व्यक्ति के निधन पर उसके वारिस को उसकी संपत्ति मिलती है। वारिस को वसीयत के जरिए या मरने वाले व्यक्ति के पर्सनल लॉ के मुताबिक यह संपत्ति मिलती है। पर्सनल लॉ का इस्तेमाल तब होता है, जब निधन से पहले व्यक्ति ने वसीयत नहीं बनाई होती है। या कोई संपत्ति वसीयत का हिस्सा नहीं होती है। वसीयत में मिली संपत्ति पर टैक्स के नियम को लेकर बहुत कनफ्यूजन है। आइए इसके कुछ जरूरी पहलुओं को जानने की कोशिश करते हैं।
सबसे पहले आपके लिए यह जान लेना जरूरी है कि अगर आपको विरासत में कोई संपत्ति मिलती है तो उस पर आपको कोई टैक्स नहीं देना होगा। इसकी वजह यह है कि इंडिया में Inheritance Tax नहीं है। हालांकि, सेक्शन 56(2) (X) में गिफ्ट पर टैक्स का प्रावधान है। लेकिन, विरासत में मिली संपत्ति को टैक्स के दायरे से बाहर रखा गया है।
लेकिन, आपको याद रखना होगा कि अगर विरासत में मिली संपत्ति से आपको कोई इनकम होती है तो उस पर आपको टैक्स चुकाना होगा। दूसरी बात, अगर आप इस संपत्ति यानी विरासत में मिली संपत्ति को बेचते हैं तो आपको कैपिटल गेंस टैक्स चुकाना होगा। आपके दिमाग में यह सवाल पैदा हो सकता है कि जब आपने इस संपत्ति को खरीदा नहीं है तो फिर इस पर कैपिटल गेंस टैक्स का कैलकुलेशन कैसे होगा।
विरासत में मिली संपत्ति पर कैपिटल गेंस के कैलकुलेशन के लिए अलग नियम है। इसके तहत संपत्ति के पुराने मालिक ने उसे खरीदने के लिए जो कीमत चुकाई थी, उसे आपकी कॉस्ट ऑफ एक्विजिशन मानी जाएगी। अगर संपत्ति 1 अप्रैल, 2001 से पहले खरीदी गई है तो बेचने वाले के पास 1 अप्रैल 2001 को उस संपत्ति की फेयर मार्केट वैल्यू को कैपिटल गेंस टैक्स के कैलकुलेशन के लिए कॉस्ट ऑफ एक्विजिशन मानने का ऑप्शन होगा।
फेयर मार्केट वैल्यू जानने के लिए आप Registered Valuer से valuation certificate ले सकते हैं। अचल संपत्ति के मामले में प्रॉप्रटी की फेयर मार्केट वैल्यू 1 अप्रैल, 2001 को स्टैंप ड्यूटी की वैल्यूएशन से ज्यादा नहीं हो सकती। अब सवाल है कि यह कैसे तय होगा कि आपको लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस देना होगा या शॉर्ट टर्म कैपिटल गेंस? इसका निर्धारण इस बात से होगा कि प्रॉप्रटी के ऑरिजिनल ओनर ने उसे कब खरीदा था।