यूनियन बजट पेश होने की तारीख नजदीक आने पर मार्केट्स की उम्मीदें बढ़नी शुरू हो जाती हैं। हालांकि, इनवेस्टर्स को यह समझने की जरूरत है कि इनवेस्टमेंट पोर्टफोलियो को लेकर यूनियन बजट का महत्व साल दर साल घट रहा है। इसकी वजह यह है कि डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्सेज को लेकर सरकार पहले ही फैसले ले चुकी होती है। इस बारे में ऐलान करने के लिए बजट में कुछ बचा नहीं होता है।
बीते 5 सालों में सरकार के कैपिटल एक्सपेंडिचर को लेकर हमारी उम्मीदें काफी बढ़ी हैं। सरकार ने फिस्कल कंसॉलिडेशन के लिए जो टारगेट तय किया है, उसे हासिल करने की तरफ वह बढ़ रही है। कानूनों को आसान बनाने और बेहतर गवर्नेंस के जरिए ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में इम्प्रूवमेंट ऐसा एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म्स है, जो बजट के दायरे से बाहर है। टैक्स के नियमों को दोबारा लिखा गया है और सिक्योरिटीज मार्केट के कानूनों की समीक्षा हो रही है।
सरकार धीर-धीरे व्यापक हेल्थकेयर प्रोग्राम की तरफ बढ़ रही है। वह पूरे देश में व्यापक पब्लिक हेल्थकेयर प्रोग्राम शुरू करने की दिशा में बढ़ रही है। हर साल प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) के जरिए इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर और दूसरे न्यू एज बिजनेसेज में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया जा रहा है। एजुकेशन से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर लगातार सरकार के फोकस में बना हुआ है। अर्बन डेवलपमेंट की रफ्तार सुस्त है। एग्जिक्यूशन फेज में अव्यवस्था दिख रही है।
Union Budget का फोकस इकोनॉमी की रफ्तार तेज कर इनक्लूजन बढ़ाने पर होगा। इससे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रिन्यूएबल्स, डीप टेक और डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी न्यू एज इंडस्ट्रीज में निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा। सिटीजंस तक पब्लिक सर्विसेज पहुंचाने के लिए डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की पहुंच बढ़ाई जानी चाहिए। नेशनल हेल्थकेयर और एजुकेशन पर फोकस बढ़ाना होगा। बेहतर उत्पादकता के जरिए मिडिल क्लास को सक्षम बनाना होगा ताकि उसकी उम्मीदें पूरी हो सकें।
ग्रोथ पर ज्यादा फोकस बनाए रखने के साथ ही सरकार की बेहतर वित्तीय सेहत के लिए बजट में बेहतर डेफिसिट मैनेजमेंट पर जोर होना चाहिए। लेकिन, इसके लिए सरकार के कैपिटल एक्सपेंडिचर प्रोग्राम और डेवलपमेंट वेल्फेयर पर खर्च के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। प्राइवेट इनवेस्टमेंट को बढ़ावा देने की बात वित्तमंत्री के दिमाग में होगी। हालांकि, वह यह जानती हैं कि यह उनके दायरे में नहीं है। इसके बावजूद हम उम्मीद करते हैं कि वह उन इंडस्ट्रीज के लिए इनसेंटिव का ऐलान करेंगी, जिनमें निवेश बहुत जरूरी है।
पिछला साल दो वजहों से टैक्सपेयर्स के लिए काफी अहम था। पहला, पर्सनल टैक्स के नियमों में बदलाव कर मिडिल क्लास टैक्सपेयर्स के हाथ में ज्यादा पैसे छोड़ने के उपाय किए गए। दूसरी तरफ इनडायरेक्ट टैक्सेज में बड़ी कमी की गई। ऐसे वक्त ऐसा करने से जब इनफ्लेशन घट रहा है लोगों की पर्चेंजिग पावर बढ़ी है। हर साल बजट में मिडिल क्लास का कॉन्फिडेंस बढ़ाने वाले उपाय जरूरी हैं। इस बजट में इसके लिए कुछ नया करने की जरूरत है। कैपिटल गेंस के मामले में डेट इनवेस्टमेंट के नियम दूसरे एसेट क्लास जैसे होने से मिडिल क्लास को राहत मिलेगी।
पिछले दो सालों से विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भारतीय बाजार में बिकवाली कर रहे है। इस ट्रेंड को बदलने की जरूरत है, क्योंकि प्राइवेट सेक्टर की निवेश की जरूरतों को देखते हुए धैर्य वाले लंबी अवधि के निवेश के लिए गुंजाइश बनानी होगी। वेंचर कैपिटलिस्ट्स और प्राइवेट इक्विटी फर्मों ने भारत में अच्छी कमाई की है। उन्हें भारत लौटने की जरूरत है। उन्हें डिप टेक में मौजूदा शुरुआती मौकों के इस्तेमाल के लिए पार्टिसिपेट करना चाहिए।
यूनियन बजट 2026 के बारे में अच्छी बात यह है कि यह तब पेश होने जा रहा है, जब उम्मीदें काफी कम हैं। पॉलिसीमेकर्स को यह स्पष्ट रूप से पता है कि क्या करने की जरूरत है। जब हमें उम्मीद कम होती है या नहीं होती है तो बजट आगे का रास्ता दिखाता है। इससे बिजनेस कॉन्फिडेंस बढ़ता है, जो एक बड़ा पॉजिटिव है। इस बजट के लिए बगैर शोरगुल चुपके से काफी कुछ देने का मौका है।
(लेखक आईथॉट पीएमएस के चीफ आयडियटर और फाउंडर हैं। यहां व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत विचार हैं। ये इस पब्लिकेशन के विचार को व्यक्त नहीं करते।)