कुछ साल पहले तक इनवेस्टर्स विदेशी फंडों में निवेश करने के बारे में शायद ही सोचते थे। लेकिन, अब उनकी सोच बदल रही है। खासकर तब जब इंडियन स्टॉक मार्केट्स का प्रदर्शन विदेशी बाजारों के मुकाबले कमजोर रहा है। इसमें ग्लोबल इनवेस्टमेंट प्लेटफॉर्म का बड़ा हाथ है। अब विदेश में निवेश करना आसान हो गया है। सवाल है कि क्या आपको विदेश में निवेश करना चाहिए?
इंटरनेशनल म्यूचुअल फंड में निवेश के फायदे
एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ भारतीय कंपनियों में निवेश करने की जगह कुछ पैसा विदेशी कंपनियों के शेयरों में लगाना समझदारी है। इंटरनेशनल म्यूचुअल फंड आपको दूसरे देशों की कंपनियों के शेयरों में पैसे लगाने का मौका देता है। इसमें अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनियां, ग्लोबल हेल्थकेयर कंपनियां शामिल हैं। इससे आपका इनवेस्टमेंट पोर्टफोलियो डायवर्सिफायड हो जाता है।
इनवेस्टमेंट पोर्टफोलियो का डायवर्सिफिकेशन
इंटरनेशनल फंड में निवेश करने का सबसे बड़ा फायदा डायवर्सिफिकेशन है। आप इंडिया में कई फंडों में निवेश करते हैं तो भी उन कंपनियों का प्रदर्शन इंडियन इकोनॉमी के प्रदर्शन से जुड़ा होगा। ग्लोबल फंड में निवेश करने से आपका पैसा उन कंपनियों के शेयरों में जाता है जिनका प्रदर्शन दूसरे देश की इकोनॉमी के प्रदर्शन पर निर्भर करता है। कई बार रिटर्न के लिहाज से पोर्टफोलियो का यह डायवर्सिफिकेशन सही साबित होता है।
कई बार विदेशी बाजारों का रिटर्न ज्यादा
कई बार अमेरिकी शेयर बाजारों का प्रदर्शन भारतीय शेयर बाजारों से काफी बेहतर रहा है। कई बार भारतीय शेयर बाजारों का प्रदर्शन विकसित देशों के बाजारों से अच्छा रहा है। अगर आपके पोर्टफोलियो में अमेरिकी और भारतीय दोनों देशों के स्टॉक्स शामिल हैं तो किसी एक मार्केट के शेयरों के कमजोर प्रदर्शन करने पर दूसरे मार्केट के बेहतर प्रदर्शन से नुकसान की भरपाई हो जाती है।
करेंसी में उतार-चढ़ाव का रिटर्न पर असर
दूसरा फायदा करेंसी के डायवर्सिफिकेशन की वजह से है। जब डॉल के मुकाबले रुपया कमजोर पड़ता है तो रुपये में विदेश में निवेश की वैल्यू बढ़ जाती है। लंबी अवधि में करेंसी में इस उतार-चढ़ाव की वजह से आपका रिटर्न बढ़ सकता है। इसलिए विदेशी फंड में निवेश का मकसद हर साल भारतीय बाजार से ज्यादा रिटर्न कमाना नहीं होता है। यह एक तरह से पोर्टफोलियो का बैलेंस बनाता है।
फंड हाउस एक सीमा तक विदेश में करते हैं निवेश
आरबीआई और सेबी के नियमों के मुताबिक, इंडियन म्यूचुअल फंड हाउस एक सीमा तक विदेश में निवेश कर सकते हैं। अभी कंबाइंड ओवरसीज इनवेस्टमेंट लिमिट करीब 7 अरब डॉलर है। जब कभी भारतीय फंड हाउसेज का निवेश विदेश में इस लिमिट तक पहुंच जाता है, वे इनेवस्टर्स से नया निवेश लेना बंद कर देते हैं। वे दोबारा तब निवेश लेना शुरू करते हैं जब उनका विदेश में कुल निवेश इस लिमिट से नीचे आता है।
एलआरएस के तहत सीधे भी कर सकते हैं निवेश
आप आरबीआई की लिबर्लाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत सीधे भी विदेश में निवेश कर सकते हैं। एलआरएस एक व्यक्ति को एक वित्त वर्ष में 2,50,000 डॉलर कुछ खास मकसद के लिए विदेश भेजने की इजाजत देता है। इसमें इनवेस्टमेंट भी शामिल है। लेकिन, सीधे विदेश में निवेश करना थोड़ा मुश्किल है। इंडियन फंड हाउस के इंटरनेशनल फंड के जरिए विदेश में निवेश करना आसान है।