ज्वेलरी नहीं खरीदते, फिर भी पड़ेगी महंगे सोने-चांदी की मार; समझिए कैसे
सोना और चांदी भले आप न खरीदें, लेकिन इनकी बढ़ती कीमतें आपकी जेब पर असर डालती हैं। आयात बिल, रुपया, महंगाई, बिजली खर्च और EMI तक पर इसका प्रभाव पड़ता है। समझिए महंगे कमोडिटी बाजार का पूरा गणित।
सोने की ऊंची कीमतें अक्सर यह संकेत देती हैं कि दुनिया में अनिश्चितता बढ़ रही है।
सोना भारतीय अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा है, क्योंकि देश हर साल बड़ी मात्रा में इसका आयात करता है। जब दुनिया भर में सोने की कीमत बढ़ती है, तो आयात बिल भी बढ़ जाता है। इसका सीधा असर व्यापार घाटे पर पड़ता है, यानी आयात और निर्यात के बीच का अंतर बढ़ जाता है।
जब यह अंतर ज्यादा होता है, तो रुपये पर दबाव आता है। रुपया कमजोर होता है तो बाहर से आने वाली चीजें महंगी हो जाती हैं। इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, गैजेट्स, खाने का तेल और मेडिकल उपकरण जैसी रोजमर्रा की जरूरी चीजें भी शामिल हैं। यानी भले ही आप कभी सोना न खरीदें, फिर भी बढ़ती सोने की कीमत का असर आपकी जेब पर पड़ सकता है।
ऊंचा सोना, बढ़ती अनिश्चितता का संकेत
सोने की ऊंची कीमतें अक्सर यह संकेत देती हैं कि दुनिया में अनिश्चितता बढ़ रही है। जब भू राजनीतिक तनाव, आर्थिक सुस्ती या बाजार में घबराहट होती है, तो निवेशक सुरक्षित विकल्प के तौर पर सोने की ओर भागते हैं।
ऐसे समय में विदेशी निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकाल सकते हैं। इससे शेयर बाजार में उतार चढ़ाव बढ़ता है। जो लोग म्यूचुअल फंड, रिटायरमेंट प्लान या SIP में निवेश करते हैं, उनके लिए यह अस्थिरता रिटर्न और लंबी अवधि की बचत को प्रभावित कर सकती है।
महंगी चांदी का उत्पादन पर होगा असर
चांदी को अक्सर सोने जितनी अहमियत नहीं दी जाती, लेकिन उद्योग और टेक्नोलॉजी में इसकी बड़ी भूमिका है। इलेक्ट्रॉनिक्स, बिजली उपकरण, ऑटोमोबाइल और सोलर पैनल में चांदी का इस्तेमाल होता है।
जब चांदी की कीमत बढ़ती है, तो कंपनियों की लागत भी बढ़ती है। स्मार्टफोन, लैपटॉप, घरेलू उपकरण और इलेक्ट्रिक वाहन बनाने वाली कंपनियों का खर्च बढ़ जाता है। धीरे धीरे यह अतिरिक्त खर्च ग्राहकों पर ऊंची कीमतों के रूप में डाला जा सकता है।
चांदी सोलर पैनल के लिए भी जरूरी है। भारत जब रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता बढ़ा रहा है, तो चांदी महंगी होने से सोलर प्रोजेक्ट की लागत बढ़ सकती है। इसका असर बिजली की कीमतों या सरकार के खर्च पर पड़ सकता है।
जब तेल, सोना और चांदी साथ में महंगे हों
सबसे ज्यादा दबाव तब बनता है, जब कच्चा तेल, सोना और चांदी तीनों की कीमतें एक साथ बढ़ जाती हैं। ऐसा आम तौर पर वैश्विक संकट, युद्ध, सप्लाई की कमी या वित्तीय अनिश्चितता के समय होता है।
तेल महंगा होने से सीधे महंगाई बढ़ती है, क्योंकि परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ जाती है। सोना महंगा होना वैश्विक डर का संकेत देता है। चांदी महंगी होने से मैन्युफैक्चरिंग खर्च बढ़ता है। ये तीनों मिलकर कारोबार और अर्थव्यवस्था पर दबाव डालते हैं।
जब कंपनियों का खर्च बढ़ता है, तो मुनाफा घटता है। ऐसे में वे भर्ती धीमी कर सकती हैं, विस्तार टाल सकती हैं या सैलरी बढ़ोतरी सीमित कर सकती हैं। इसका असर धीरे धीरे नौकरी और आय पर पड़ता है।
घरों पर भी इसका असर दिख सकता है। जैसे कि किराना महंगा, बिजली और यात्रा खर्च बढ़ा हुआ, ऊंची ब्याज दरों के कारण महंगी EMI और सैलरी की धीमी रफ्तार। इसी तरह कमोडिटी की बढ़ती कीमतें चुपचाप घरेलू बजट को दबाव में ला देती हैं।
भारत में असर ज्यादा क्यों महसूस होता है
भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल और बड़ी मात्रा में सोना और चांदी बाहर से मंगाता है। इसलिए जब इनकी वैश्विक कीमत बढ़ती है, तो देश को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे रुपया कमजोर हो सकता है, महंगाई बढ़ सकती है और सरकार के बजट पर दबाव आ सकता है। आखिरकार इन सबका असर आम नागरिक की जेब पर ही पड़ता है।
आपको सोने के गहने खरीदने, चांदी में निवेश करने या तेल बाजार को रोज ट्रैक करने की जरूरत नहीं है, फिर भी इनकी बढ़ती कीमतों का असर आप पर पड़ सकता है। जब इनकी कीमतें दुनिया में बढ़ती हैं, तो असर धीरे धीरे किराना बिल, बिजली खर्च, लोन EMI और निवेश रिटर्न में दिखाई देता है। इसीलिए तेल, सोना और चांदी महंगे होने पर अंत में हर भारतीय की जेब पर असर पड़ता है, चाहे वह इन्हें सीधे खरीदे या नहीं।
Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।