पुरानी इनकम टैक्स डिमांड्स के सामने आने से टैक्सपेयर्स उलझन में, जानिए क्या है पूरा मामला

कई मामलों में तो चुकाए नहीं गए बकाया पर इंटरेस्ट का अमाउंट बढ़कर ऑरिजिनल टैक्स अमाउंट से ज्यादा हो गया है। ये डिमांड्स अपने आप में सही हो सकते हैं। सालों पहले इश्यू किए गए नोटिसेज और एसेसमेंट ऑर्डर्स पर आधारित ये डिमांड्स डिपार्टमेंट की मुश्किल बढ़ा सकते हैं

अपडेटेड Jan 03, 2026 पर 5:37 PM
कुछ टैक्सपेयर्स तो इन डिमांड्स की वैलिडिटी पर सवाल उठा रहे हैं।

इनकम टैक्स के पोर्टल पर टैक्स की पुरानी डिमांड्स दिख रही हैं। इनमें 2009-11 और यहां तक कि 2005 तक की डिमांड्स शामिल हैं। इससे टैक्सपेयर्स उलझन में पड़ गए हैं। उन्हें इन डिमांड्स की वजह के बारे में कोई जानकारी नहीं है। कुछ टैक्सपेयर्स तो इन डिमांड्स की वैलिडिटी पर सवाल उठा रहे हैं।

कई मामलों में ऑरिजिनल टैक्स से ज्यादा हो चुका है इंटरेस्ट 

इकोनॉमिक टाइम्स ने अपनी खबर में कहा है कि कई मामलों में तो चुकाए नहीं गए बकाया पर इंटरेस्ट का अमाउंट बढ़कर ऑरिजिनल टैक्स अमाउंट से ज्यादा हो गया है। अचानक बहुत पुराने डिमांड्स के दिखने की वजह इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की डिजिटाइजेशन की कोशिश हो सकती है। डिपार्टमेंट इनकम टैक्स पोर्टल पर पुराने रिकॉर्ड को डिजिटाइज कर रहा है।


सालों पहले इश्यू किए गए ये डिमांड्स बढ़ा सकते हैं मुश्किल

इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, अचानक पुरानी टैक्स डिमांड्स दिखने से टैक्स अथॉरिटीज और टैक्सपेयर्स दोनों के लिए स्थिति अजीब हो गई है। ये डिमांड्स अपने आप में सही हो सकते हैं। सालों पहले इश्यू किए गए नोटिसेज और एसेसमेंट ऑर्डर्स पर आधारित ये डिमांड्स डिपार्टमेंट की मुश्किल बढ़ा सकते हैं।

तय नियम के मुताबिक नोटिसेज पर कार्यवाही की समयसीमा खत्म

उदाहरण के लिए, फाइनेंशियल ईयर 2009-10 के लिए 1 लाख रुपये से ज्यादा के एसेसमेंट के लिए नोटिस जारी करने की डेडलाइन तब के नियम के हिसाब से 31 मार्च 2027 थी। 31 दिसंबर, 2027 तक एसेसमेंट ऑर्डर का पास होना जरूरी थी। उसके बाद आम तौर पर डिमांड नोटिस जारी होता। तब टैक्सपेयर्स के पास ऑर्डर मिलने के 30 दिन के अंदर कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स (अपील) के समक्ष अपील फाइल करना होता था।

एसेसी डिमांड नहीं मिलने का कर सकते हैं दावा

हालांकि, इकोनॉमिक टाइम्स ने यह पाया है कि कई एसेसी अब यह क्लेम कर सकते हैं कि उन्हें कभी एसेसमेंट या डिमांड ऑर्डर्स नहीं मिले। या तो ये डिलीवर नहीं हुए या इन्हें गलत पते पर भेजा गया। इसके चलते उन्हें तय समय के अंदर अपील करने का मौका नहीं मिला। इस बीच बकाया अमाउंट पर इंटरेस्ट हर साल बढ़ता गया। ऐसे मामलों में टैक्सपेयर्स इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से डिलीवरी का प्रूफ मांग सकते हैं।

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प्रोसिजरल लैप्सेज का संकेत हो सकता है यह मामला

आशीष करुंडिया एंड कंपनी के फाउंडर आशीष करुंडिया ने इकोनॉमिक टाइम्स को बताया, "यह साबित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से टैक्स अथॉरिटीज पर आती है कि कानूनी नोटिसेज विधिवत भेजे गए थे और एसेसमेंट और डिमांड ऑर्डर्स तय सीमा के अंदर कम्युनिकेट किए गए थे।" पुराने टैक्स डिमांड्स के अचानक सामने आने से टैक्स ऑर्डर्स के कम्युनिकेशंस में प्रोसिजरल लैप्सेज का संकेत मिलता है।

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