कोरोना के हल्के लक्षण के साथ अस्पताल में हुए हैं भर्ती? बीमा कंपनियां खारिज कर सकती हैं आपका क्लेम

क्लेम खारिज होने का एक कारण यह है कि कुछ मरीज इस आशंका से अस्पतालों में भर्ती हो जाते हैं कि उनकी स्थिति बाद में गंभीर हो सकती है

अपडेटेड Jan 19, 2022 पर 3:20 PM
बीमा कंपनियों का कहना है कि उनके फैसले ICMR की तरफ से बनाए गए इलाज प्रोटोकॉल पर आधारित होते हैं

लाखों मुंबईवासियों की तरह, 51 वर्षीय उद्यमी सुकेश जैन (बदला हुआ नाम) भी इस महीने की शुरुआत में अपनी पत्नी और बेटी के साथ कोरोना संक्रमण के शिकार हो गए। उनकी पत्नी और बेटी जहां घर पर ही कुछ दिनों में ठीक हो गए, वहीं जैन ने एक अस्पताल में भर्ती होने का फैसला किया क्योंकि वह शुगर के रोगी हैं। अस्पताल में तीन दिनों तक भर्ती रहने के बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई, लेकिन उनकी हेल्थ बीमा कंपनी ने उनके कैशलेस दावे को इस आधार पर खारिज कर दिया कि उन्हें कोरोना के हल्के लक्षण थे और उनकी स्थिति अस्पताल में भर्ती होने लायक नहीं थी।

उनके फाइनेंशियल एडवाइजर ने मनीकंट्रोल को बताया, "सुकेश जैन को हल्का बुखार और खांसी थी। हालांकि उन्हें पहले से भी कई बीमारियां थीं। ऐसे में डॉक्टरों ने उनके स्थिति का मूल्यांकन करने के बाद जैन को अस्पताल में भर्ती होने का सलाह दिया। उन्हें इलाज के दौरान रेमडेसिविर भी दिया गया (जो केवल अस्पताल में ही संभव है)। फिर भी, बीमा कंपनी ने उनके कैशलेस दावे को खारिज कर दिया।" सुकेश जैन ने इसे लेकर नियामक के पास शिकायत की और फिलहाल इस मामले में शिकायत निपटारा प्रक्रिया जारी है।

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कोरोना के हल्के लक्षण वाले मरीजों का इलाज

मनीकंट्रोल ने पिछले साल भी ऐसे कुछ मामलों को उजागर किया था जहां बीमा कंपनियों ने इस आधार पर कोरोना मरीजों के दावों को खारिज कर दिया था कि उनकी स्थिति अस्पताल में भर्ती होने लायक नहीं था। इनमें से कुछ दावों का भुगतान तब किया गया जब पीड़ित पॉलिसीधारकों ने बीमा लोकपाल के दरवाजे खटखटाए।

फाइनेंशियल प्लानिंग कंपनी NRP Capitals के फाउंडर ऋषभ पंत ने बताया, "मरीज को कब भर्ती होना है और कब नहीं, यह फैसला बीमा कंपनी नहीं कर सकती है। बल्कि डॉक्टरों और अस्पतालों को ये तय करना होता हैं। मरीज खुद नहीं फैसला करता है कि उसे अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत है या नहीं। आमतौर पर कोई भी विकल्प मिलने पर अस्पताल में भर्ती होने की जगह घर पर इलाज कराना पसंद करेगा। ऐसे में बीमा कंपनियों को मरीजों को संदेह का लाभ देना चाहिए। हमने देखा है कि आम तौर पर कॉरपोरेट ग्रुप हेल्थ क्लेम की सेटलमेंट प्रकिया, रिटेल पॉलिसी के क्लेम सेटलमेंट की तुलना में आसान होता है।"

हल्के लक्षण वाले मरीजों के लिए क्या है ICMR की गाइडलाइन?

ओमीक्रोन वेरिएंट के मामले बढ़ने से इस तरह के केसों की संख्या और बढ़ सकती है क्योंकि ओमीक्रोन संक्रमित अधिकतर व्यक्तियों में हल्के या मध्यम लक्षण ही देखे जा रहे हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) का कोरोना इलाज के लिए जो नया प्रोटोकाल आया है, उसके मुताबिक अगर किसी को बुखार के साथ श्वसन तंत्र में इंफेक्शन होता है, लेकिन उसे सांस लेने में कोई तकलीफ नहीं हो रही है या उसका ऑक्सीजन लेवल कम नहीं हो रहा है तो उसे हल्के लक्षण वाला मरीज माना जाएगा। ऐसे कोविड मरीजों को घर पर ही इलाज की सलाह दी जाती है।

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देश की सबसे बड़ी जनरल इंश्योरेंस कंपनी, न्यू इंडिया एश्योरेंस के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, अतुल सहाय ने बताया, "शुरुआती आंकड़ों से पता चलता है कि दूसरी लहर की तुलना में अभी अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों के क्लेम की संख्या कम है। ज्यादातर मरीज घर पर ही ठीक हो रहे हैं। हालांकि कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो घबरा कर अस्पतालों में भर्ती हो गए। हम इसे लेकर चिंतित हैं, लेकिन हमन उनके क्लेम को खारिन नहीं किया है।"

हल्के लक्षण वाले कोरोना मरीजों के क्लेम का नहीं होगा निपटारा?

अतुल सहाय का कहना है कि कंपनी का निर्णय इलाज करने वाले डॉक्टरों के सलाह और ICMR की तरफ से बनाए गए इलाज प्रोटोकॉल पर आधारित होता है। उन्होंने कहा, "मोटे तौर पर बुजुर्ग, पहले से किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित और वैक्सीन की पूरी डोज नहीं लेने वाले लोगों के संक्रमण के चपेट में अधिक आने और उन्हें अस्पतालों में भर्ती होने की अधिक जरूरत होती है। ऐसे में अस्पतालों की ही अंत में फैसला करना होता है वह किस मरीज को भर्ती कर रहे हैं और किसे नहीं है। हम समझते हैं कि कई अस्पताल आमतौर पर हल्के लक्षणों वाले कोविड मरीजों को भर्ती नहीं कर रहे हैं।”

बीमा कंपनियों का कहना है कि वे ICMR की तरफ से जारी दिशा-निर्देशों पर ही चल रहे हैं। Niva Bupa Health Insurance के डायरेक्टर (अंडरराइटिंग, प्रोडक्ट एंड क्लेम) भाबातोष मिश्रा ने बताया, "कोरोना इलाज को लेकर ICMR प्रोटोकॉल में साफ तौर पर बताया गया है कि कब किसी मरीज का घर पर इलाज करना चाहिए, कब उसे अस्पताल में भर्ती कराया जाना चाहिए, कब उसे ऑक्सीजन से लैस बेड पर ले जाना चाहिए और कब उसे ICU में भर्ती कराना चाहिए। बीमा कंपनी के रूप में, हम इस निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन करते हैं। कोरोना महामारी में हमने देखा है कि लहर तेज होने पर अस्पतालों में कैसे बेड की कमी हो जाती है। जिन रोगियों का इलाज घर पर किया जा सकता है अगर उन्हें भी भर्ती कर लिया जाएगा, तो जिन रोगियों को अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता होती है, उन्हें समय से बेड नहीं मिल पाएगा। इसलिए, ऐसे मामलों में जहां हल्के लक्षण वाले मरीजों को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं थी, फिर भी उन्हें गलती से भर्ती कराया गया, हम दुर्भाग्यवश उनके क्लेम का भुगतान नहीं कर सके।"

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बीमा कंपनियां कैसे खारिज करती हैं क्लेम?

कुछ बीमा ब्रोकिंग और मैनेजमेंट फर्में भी इस बात की पुष्टि करती हैं कि हल्के लक्षण वाले मरीजों के अस्पताल में भर्ती होने वाले मामले में बीमा कंपनियां उनके दावों को खारिज कर रही है। Sureclaim.in के फाउंडर अनुज जिंदल ने बताया, "क्लेम खारिज होने का एक कारण यह है कि कुछ मरीज इस आशंका से अस्पतालों में भर्ती हो जाते हैं कि उनकी स्थिति बाद में गंभीर हो सकती है। ऐसे मामलों में, हमने देखा है कि यदि भर्ती होने के समय स्थिति गंभीर नहीं है और पूरे समय इसी तरह बनी रहती है, तो कुछ बीमा कंपनियां क्लेम को खारिज कर देती हैं।"

क्लेम दाखिल होने के बाद बीमा कंपनियां भी अपने स्तर से जांच कराती हैं और अगर मरीज की स्थिति अस्पताल में बताई स्थिति से मेल नहीं खाती है, तो उनके क्लेम खारिज हो जाते हैं। एक हेल्थ-टेक फर्म Onsurity के को-फाउंडर और सीओओ कुलीन शाह ने बताया, "बीमा कंपनियों की ओर से डॉक्टरों की टीम मरीज के क्लीनिकल डॉक्यूमेंट और डॉक्टरों की दी गई सिफारिश के आधार पर यह तय करती है कि उसे अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता है या नहीं।"

पॉलिसीधारकों के लिए ये है आखिरी सहारा

अगर बीमा कंपनी ने आपके हेल्थ क्लेम को खारिज कर दिया है और अगर आपको लगता है कि आपका अस्पताल में भर्ती होना उचित था, तो आपको बीमा कंपनी के फैसले को अंतिम मानकर स्वीकार करने की जरूरत नहीं है। ऐसी स्थिति में आप सबसे पहले बीमा कंपनी के शिकायत निपटारा वाले विभाग में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। अगर यहां आपते शिकायत का संतोषजनक निपटारा नहीं होता है तो आप अपने शहर में स्थित बीमा लोकपाल ( Insurance Ombudsman) का दरवाजा खटखटाना चाहिए। यहां भी कुछ नहीं होने पर आप कंज्यूमर कोर्ट का रुख कर सकते हैं, जो ऐसे सभी मामलों में अंतिम उपाय होता है।

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