सैलरी इंक्रीमेंट सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन कई मिडिल क्लास परिवारों के पर्चेंजिंग पावर में इससे इजाफा नहीं हुआ है। इसकी वजह इनफ्लेशन है। इससे कॉस्ट ऑफ लिविंग, हेल्थकेयर, एजुकेशन और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो गई हैं। कई टैक्सपेयर्स 30 फीसदी टैक्स ब्रैकेट में आ गए हैं, जबकि खर्च करने की उनकी क्षमता नहीं बढ़ी है। सैलरीड टैक्सपेयर्स का मानना है कि टैक्स स्लैब में वृद्धि इनफ्लेशन से लिंक्ड होनी चाहिए। इससे टैक्सपेयर्स को लिविंग कॉस्ट के हिसाब से टैक्स चुकाना होगा।
30 फीसदी टैक्स स्लैब को बढ़ाने की सलाह
टैक्स एक्सपर्ट्स का कहना है कि रियल इनकम पर इनफ्लेशन के असर को देखते हुए 30 फीसदी इनकम टैक्स स्लैब को बढ़ाया जाना चाहिए। अभी इनकम टैक्स की नई रीजीम में 24 लाख रुपये से ज्यादा इनकम पर 30 फीसदी टैक्स लगता है। डीएम हरीश एंड कंपनी के पार्टनर अनिल हरीष ने कहा, "लो स्लैब की वजह से नौकरी शुरू करने वाले लोग भी टॉप ब्रैकेट में आ रहे हैं। यंग इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स इसके उदाहरण हैं। इससे टैक्स कंट्रिब्यूशन की जगह बोझ लगने लगता है।"
स्लैब में सालाना एडजस्टमेंट सीपीआई से लिंक्ड होना चाहिए
पिछले कुछ Union Budget में सरकार ने टैक्सपेयर्स को राहत दी है। लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है कि एनुअल एडजस्टमेंट्स कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) से लिंक्ड होना चाहिए। इसका हर पांच साल पर रिव्यू होना चाहिए। ग्रांट थॉर्टन भारत में ग्लोबल पीपल सॉल्यूशन लीडर अखिल चंदाना ने 30 फीसदी टैक्स के लिए स्लैब बढ़ाकर 35 फीसदी करने की सलाह दी है। अगर कीमतें बढ़ने के साथ टैक्स ब्रैकेट्स नहीं बढ़ते हैं तो लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स चुकाने में खर्च हो जाता है।
टैक्स स्लैब बढ़ाने से मिडिल क्लास को भी होगा फायदा
टैक्स स्लैब्स बढ़ाने से कई तरह के फायदे हो सकते हैं। सिरिल अमरचंद मंगलदास में पार्टनर एसआर पटनायक ने कहा कि सरकार को कुछ डायरेक्ट टैक्स इनकम की कुर्बानी देनी पड़ सकती है, लेकिन मिडिल क्लास परिवारों की खर्च करने ताकत बढ़ने से कंजम्प्शन बढ़ेगा, जीएसटी रेवेन्यू में इजाफा और इनफ्लेशन बढ़ाने वाले दबाव में कमी आएगी। टैक्स स्लैब बढ़ने से सेविंग्स और इनवेस्टमेंट्स बढ़ेंगे जिससे इकोनॉमिक ग्रोथ को सपोर्ट मिलेगा। इससे टैक्स कंप्लायंस भी बढ़ेगा।
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सबसे ज्यादा फायदा सैलरीड टैक्सपेयर्स को होगा
पटनायक ने कहा कि इसका ज्यादा फायदा सैलरीड टैक्सपेयर्स को होगा। टीडीएस घटने से उनकी टेक-होम सैलरी बढ़ेगी। इससे बोनस पर भी ज्यादा टैक्स नहीं लगेगा। टैक्स स्लैब बढ़ने से सेल्फ-एंप्लॉयड लोगों के हाथ में अपने बिजनेस में दोबारा निवेश के लिए ज्यादा पैसे बचेंगे। रिटायर्ड लोगों को भी इससे फायदा होगा, क्योंकि बढ़ती हेल्थकेयर कॉस्ट का उनकी फिक्स्ड इनकम पर कम असर पड़ेगा।