नए लेबर कोड्स से घटी इनहैंड सैलरी? कैसे मिलेगा इसका फायदा, समझिए पूरा कैलकुलेशन

नए लेबर कोड्स से कुछ कर्मचारियों की इनहैंड सैलरी कम हो गई है। इसका कारण सैलरी स्ट्रक्चर में बदलाव है। पूरा कैलकुलेशन समझिए कि इस कटी सैलरी का फायदा कैसे मिलेगा। साथ ही, यह भी जानिए कि अगर आपकी इनहैंड सैलरी कम नहीं हुई है, तो इसका क्या मतलब है।

अपडेटेड Feb 09, 2026 पर 9:14 PM
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नए लेबर कोड्स से जरूरी नहीं है कि हर कर्मचारी की इन-हैंड सैलरी कम हो।

नए लेबर कोड्स लागू होने के बाद बहुत से कर्मचारियों के मन में एक ही सवाल उठ रहा कि मेरी इनहैंड सैलरी पहले से कम क्यों हो गई? यह असर खासतौर पर प्राइवेट सेक्टर और सैलरी क्लास में तुरंत दिखा। पहली नजर में यह बदलाव नुकसान जैसा लगता है, लेकिन अगर इसे थोड़ा गहराई से समझें, तो इसके पीछे की वजह और इसके फायदे दोनों साफ नजर आते हैं।

सैलरी स्ट्रक्चर में क्या बड़ा बदलाव हुआ

नए लेबर कोड्स के तहत सैलरी स्ट्रक्चर को लेकर सबसे बड़ा बदलाव बेसिक सैलरी से जुड़ा है। अब नियम यह है कि किसी भी कर्मचारी की बेसिक सैलरी और डीए मिलाकर कुल CTC (Cost to Company) का कम से कम 50% होना चाहिए।


पहले कई कंपनियां बेसिक सैलरी जानबूझकर कम रखती थीं और HRA, स्पेशल अलाउंस जैसे हेड्स ज्यादा दिखाती थीं। ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि PF और ग्रेच्युटी की रकम कम बने और कंपनी व कर्मचारी दोनों पर बोझ कम पड़े।

PF बढ़ा तो इनहैंड क्यों घटा

जैसे ही बेसिक सैलरी बढ़ी, उसी के साथ Provident Fund (PF) और ग्रेच्युटी की कैलकुलेशन भी बढ़ गई। PF कर्मचारी और कंपनी- दोनों की तरफ से बेसिक सैलरी के प्रतिशत के हिसाब से कटता है।

इसका सीधा मतलब यह हुआ कि कर्मचारी की सैलरी से हर महीने PF में ज्यादा पैसा कटने लगा। यही वजह है कि हाथ में आने वाली यानी इनहैंड सैलरी कम हो गई। लेकिन, कुल CTC में कोई कटौती नहीं हुई।

 3. इनकम और नौकरी में स्थिरता दिखाएं बैंकों को भरोसा होता है कि स्थायी नौकरी और नियमित इनकम वाला ग्राहक आसानी से लोन चुका देगा। अगर आप दो-तीन साल से एक ही कंपनी में काम कर रहे हैं तो यह आपके लिए प्लस पॉइंट है। बार-बार नौकरी बदलना बैंक को अस्थिरता का संकेत देता है। वहीं, सेल्फ-एम्प्लॉइड लोगों के लिए साफ-सुथरे टैक्स रिटर्न और ऑडिटेड अकाउंट्स मददगार साबित होते हैं।

PF और ग्रेच्युटी बढ़ने का असली मतलब

नए नियमों के बाद कर्मचारी की जेब से जो अतिरिक्त पैसा PF में जा रहा है, वह पूरी तरह गायब नहीं हो रहा। कंपनी भी उतनी ही रकम अपने हिस्से से PF में डाल रही है।

इसके अलावा ग्रेच्युटी भी बेसिक सैलरी पर ही कैलकुलेट होती है। यानी बेसिक बढ़ने से भविष्य में मिलने वाली ग्रेच्युटी भी पहले से ज्यादा होगी। अग आसान शब्दों में कहें तो जो पैसा आज कट रहा है, वो लॉन्ग टर्म सेविंग बन रहा है।

फायदा कहां और कब मिलेगा

इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा रिटायरमेंट के समय दिखाई देगा। PF बैलेंस ज्यादा होने का मतलब है कि नौकरी खत्म होने पर या रिटायरमेंट पर एकमुश्त बड़ी रकम हाथ में आएगी। PF पर मिलने वाला ब्याज टैक्स के लिहाज से भी फायदेमंद होता है।

ग्रेच्युटी में बढ़ोतरी उन कर्मचारियों के लिए खास तौर पर अहम है, जो किसी एक कंपनी में लंबे समय तक काम करते हैं। पहले कम बेसिक सैलरी के कारण ग्रेच्युटी सीमित रह जाती थी, अब वही रकम कहीं ज्यादा मजबूत हो सकती है।

कितना फायदा मिलेगा पीएफ में

आप मान लीजिए कि आपकी सैलरी ₹50,000 है। इसमें पहले बेसिक होती थी₹15,000, जिस पर 12% PF कटता था यानी ₹1,800। नए नियमों में बेसिक सैलरी को कुल सैलरी का कम से कम 50% करना जरूरी है, यानी ₹25,000। इस पर 12% PF कटेगा ₹3,000।

इसका मतलब यह हुआ कि हर महीने कर्मचारी की जेब से ₹1,200 ज्यादा कटने लगे, यानी साल भर में ₹14,400 कम इनहैंड दिखेगा। इसी वजह से कर्मचारियों को लगता है कि सैलरी घट गई है। लेकिन, असल में यह सैलरी का स्ट्रक्चर बदलने का असर है।

इसी कैलकुलेशन में असली फायदा भी छुपा है। PF में सिर्फ कर्मचारी का पैसा नहीं जाता, कंपनी भी उतनी ही रकम डालती है। पुराने सिस्टम में साल भर में कुल PF जमा होता था करीब ₹43,200, जबकि नए सिस्टम में यह बढ़कर ₹72,000 हो जाता है। यानी हर साल लगभग ₹28,800 ज्यादा सेविंग।

अगर कोई कर्मचारी 20 साल नौकरी करता है और PF पर औसतन 8% ब्याज मानें, तो यही अतिरिक्त पैसा ब्याज के साथ 13-15 लाख रुपये तक पहुंच सकता है। ऊपर से बेसिक सैलरी बढ़ने के कारण ग्रेच्युटी भी काफी ज्यादा मिलेगी। कॉन्ट्रैक्चुअल एंप्लॉयीज 1 साल की नौकरी के बाद ही इसका हकदार हो जाएगा। यानी आज इनहैंड में जो थोड़ा कम दिख रहा है, वही पैसा भविष्य में रिटायरमेंट की मजबूत पूंजी बनकर लौटेगा।

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क्या आपकी इन-हैंड सैलरी कम नहीं हुई?

नए लेबर कोड्स से जरूरी नहीं है कि हर कर्मचारी की इन-हैंड सैलरी कम हो। नए लेबर कोड्स के तहत बेसिक सैलरी को कुल वेतन का कम से कम 50% मानने का नियम जरूर है, जिससे PF और ग्रेच्युटी का बेस बढ़ता है। लेकिन PF की अनिवार्य कटौती अब भी 15,000 रुपये की वैधानिक वेज सीलिंग पर ही लागू है।

इसका मतलब है कि जिन कर्मचारियों का PF पहले से इसी सीमा पर कट रहा था, उनकी इन हैंड सैलरी में कोई कमी नहीं आएगी। इन हैंड तभी कम दिखती है, जब कंपनी स्वेच्छा से PF योगदान को बढ़े हुए बेसिक पर शिफ्ट कर देती है। यानी अगर आपकी सैलरी 50 हजार रुपये महीना है, तो कंपनी PF योगदान को 25 हजार रुपये बेसिक पर शिफ्ट कर दे। इसलिए इन हैंड सैलरी में गिरावट कोई ऑटोमैटिक या सभी पर लागू असर नहीं है, बल्कि यह कंपनी के सैलरी स्ट्रक्चर पॉलिसी पर ज्यादा निर्भर करता है।

सोशल सिक्योरिटी क्यों होगी मजबूत

नए लेबर कोड्स का मकसद सिर्फ सैलरी का ढांचा बदलना नहीं है, बल्कि सोशल सिक्योरिटी को मजबूत करना है। PF, ग्रेच्युटी और अन्य लाभों को बढ़ाकर सरकार यह चाहती है कि कर्मचारियों को नौकरी छूटने या रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा मिले।

इन नियमों के जरिए कॉन्ट्रैक्ट और गिग वर्कर्स को भी धीरे-धीरे सोशल सिक्योरिटी के दायरे में लाने की कोशिश की जा रही है, जो लंबे समय में लेबर मार्केट के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

यह सच है कि हर महीने इनहैंड सैलरी कम होना तुरंत चुभता है, खासकर तब जब EMI, किराया और बाकी खर्च पहले से तय हों। लेकिन लंबे नजरिए से देखें, तो यह बदलाव एक तरह की फोर्स्ड सेविंग है, जो भविष्य में आर्थिक मजबूती देती है।

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