डॉलर के मुकाबले रुपया 2 दिसंबर को गिरकर 89.92 पर आ गया। करेंसी की वैल्यू में उतार-चढ़ाव आम बात है। लेकिन, रुपये में डॉलर के मुकाबले जिस तरह से कमजोरी आई है, वह इनवेस्टर्स, कंज्यूमर्स और ज्यादातर कारोबारियों के लिए अच्छी खबर नहीं है। इससे इनवेस्टर्स को निवेश पर मिलने वाला रियल रिटर्न घट सकता है। इंपोर्ट की कॉस्ट बढ़ने से चीजें महंगी हो सकती हैं। आयात पर निर्भर रहने वाले सेक्टर्स का मार्जिन घटेगा। विदेश में पढ़ाई और विदेश यात्रा की कॉस्ट बढ़ जाएगी।
रुपये में कमजोरी का निवेश पर असर
रुपये में कमजोरी का असर निवेश पर पड़ेगा। स्टॉक मार्केट के सेंटीमेंट पर भी इसका असर पड़ेगा, क्योंकि विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली बढ़ सकती है। बॉन्ड यील्ड बढ़ सकती है, लेकिन कमजोर रुपये के चलते रियल रिटर्न घट सकता है। पुणे के फाइनेंशियल मेंटॉर किरांग गांधी ने कहा, "रुपये में लगातार कमजोरी की वजह से ट्रेड डेफिसिट के मामले में असंतुलन पैदा हो सकता है। इससे इनवेस्टर्स की दिलचस्पी सुरक्षित एसेट्स में बढ़ सकती है।"
अमेरिकी कंपनियों के शेयरों में निवेश
ट्रू नॉर्थ फाइनेंस के फाउंडर लेफ्टिनेंट कनर्ल (रिटायर्ड) रोचक बनर्जी ने कहा कि रुपये में कमजोरी के निगेटिव असर से बचाव के लिए इंटरनेशनल स्टॉक्स या म्यूचुअल फंड्स में निवेश की स्ट्रेटेजी का इस्तेमाल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी से अमेरिकी कंपनियों के शेयरों से रिटर्न सालाना करीब 2-3 फीसदी बढ़ जाता है। गांधी का कहना है कि इनवेस्टर्स पोर्टफोलियो का 10-20 फीसदी ग्लोबल इक्विटीज में इनवेस्ट कर सकते हैं।
इंडियन आईटी और फार्मा स्टॉक्स में निवेश
उन्होंने कहा कि इनवेस्टर्स खासकर अमेरिकी म्यूचुअल फंड्स या इंटरनेशनल म्यूचुअल फंड्स में निवेश कर सकते हैं, क्योंकि यह डॉलर में मजबूती की स्थिति में हेजिंग का काम करता है। साथ ही इंडियन आईटी और फार्मा कंपनियों के शेयरों में निवेश किया जा सकता है। रुपये में कमजोरी से डॉलर में इन कंपनियों का रेवेन्यू बढ़ जाता है। करेंसी में कमजोरी के माहौल में रियल एसेट्स और गोल्ड में निवेश ज्यादा फायदेमंद हो जाता है।
गोल्ड ईटीएफ या एसजीबी में निवेश
गांधी का कहना है कि इनवेस्टर्स गोल्ड ईटीएफ में पोर्टफोलियो का 5-10 फीसदी तक निवेश कर सकते हैं। सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड में भी निवेश किया जा सकता है। इनफ्लेशन और जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता की स्थिति में ये दोनों विकल्प सुरक्षा देते हैं। ग्लोबल इवेंट्स की वजह से भारत सहित दूसरे उभरते देशों की करेंसी पर दबाव बढ़ जाता है। बख्शी ने कहा कि इनवेस्टर्स को निश्चित समय पर अपने पोर्टफोलियो की रीबैलेंसिंग पर ध्यान देना चाहिए। 70-80 फीसदी निवेश घरेलू एसेट्स और 20-30 फीसदी निवेश इंटरनेशनल एसेट्स में किया जा सकता है।