Silver Outlook: 2026 में ₹2.4 लाख तक जा सकती है चांदी, लेकिन कई रिस्क भी हैं; जानिए पूरी डिटेल
Silver Outlook: चांदी 2 लाख रुपये प्रति किलो पार कर चुकी है और ब्रोकरेज हाउस 2026 तक ₹2.4 लाख का लक्ष्य दे रहे हैं। लेकिन रैली के बीच कई बड़े रिस्क भी मौजूद हैं। इंडस्ट्रियल मांग, सप्लाई डेफिसिट और ETF रिटर्न की पूरी तस्वीर जानिए।
Axis Securities का मानना है कि चांदी में अभी और उछाल बाकी है।
Silver Outlook: चांदी ने शुक्रवार को MCX पर इतिहास रचते हुए 2 लाख रुपये प्रति किलो का स्तर छू लिया। अमेरिकी फेड रिजर्व के रेट कट के बाद बने मजबूत ग्लोबल सेंटिमेंट ने रैली को 2026 तक खींच दिया है। हालांकि, शुक्रवार को ही तेज मुनाफावसूली के चलते कीमतों में बड़ी गिरावट आई थी। सोमवार को चांदी में फिर बड़ी रैली दिखी और दाम करीब 6000 रुपये बढ़कर 1,98,633 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए।
Axis Mutual Fund का कहना है कि मौजूदा स्तर पर चांदी का वैल्यूएशन काफी स्ट्रेच हो चुका है। इसमें ओवरवैल्यूएशन के जोखिम हैं। जैसे कमजोर फिजिकल डिमांड, ETF आउटफ्लो और प्रॉफिट बुकिंग। इसके बावजूद फंड हाउस चांदी पर अपनी कंस्ट्रक्टिव आउटलुक बनाए हुए है।
एक्सिस का मानना है कि वैल्यूएशन ऊंचा होने के कारण करेक्शन आ सकता है। लेकिन, कई मजबूत फैक्टर अभी भी रैली को सपोर्ट करते हैं।
डिप्स पर खरीदें, टारगेट ₹2.4 लाख
Axis Securities का मानना है कि चांदी में अभी और उछाल बाकी है। ब्रोकरेज के मुताबिक, 1.7-1.78 लाख रुपये तक की गिरावट पर खरीदारी की जा सकती है। 2026 के लिए लक्ष्य 2.4 लाख रुपये किलो है।
तकनीकी रूप से भी चांदी बेहद मजबूत दिख रही है। 2011–2025 के बीच चला लंबा कंसॉलिडेशन खत्म हो गया है। मंथली चार्ट पर एक बड़ा 'राउंडिंग बॉटम ब्रेकआउट' बन चुका है। 20-मंथ और 60-मंथ EMA ऊपर की ओर झुके हुए हैं। और कीमतें इनके काफी ऊपर ट्रेड कर रही हैं, जो शुरुआती साइकिल स्ट्रेंथ का संकेत है।
चांदी में रिस्क फैक्टर भी बरकरार
एक्सिस सिक्योरिटीद के मुताबिक, चांदी की रैली के बीच कुछ जोखिम अभी भी मौजूद हैं। इनमें मजबूत अमेरिकी डॉलर, बढ़ती वास्तविक यील्ड, जियोपॉलिटिकल तनावों में कमी, कॉपर की कमजोरी, और कमोडिटी रोटेशन जैसे फैक्टर शामिल हैं।
केंद्रीय बैंक गोल्ड पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं, जिससे चांदी की ऑफिशियल डिमांड सीमित रह सकती है। इसके अलावा इंडस्ट्रियल सब्स्टिट्यूशन भी एक जोखिम है।
इसके बावजूद 2025 ने चांदी की दोहरी प्रकृति को निवेशकों के पोर्टफोलियो में मजबूत साबित किया है।
सिल्वर में जबरदस्त तेजी की क्या वजह है?
सिल्वर को सपोर्ट करने वाले कई कारक लगभग वही हैं जो गोल्ड को ऊपर ले गए। कमजोर डॉलर, फेड की अनिश्चितता, जियोपॉलिटिक्स, वैश्विक आर्थिक दबाव, जापानी बॉन्ड मार्केट की उथल-पुथल जैसे मुद्दों ने सेंटिमेंट को मजबूती दी है।
इंडस्ट्रियल मांग में उछाल ने चांदी में तेजी को अतिरिक्त सपोर्ट दिया। जैसे कि सोलर PV, EV बैटरियां और सेमीकंडक्टर्स। मेटल्स में तेजी, कमोडिटी फ्लो शिफ्ट्स और सप्लाई की कमी ने मोमेंटम को और तेज बनाया।
कहा जा रहा है कि कॉपर की ऊंची कीमतों ने भी डिमांड को चांदी की ओर मोड़ा।
कुल खपत का 50% से ज्यादा इंडस्ट्रियल डिमांड
चांदी की खासियत यह है कि यह कीमती धातु भी है और एक महत्वपूर्ण इंडस्ट्रियल कमोडिटी भी। इसकी खपत का आधे से ज्यादा हिस्सा कुछ खास सेक्टर से आता है:
सोलर टेक्नोलॉजी
EV बैटरी
सेमीकंडक्टर्स
सोलर PV सेगमेंट में सिल्वर की मांग 2020 के 94.4 Moz से बढ़कर 2024 में 243.7 Moz हो गई यानी कुल खपत का 21%। ETF इनफ्लो, फिजिकल खरीद और इक्विटी से कमोडिटी में रोटेशन भी कीमतों को सपोर्ट करते रहे।
गोल्ड-सिल्वर रेशियो में ऐतिहासिक गिरावट
Axis Securities का कहना है कि गोल्ड-सिल्वर रेशियो में ऐतिहासिक गिरावट आई है। ब्रोकरेज के मुताबिक, '2024 के अंत और 2025 में गोल्ड/सिल्वर रेशियो 105 से गिरकर 70 से नीचे आ गया। यह निवेशकों की जोखिम लेने की बढ़ती क्षमता और चांदी की तेज मांग का बड़ा संकेत है।'
लगातार पांचवें साल चांदी की सप्लाई तंग
सिल्वर की सप्लाई इनएलास्टिक (Inelastic) होती है क्योंकि यह ज्यादातर लीड, जिंक और कॉपर की माइनिंग का बाय-प्रोडक्ट है। यानी इन धातुओं का खनन न बढ़े तो चांदी का उत्पादन भी नहीं बढ़ सकता। इसलिए मांग तेज होने पर भी सप्लाई तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देती। यही कारण है कि 2025 लगातार पांचवां साल है जब सिल्वर मार्केट डेफिसिट में रहा, और यही कमी कीमतों को मजबूत बनाए हुए है।
कौन-से सिल्वर ETF दे रहे शानदार रिटर्न?
बीते छह महीने से लेकर एक साल तक, कई सिल्वर ETF निवेशकों को 80% से 100%+ रिटर्न दे चुके हैं। यह इसलिए भी संभव हुआ क्योंकि चांदी ने न सिर्फ प्रेशियस मेटल की तरह चलना दिखाया, बल्कि इंडस्ट्रियल मेटल के रूप में भी जबरदस्त मांग हासिल की- जैसे सोलर पैनल, EV बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स में बढ़ती खपत।
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