कॉर्पोरेट बॉन्ड्स (Corporate Bonds) का इस्तेमाल कंपनियां फंड जुटाने के लिए करती हैं। इसमें निवेश करने वाले इनवेस्टर्स को पहले से तय रेट से इंटरेस्ट मिलता है। बॉन्ड की मैच्योरिटी के बाद पैसा इनवेस्टर्स को वापस मिल जाता है।
कॉर्पोरेट बॉन्ड्स (Corporate Bonds) का इस्तेमाल कंपनियां फंड जुटाने के लिए करती हैं। इसमें निवेश करने वाले इनवेस्टर्स को पहले से तय रेट से इंटरेस्ट मिलता है। बॉन्ड की मैच्योरिटी के बाद पैसा इनवेस्टर्स को वापस मिल जाता है।
कॉर्पोरेट बॉन्ड्स कई तरह के होते हैं। इनमें सामान्य बॉन्ड्स, टैक्स-फ्री AAA-रेटिंग वाले पीएसयू बॉन्ड्स और पर्पेचुअल बॉन्ड्स शामिल हैं, जिसका इंटरेस्ट रेट अपेक्षाकृत ज्यादा होता है। रेटिंग एजेंसियां कंपनियों के बॉन्ड को अपनी रेटिंग देती हैं।
कंपनियां पब्लिक इश्यू के तहत बॉन्ड जारी करती हैं। लेकिन, वे ज्यादातर प्राइवेट प्लेसमेंट के जरिए बॉन्ड्स इश्यू कर पैसे जुटाती हैं। बॉन्ड हाउसेज और दूसरे इंटरमीडियरी के जरिए भी बॉन्ड में निवेश किया जा सकता है। लेकिन, यहां बड़ी डील होती हैं। डील का साइज हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल के हिसाब से होता है।
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आप ब्रोकर के जरिए स्टॉक एक्सचेंजों (NSE/BSE) से भी बॉन्ड्स खरीद सकते हैं। लेकिन, इसमें लिक्विडिटी, उपलब्धता और प्रभावी रिटर्न की समझ जैसे मसले जुड़े हैं। ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म से भी बॉन्ड खरीदे जा सकते हैं।
कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट के साथ लिक्विडिटी का मसला है। शेयरों और सरकारी बॉन्ड्स के मुकाबले कॉर्पोरेट बॉन्ड्स में कारोबारी वॉल्यूम बहुत कम है। इसके अलावा जो ट्रांजेक्शंस होते हैं, उनका साइज बहुत ज्यादा होता है। इसकी वजह यह है कि इस मार्केट में म्यूचुअल फंड्स, बैंक और इंश्योरेंस कंपनियां जैसे बड़े इनवेस्टर्स डील करते हैं।
डीलिंग हाउसेज होलसेल मार्केट से बॉन्ड्स सोर्स करते हैं। फिर, डील की साइज एचएनआई के हिसाब से तय होती है। एनएसई और बीएसई पर लिस्टेड बॉन्ड्स में भी लिक्विडिटी ज्यादा नहीं होती है। स्क्रीन आधारति ट्रेडिंग बहुत कम होती है। फोन पर बातचीत के जरिए ही डीलिंग होती है।
टेक्नोलॉजी की मदद से बॉन्ड डीलिंग प्लेटफॉर्म के जरिए बॉन्ड की खरीदफरोख्त शुरू हो गई है। ये प्लेटफॉर्म बॉन्ड हाउसेज की तरफ से शुरू किए जाते हैं। ऑनलाइन ट्रेडिंग के लिए आप कहीं से और कभी भी अकाउंट ओपन कर सकते हैं।
डील का मिनिमम लॉट साइज आम तौर पर 2 लाख रुपये होता है। मिनिमिम डील साइज इसलिए तय है, क्योंकि बॉन्ड डील आम तौर पर बीएसई के सेटलमेंट प्लेटफॉर्म के जरिए सेटल होते हैं। बीएसई के इस प्लेटफॉर्म को इंडियन क्लियरिंग कॉर्पोरेशन (ICCL) कहा जाता है। आईसीसीएल सिर्फ आरटीजीएस के जरिए पेमेंट लेता है, जिसकी सीमा 2 लाख रुपये है।
सेबी के प्रस्तावित रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म में कई तरह के सुधार की बात कही गई है। लोगों की राय मिलने और उनके विश्लेषण के बाद अंतिम गाइडलाइंस जारी की जाएंगी।
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