इंश्योरेंस कंपनियां क्लेम खारिज करने की वजह तलाशती रहती हैं। इंश्योरेंस आर्थिक नुकसान से बचने के लिए कराया जाता है। ऐसे में इंश्योरेंस कंपनी के क्लेम खारिज कर देने पर काफी निराशा होती है। हाल में एक व्यक्ति की कार को आग लगने से काफी नुकसान पहुंचा। बीमा कंपनी ने क्लेम रिजेक्ट कर दिया। उसकी दलील थी कि कैमरा में शॉर्ट सर्किट की वजह से आग लगी। यह कैमरा कंपनी फिटेड नहीं था। इसलिए क्लेम नहीं दिया जा सकता। क्या बीमा कंपनी इस तरह क्लेम रिजेक्ट कर सकती है? मनीकंट्रोल ने इस सवाल का जवाब जानने के लिए एक्सपर्ट से बातचीत की।
स्टैंडर्ड इंश्योरेंस पॉलिसी में इलेक्ट्रिकल या मैकेनिकल ब्रेकडाउन शामिल नहीं
एक्सपर्ट ने कहा कि इस मामले में कार में आग कैमरे की वायरिंग में शॉर्ट सर्किट से लगी। फॉरेंसिक रिपोर्ट में बताया गया कि कैमरा ऑरिजिनल मैन्युफैक्चरर और फिटमेंट का हिस्सा नहीं था। बीमा कंपनी ने इस आधार पर क्लेम खारिज कर दिया। आमतौर पर स्टैंडर्ड मोटर इंश्योरेंस पॉलिसी (Motor Insurnace Policy) में इलेक्ट्रिकल या मैकेनिकल गड़बड़ी की वजह से होने वाला नुकसान इंश्योरेंस कवर के दायरे में नहीं आता है। एक्सिडेंट या प्राकृतिक आपदा की वजह से होने वाला नुकसान इंश्योरेंस के दायरे में आता है।
कार मैन्युफैक्चरर हाई क्वालिटी कंपोनेंट का इस्तेमाल करते हैं
कार बनाने वाली कंपनियां हाई क्वालिटी कंपोनेंट्स का इस्तेमाल करती हैं। वे सख्त सेफ्टी और परफॉर्मेंस स्टैंडर्ड्स का पालन करती हैं। हर कंपोनेंट का इस्तेमाल जांच के बाद ही होता है। ऑरिजिनल इक्विपमेंट खासकर इलेक्ट्रिकल सिस्टम में किसी तरह का मॉडिफिकेशन व्हीकल को नुकसान की वजह बन सकता है। ज्यादातर स्टैंडर्ड मोटर इंश्योरेंस पॉलिसीज में इलेक्ट्रिकल या मैकेनिकल ब्रेकडाउन कवर नहीं होता है। अगर ग्राहक ऐसे रिस्क को कवर करने के लिए कवरेज बढ़ाना चाहते हैं तो उन्हें खास ऐड-ऑन कवर लेना होगा। पॉलिसी खरीदते या रिन्यूएल के वक्त अतिरिक्त पैसे चुकाकर ऐड-ऑन कवर लिया जा सकता है।
ऐड-ऑन लेकर बढ़ाया जा सकता है इंश्योरेंस का दायरा
ग्राहक को अपनी व्हीकल के इस्तेमाल और रिस्क को देखते हुए ऐड-ऑन कवर लेने के बारे में सोचना चाहिए। ऐड-ऑन कवर लेने के बाद अगर किसी इलेक्ट्रिक या मैकेनिकल ब्रेकडाउन की वजह से कार को नुकसान होता है तो इंश्योरेंस कंपनी क्लेम खारिज नहीं कर सकेगी। ग्राहक को यह ध्यान रखना होगा कि ऐड-ऑन कवर के नियम और शर्तें पॉलिसी में स्पष्ट रूप से लिखी होनी चाहिए। इससे क्लेम के वक्त किसी तरह की उलझन की स्थिति नहीं होगी।