यूनियन बजट पेश होने की तारीख नजदीक आ रही है। सरकार बजट में इनकम टैक्स स्लैब रेट्स को आसान बनाने और डिडक्शंस बढ़ाने का ऐलान कर सकती है। इससे टैक्सपेयर्स को काफी राहत मिलेगी। सरकार ने पिछले कुछ सालों में इनकम टैक्स के नियमों को आसान बनाने की कोशिश की है। लेकिन, इसे और आसान बनाने की जरूरत है।
1. इनकम टैक्स को इनफ्लेशन से लिंक करने की जरूरत
टैक्स स्लैब की सीमा स्थिर बनी हुई है, जबकि इनफ्लेशन की वजह से कॉस्ट लिविंग बढ़ी है। अगर टैक्स स्लैब रेट्स को इनफ्लेशन से लिंक कर दिया जाता है तो इससे सिर्फ रोजाना के बढ़ते खर्च की वजह से टैक्सपेयर्स को ज्यादा टैक्स वाले ब्रैकेट में जाने से रोका जा सकता है। इनफ्लेशन से स्लैब को लिंक करने से परिवारों के लिए अपना बजट बनाना भी आसान होगा।
लोगों के खर्च करने की आदत खासकर मेट्रो शहरों में काफी बदली है। इससे अपर-मिडिल क्लास के टैक्सपेयर्स उम्मीद से पहले ज्यादा टैक्स वाले स्लैब में पहुंच जाते हैं। सरकार हायर टैक्स स्लैब पर पुनर्विचार कर सकती है। उदाहरण के लिए 30 फीसदी टैक्स के लिए टैक्स स्लैब को बढ़ाकर 30 लाख किया जा सकता है। इसके अलावा स्लैब के बैंड्स को 7 से घटाकर 5 किया जा सकता है।
3. आसान टैक्स रीजीम में भी कुछ डिडक्शन के लाभ
आसान टैक्स रीजीम का मकसद पेपरवर्क घटाना है। अगर इसमें कुछ खास डिडक्शंस को शामिल किया जाता है तो इससे लंबी अवधि में लोगों की वित्तीय सेहत को मजबूती मिल सकती है। इससे सिस्टम जटिल भी नहीं होगा। इसके लिए रिटायरमेंट सेविंग्स, हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम और होम लोन पर डिडक्शन की इजाजत दी जा सकती है।
4. स्टैंडर्ड डिडक्शन को सैलरी से लिंक किया जाए
अभी स्टैंडर्ड डिडक्शन फिक्स्ड है। इससे सैलरी स्ट्रक्चर में फर्क, सिटी से जुड़े लिविंग एक्सपेंसेज या पीएफ में जरूरी कंट्रिब्यूशन पर इसका असर नहीं दिखता है। इसकी जगह स्टैंडर्ड डिडक्शन को सैलरी से लिंक किया जा सकता है। जैसे एंप्लॉयी को सैलरी के 5 फीसदी के बराबर स्टैंडर्ड डिडक्शन दिया जा सकता है। इससे जैसे-जैसे सैलरी बढ़ेगी, स्टैंडर्ड डिडक्शन बढ़ता जाएगा।
5. रेगुलर टैक्स चुकाने वालों को इनसेंटिव
एक निश्चित सीमा के बाद रेगुलेर टैक्स चुकाने वाले लोगों के लिए इनसेंटिव शुरू की जा सकती है। उन्हें सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर के इस्तेमाल प्रायरिटी दी जा सकती है। उन्हें टैक्स अथॉरिटीज से टैक्स के मसलों पर कंसल्टेशन और मेडिकल बेनेफिट्स जैसे फायदे दिए जा सकते हैं।
6. 12 लाख तक की इनकम पर रिटर्न फाइलिंग के आसान नियम
एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) इम्प्रूव्ड डेटा प्री-पॉपुलेशन से 12 लाख रुपये तक की इनकम वाले टैक्सपेयर्स की इनकम से संबंधित ज्यादातर जानकारियां टैक्स अथॉरिटीज के पास उपलब्ध होती हैं। ऐसे टैक्सपेयर्स जिन्हें सेक्शन 87ए के तहत रिबेट मिलता है, वे सिर्फ प्री-फिल्ड डेटा को कनफर्म करने के लिए रिटर्न फाइल करते हैं। उनके लिए आसान या ऑटो-एक्सेप्टेड फाइलिंग सिस्टम शुरू किया जा सकता है। ऐसे मामलों में जिसमें कोई गड़बड़ी नहीं है, रिटर्न फाइल करने से छूट दी जा सकती है। इससे कंप्लायंस बढ़ेगा।
7. दो रीजीम बनाए रखने की जरूरत पर विचार
अभी इनकम टैक्स की नई और पुरानी रीजीम दोनों इस्तेमाल के लिए उपलब्ध हैं। इंडिविजुअल्स को हर साल अपने टैक्स, डिडक्शंस और एग्जेम्प्शंस के बारे में दो बार कैलकुलेशन करना पड़ता है। उसके बाद उन्हें पता चलता है कि उन्हें किस रीजीम में फायदा है। सरकार आने वाले समय में यह फैसला ले सकती है कि दो रीजीम को बनाए रखना व्यावहारिक है या नहीं।
हिरेन शाह-एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर, डेलॉयट इंडिया और मीना खिवासरा-मैनेजर, डेलॉयट इंडिया