रिटायरमेंट प्लानिंग जितनी आसान दिखती है, उतनी है नही। इसकी वजह यह है कि इनवेस्टर को रिटायरमेंट की तरफ बढ़ने के साथ-साथ अपने पोर्टफोलियो को बैलेंस करते रहना पड़ता है। जब इनवेस्टर की उम्र कम होती है तो उसके पोर्टफोलियो में शेयरों की हिस्सेदारी ज्यादा होती है। उम्र बढ़ने के साथ पोर्टफोलियो में रिस्क-फ्री एसेट की हिस्सेदारी कम होती जाती है। पोर्टफोलियो में डेट जैसे एसेट की हिस्सेदारी बढ़ती जाती है। ऐसा फंड की सुरक्षा के लिए किया जाता है।
