Home Loan: घटे हैं होम लोन के इंटरेस्ट रेट्स, घर खरीद लें या किराए के घर में रहने में है फायदा?

फाइनेंशियल एडवाइजर्स का कहना है घर खरीदने या किराए पर रहने का फैसला व्यक्ति को अपनी वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखकर लेना चाहिए। इस मामले में अलग-अलग व्यक्ति के लिए अलग-अलग विकल्प सही हो सकता है

अपडेटेड Feb 21, 2026 पर 7:46 PM
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बैंकों ने होम लोन के इंटरेस्ट रेट्स घटाए हैं। इससे घर खरीदने में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है।

बीते करीब एक साल में आरबीआई के इंटरेस्ट रेट में 1.25 फीसदी की कमी करने के बाद बैंकों ने होम लोन के इंटरेस्ट रेट्स घटाए हैं। इससे घर खरीदने में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है। हालांकि, कोविड के बाद से बड़े शहरों में घरों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। कई इलाकों में तो घर की कीमत आम लोगों की पहुंच से बाहर निकल चुकी है। ऐसे में सवाल है कि घर खरीदने और किराए पर रहने में से किसमें ज्यादा फायदा?

होम लोन में EMI की 15-20 साल की लायबिलिटी 

होम लोन लेकर घर खरीदने पर कई सालों तक हर महीने EMI का पेमेंट करना पड़ता है। आम तौर पर लोग 15-20 साल के लिए होम लोन लेते हैं। इस दौरान वे लोन का पूरा पैसा चुका देते हैं। इसके बाद घर उनका हो जाता है। इस दौरान घर की कीमतें बढ़ती रहती हैं। घर आपके एसेट का हिस्सा बन जाता है। जरूरत पड़ने पर आप इसे बेच सकते हैं, किराए पर दे सकते हैं या खुद के रहने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। इनकम टैक्स की पुरानी रीजीम का इस्तेमाल करने वाले टैक्सपेयर्स होम लोन पर टैक्स बेनेफिट्स का फायदा उठा सकते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अपना घर आपको आजादी देता है। आप अपनी पसंद के हिसाब से घर में बदलाव कर सकते हैं।


रेंट के घर में रहने में फाइनेंशियल फ्रीडम बड़ा फायदा

किराए के घर में रहने के अपने फायदे हैं। आप पर किसी तरह की लॉन्ग टर्म EMI की लायबिलिटी नहीं रहती है। आपको प्रॉपर्टी के मेंटेनेंस की चिंता करने की भी जरूरत नहीं पड़ती है। नौकरी में कई लोगों का ट्रांसफर एक शहर से दूसरे शहर में होता रहता है। ऐसे में किराए के घर में रहने का विकल्प ज्यादा सही है, क्योंकि किसी व्यक्ति के लिए अलग-अलग शहर में घर खरीदना मुमकिन नहीं है। ऐसे में ट्रांसफर के बाद आप आसानी से नए शहर में किराए का घर ले सकते हैं। किराए के घर के साथ आपको दूसरे घर की EMI चुकाने की जरूरत नहीं पड़ती है।

घर की EMI रेंट अमाउंट से कवर होने की गारंटी नहीं 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि कोविड के बाद घर की कीमतें जितनी तेजी से बढ़ी हैं, उतनी तेजी से घर का किराया नहीं बढ़ा है। ऐसे में घर खरीदने के बाद आप जो EMI चुकाते हैं, उसकी रिकवरी रेंट से होने की गारंटी नहीं है। ऐसे में आपको EMI का बड़ा हिस्सा अपनी जेब से चुकाना पड़ सकता है। अगर आपका ट्रांसफर दूसरे शहर में हो जाता है तो आपको EMI के साथ घर के किराए का भी ध्यान रखना पड़ता है। इससे कई लोगों पर वित्तीय दबाव बन जाता है, जिससे उन्हें अपनी दूसरी जरूरतों के साथ समझौता करना पड़ता है।

आप अपनी वित्तीय स्थिति को ध्यान में रख ले सकते हैं फैसला

फाइनेंशियल एडवाइजर्स का कहना है घर खरीदने या किराए पर रहने का फैसला व्यक्ति को अपनी वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखकर लेना चाहिए। इस मामले में अलग-अलग व्यक्ति के लिए अलग-अलग विकल्प सही हो सकता है। उदाहरण के लिए अगर आपकी उम्र कम है और आपकी नौकरी ट्रांसफर वाली नहीं है तो आप घर खरीदने के बारे में सोच सकते हैं। 30 साल का कोई व्यक्ति 15 साल का होम ले सकता है। इससे उसके 45 साल के होने पर उसका होम लोन पूरा हो जाएगा। इसके बाद वह वित्तीय रूप से फ्री हो जाएगा।

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उम्र 40 प्लस तो होम लोन सोचसमझकर ही लें

अगर व्यक्ति की उम्र 40 प्लस है तो उसे घर खरीदने का फैसला सोच-समझकर लेना चाहिए। इस उम्र में व्यक्ति की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं। उस पर अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखरेख की जिम्मेदारी होती है। बजुर्गों के मेडिकल केयर पर काफी पैसे खर्च होते हैं। दूसरा, बच्चों के हायर एजुकेशन पर आजकल काफी पैसे खर्च होते हैं। तीसरा, अगर 45-50 साल का व्यक्ति होम लोन लेता है तो उसे रिटायरमेंट तक या उसके बाद तक होम लोन की EMI चुकाने की लायबिलिटी होती है। इससे उस पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में घर खरीदने से ज्यादा फायदा किराए के घर में रहने में हो सकता है।

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