भारत में रियल एस्टेट को अक्सर सुरक्षित निवेश माना जाता है। बहुत से लोग सोचते हैं कि दूसरी प्रॉपर्टी खरीदकर उसे किराये पर देकर स्थायी आय बनाई जा सकती है। लेकिन हकीकत उतनी आसान नहीं है जितनी दिखती है। हाल ही में एक रिपोर्ट ने इस सवाल पर रोशनी डाली है कि क्या दूसरी प्रॉपर्टी से किराये की कमाई वास्तव में लाभकारी है या सिर्फ एक भ्रम।
किराये की आय बनाम निवेश लागत
भारत में रेंटल यील्ड यानी किराये से होने वाली वार्षिक आय, प्रॉपर्टी की कीमत के मुकाबले सिर्फ 2-3% के बीच रहती है। यानी अगर आपने 1 करोड़ की फ्लैट खरीदी है तो सालाना किराया मुश्किल से 2-3 लाख तक ही मिलेगा। वहीं, बैंक एफडी या म्यूचुअल फंड्स जैसे विकल्पों में इससे कहीं बेहतर रिटर्न मिल सकता है।
दूसरी बड़ी चुनौती है वैकेंसी रिस्क। कई बार प्रॉपर्टी महीनों तक खाली रहती है, जिससे न सिर्फ किराये की आय रुक जाती है बल्कि मेंटेनेंस चार्ज, सोसाइटी फीस और टैक्स का बोझ भी मालिक पर ही आता है। खासकर मेट्रो शहरों में जहां किरायेदार जल्दी-जल्दी बदलते हैं, यह समस्या और बढ़ जाती है।
किराये की आय पर टैक्स भी देना पड़ता है। अगर आपके पास दूसरी प्रॉपर्टी है तो उस पर ‘डीम्ड रेंटल इनकम’ का नियम लागू होता है। यानी भले ही घर खाली हो, सरकार मान लेती है कि उससे किराया मिल रहा है और उस पर टैक्स लगाया जाता है। साथ ही, प्रॉपर्टी टैक्स और रिपेयरिंग खर्च भी जेब से ही जाता है।
भावनात्मक बनाम व्यावहारिक सोच
कई निवेशक भावनात्मक कारणों से दूसरी प्रॉपर्टी खरीदते हैं – “अपना घर है तो सुरक्षित है।” लेकिन व्यावहारिक रूप से देखें तो यह निवेश उतना आकर्षक नहीं है। कम यील्ड, टैक्स बोझ और वैकेंसी रिस्क इसे मुश्किल बना देते हैं।
दूसरी प्रॉपर्टी खरीदने से पहले निवेशकों को यह समझना होगा कि यह सिर्फ स्टेटस सिंबल नहीं बल्कि एक वित्तीय जिम्मेदारी भी है। अगर मकसद सिर्फ किराये की आय है तो म्यूचुअल फंड्स, बॉन्ड्स या REITs जैसे विकल्प कहीं ज्यादा बेहतर साबित हो सकते हैं।