। क्योंकि तुर्की युद्ध के शुरुआती दिनों से ही सीरियाई विपक्ष का मुख्य समर्थक रहा है।
इतना ही नहीं उत्तर पश्चिमी सीरिया में तुर्की के कुछ सैनिक भी तैनात हैं, जो विद्रोहियों की मदद करते हैं, जिसमें विपक्षी सीरियन नेशनल आर्मी (SNA) भी शामिल है।
चौंकाने वाली बात ये है कि वो विद्रोही अलायंस के मुख्य गुट हयात तहरीर अल-शाम यानी HTS को एक आतंकवादी समूह मानता है। राजनयिक ने कहा कि विद्रोहियों का ये बोल्ड प्लान HTS और उसके नेता अहमद अल-शरा, जिसे अबू मोहम्मद अल-गोलानी के नाम से जाना जाता है, उसके ही दिमाग की उपज थी।
अल कायदा से अपने पुराने संबंधों के कारण, गोलानी को वाशिंगटन, यूरोप और खुद तुर्की ने भी आतंकवादी घोषित किया हुआ है।
हालांकि, पिछले दशक में HTS, जिसे पहले नुसरा फ्रंट के नाम से जाना जाता था, उसने अपनी छवि को नरम करने की कोशिश की है। HTS का सबसे ज्यादा दबदबा इदलिब पर था, जहां कुछ विशेषज्ञों का कहना है इसने कमर्शियल एक्टिविटी और आबादी पर खूब टैक्स लगाया।
विद्रोहियों का तुर्की को मैसेज- हमारा रास्ता अपनाएं
तुर्की के राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन की सरकार लंबे समय से सीरिया में इस तरह के बड़े विद्रोही हमले का विरोध कर रही है, क्योंकि उसे डर है कि इससे उसके यहां शरणार्थियों की संख्या बढ़ जाएगी और बॉर्डर पार कर काफी सीरियाई लोग उसके यहां शरण लेने पहुंचेंगे। तुर्की ने उत्तर-पश्चिमी सीरिया में लड़ाई को रोकने के लिए 2020 में रूस के साथ एक समझौता भी किया था।
सूत्रों ने बताया कि हालांकि, इस साल की शुरुआत में विद्रोहियों को ये एहसास हुआ कि तुर्की का रुख अब असद को लेकर सख्त हो रहा है। क्योंकि विभाजित कर दिया है। विदेशी समर्थकों की एक श्रृंखला के साथ विद्रोही समूह।
सीरियाई विपक्षी सूत्र ने कहा कि असद को शामिल करने के अंकारा की कोशिश नाकाम होने के बाद विद्रोहियों ने तुर्की के सामने अपना प्लान रखा। इसमें तुर्की को ये संदेश दिया गया, "सालों से दूसरा कोई रास्ता काम नहीं आ रहा है, इसलिए हमारा रास्ता अपनाएं। आपको कुछ भी करने की जरूरत नहीं है, बस आप हस्तक्षेप न करें।"
जब असद सबसे कमजोर स्थिति में थे तब हुआ हमला
इसके बाद विद्रोहियों ने मौका देखा और तब हमला किया जब असद सबसे कमजोर स्थिति में थे। अलग-अलग मोर्चों पर युद्ध लड़ रहे उनके सैन्य सहयोगी रूस, ईरान और लेबनान के हिजबुल्लाह पहले की तरह निर्णायक मारक क्षमता जुटाने में फेल रहे। इन तीनों ने असद को सालों तक सहारा दिया था।
सीरिया की कमजोर पड़ चुकी सेनाएं इस स्थिति में नहीं थीं कि वो अकेले ही विद्रोहियों को रोक सकें। असद शासन के एक सूत्र ने रॉयटर्स को बताया कि भ्रष्टाचार और लूटपाट के कारण मिलिट्री टैंक और लड़ाकू विमानों में फ्यूल तक नहीं बचा था। यह इस बात का उदाहरण है कि सीरियाई राज्य कितना खोखला हो गया है। पिछले दो सालों में सेना का मनोबल बुरी तरह टूट चुका था।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस बार विद्रोही जितनी तैयारी से आए और हमला किया, उसके मुकाबले सीरिया की सेना कुछ भी नहीं थी। इसमें सबसे ज्यादा दिमाग अबू मोहम्मद अल-गोलानी का रहा, जिसने शासन के कमजोर पड़ने का फायदा उठाया।
उन्होंने कहा, "अलेप्पो को इस तरह खोने के बाद, सीरियाई सेना कभी उबर नहीं पाए और जितना ज्यादा विद्रोही आगे बढ़े, असद की सेना उतनी ही कमजोर होती चली गई।"
विद्रोहियों की रफ्तार उम्मीद से ज्यादा तेज
विद्रोहियों की प्रगति की रफ्तार उम्मीद से ज्यादा तेज थी। 5 दिसंबर को हमा पर कब्जा कर लिया गया और रविवार के आसपास होम्स पर कब्जा हो गया, उसी समय सरकारी सेना ने दमिश्क को भी खो दिया।
सीरिया के बाहर एक छोटे विपक्षी समूह सीरियन लिबरल पार्टी के अध्यक्ष बासम अल-कुवातली ने कहा, "भले ही ये विद्रोहियों के लिए अच्छा मौका था, लेकिन किसी को उम्मीद नहीं थी कि सरकार इतनी तेजी से गिर जाएगी। हर किसी को थोड़ी बहुत लड़ाई की उम्मीद तो थी।"
रिपोर्ट में एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से कहा गया वाशिंगटन को विद्रोहियों के लिए तुर्की के फुल सपोर्ट के बारे में पता था, लेकिन उसे इसकी कोई खबर नहीं थी कि अलेप्पो पर हुए शुरुआती हमले के लिए तुर्की ने मौन स्वीकृति दे दी थी।