कई टैक्सपेयर्स को इस बार रिफंड के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा है। रिवाइज्ड रिटर्न और बिलेटेड रिटर्न फाइल करने की 31 दिसंबर की डेडलाइन बीत जाने के बाद उनकी उलझन और बढ़ गई है। कई टैक्सपेयर्स को लगता है कि उनका रिफंड का पैसा फंस जाएगा। सवाल है कि क्या वाकई टैक्सपेयर्स का रिफंड फंस सकता है?
टैक्स एक्सपर्ट्स का कहना है कि टैक्सपेयर्स की यह सोच नहीं है। साल बदल जाने का मतलब यह नहीं है कि रिफंड का पैसा नहीं आएगा। सवाल यह है कि क्या टैक्सपेयर ने सही तरह से रिफंड फाइल किया था और रिफंड फंसने की वजह क्या है।
सेक्शन 154 के तहत रेक्टिफिकेशन का रिक्वेस्ट
अगर आपका इनकम टैक्स रिटर्न प्रोसेस हो चुका है और आपको सेक्शन 143(1) के तहत इंटिमेशन मिला है, लेकिन रिफंड का अमाउंट आपको कम लग रहा है या किसी गलती की वजह से इश्यू नहीं हुआ है तो आप सेक्शन 154 के तहत रेक्टिफिकेशन रिक्वेस्ट फाइल कर करेक्शन का रिक्वेस्ट कर सकते हैं।
31 दिसंबर के बाद भी रेक्टिफिकेशन की इजाजत
इस रास्ते का इस्तेमाल आम तौर पर ऐसे मामलों में होता है जिनमें टीडीएस या टीसीएस डिटेल्स में मिसमैच होता है, टैक्स या इंटरेस्ट कंप्यूटेशन में एरर होता है, कैलकुलेशन में सामान्य गलती या लॉसेज के कैरी-फॉरवर्ड से जुड़ा कोई मसला होता है। इनकम टैक्स के ई-फाइलिंग पोर्टल पर रेक्टिफिकेशन की फैसिलिटी उपलब्ध है। 31 दिसंबर की डेडलाइन बीत जाने के बाद भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
सेक्शन 154 के तहत रेक्टिफिकेशन और रिवाइज्ड रिटर्न में क्या फर्क है?
रिवाइज्ड आईटीआर तब फाइल किया जाता है जब आपके ऑरिजिनल रिटर्न में कोई बड़ी गलती होती है। जैसे आप इनकम का कोई सोर्स बताना भूल गए हैं, डिडक्शन का गलत क्लेम किया है, अपनी व्यक्तिगत जानकारी गलत दी है या गलत आईटीआर फॉर्म का चुनाव किया है। रिवाइज्ड रिटर्न के जरिए आप इन सभी गलतियों को ठीक कर सकते हैं।
आईटीआर में रेक्टिफिकेशन तब किया जाता है जब रिटर्न प्रोसेस हो चुका होता है। इसका मकसद सिर्फ जोड़घटाव में गलती, टैक्स क्रेडिट में मिसमैच या गलत पैन या जेंडर की डिटेल ठीक करना होता है। आसान शब्दों में कहा जाए तो रिवाइज्ड रिटर्न का मतलब इनकम टैक्स फाइलिंग में हुई गलती को ठीक करना है। रेक्टिफायड रिटर्न के जरिए प्रोसेसिंग में हुई किसी गलती को ठीक करना है।
अगर आपका रिटर्न प्रोसेस में है तो इंतजार कीजिए
अगर आपका इनकम टैक्स रिटर्न 'अंडर प्रोसेसिंग' है तो आपको अपनी तरफ से तुरंत कोई कदम उठाने की जरूरत नहीं है। कानून के तहत सेंट्रलाइज्ड प्रोसेसिंग सेंटर (CPC) को प्रोसेसिंग पूरा करने और इंटिमेशन भेजने के लिए निश्चित समय मिला हुआ है।
रिटर्न प्रोसेस में कितना समय लगता है?
टैक्सपेयर ने जिस फाइनेंशियल ईयर में रिटर्न फाइल किया है, उसके खत्म होने के 9 महीने बीत जाने के बाद सीपीसी आईटीआर को प्रोसेस नहीं कर सकता है। उदाहरण के लिए अगर आईटीआर 31 जुलाई, 2025 को फाइल किया गया है या मान लीजिए 31 दिसंबर को फाइल किया गया है तो सीपीसी 31 दिसंबर, 2026 से पहले किसी समय रिटर्न को प्रोसेस कर सकता है। उसके बाद नहीं कर सकता।
एनए शाह एसोसिएट्स के पार्नटर (टैक्स) गोपाल बोहरा ने कहा कि ऐसे मामलों में जिनमें सीपीसी निर्धारित समय के अंदर रिटर्न को प्रोसेस नहीं कर पाता है और रिटर्न को एसेसमेंट या रीएसेसमेंट के लिए नहीं लिया जाता है तो टैक्सपेयर रिफंड का हकदार हो जाता है। उसे आईटीआर में क्लेम किया गया रिफंड सेक्शन 244ए के तहत इंटरेस्ट के साथ मिलेगा। समयसीमा बीत जाने के बाद भी प्रोसेसिंग नहीं होने पर टैक्सपेयर्स इनकम टैक्स के ई-फाइलिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करा सकता है या सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रिवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम (CPGRAMS) प्लेटफॉर्म के जरिए मामला उठा सकता है।