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क्या आप डेट फंड में निवेश करने जा रहे हैं? पहले डेट ड्यूरेशन और ड्यूरेशन कॉल का मतलब जान लीजिए

इंटरेस्ट रेट्स में कमी आने पर बॉन्ड्स की कीमतें बढ़ती हैं। इसी तरह जब इंटरेस्ट रेट बढ़ रहा होता है तो बॉन्ड की कीमत घटती है। इंटरेस्ट रेट्स में कमी आने पर बॉन्ड्स की कीमतें चढ़ती हैं। ऐसे में लंबी अवधि वाले बॉन्ड को छोटी अवधि वाले बॉन्ड के मुकाबले ज्यादा फायदा होता है

MoneyControl Newsअपडेटेड Apr 20, 2023 पर 10:32 AM
क्या आप डेट फंड में निवेश करने जा रहे हैं? पहले डेट ड्यूरेशन और ड्यूरेशन कॉल का मतलब जान लीजिए
जब इंटरेस्ट रेट घट रहा होता है तो लंबी मैच्योरिटी वाले बॉन्ड्स का प्रदर्शन दूसरों के मुकाबले बेहतर होता है। लेकिन, इंटरेस्ट रेट्स बढ़ने की स्थिति में इनका प्रदर्शन दूसरों के मुकाबले कमजोर होता है।

RBI ने 6 अप्रैल की अपनी मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) में रेपो रेट नहीं बढ़ाने का फैसला किया था। केंद्रीय बैंक पिछले साल मई से इंटरेस्ट रेट (Repo Rate) लगातार बढ़ा रहा था। सवाल यह है कि क्या इंटेरस्ट रेट वृद्धि पर आरबीआई का यह ब्रेक आने वाली मॉनेटरी पॉलिसी में भी लगा रहेगा? इस पर बहस जारी है। एक्सपर्ट्स की इस बारे में अलग-अलग राय है। लेकिन, ज्यादातर एक्सपर्ट्स का कहना है कि आगे इंटरेस्ट रेट में बढ़ोतरी का आरबीआई का फैसला कई चीजों पर निर्भर करेगा। इनमें इनफ्लेशन (Inflation) सबसे अहम होगा। आइए हम ड्यूरेशन फंड्स और ड्यूरेशन कॉल के कॉन्सेप्ट को समझने की कोशिश करते हैं। हम यह भी देखेंगे कि इंटरेस्ट रेट्स में बदलाव का इन पर किस तरह असर पड़ता है।

इंटरेस्ट रेट में उतार-चढ़ाव का डेट फंड्स पर असर

फिक्स्ड-इनकम इनवेस्टमेंट में ड्यूरेशन के कई मतलब होते हैं। किसी बॉन्ड की कीमत या बॉन्ड फंड की एनएवी में होने वाले उतार-चढ़ाव का संबंध इंटरेस्ट रेट में होने वाले बदलाव से होता है। इस उतार-चढ़ाव पर बॉन्ड या बॉन्ड फंड के ड्यूरेशन का भी असर पड़ता है। बॉन्ड का मैच्योरिटी पीरियड जितना लंबा होगा या बॉन्ड फंड का ड्यूरेशन जितना बड़ा होगा उनकी कीमत या एनएवी में उतार-चढ़ाव की उतनी ज्यादा संभावन होगी। इसी तरह मैच्योरिटी पीरियड या ड्यूरेशन कम होने पर उतार-चढ़ाव की संभावना भी कम होगी।

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