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Ganesh Chaturthi 2025: भारत का एक ऐसा मंदिर जहां गणपति भगवान की अनोखी मूर्ति करती है सबका मन मोहित, जानिए इस खास मंदिर की परंपरा

Ganesh Chaturthi 2025: जयपुर की पहाड़ियों में एक ऐसा ऐतिहासिक स्थान है, जहां भगवान गणेश की बिना सूंड वाली दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है। यहां भक्त अपनी मनोकामनाएं पत्र लिखकर व्यक्त करते हैं और मंदिर की खास मान्यता है कि यहां सच्चे दिल से मांगी हर मुराद पूरी हो जाती है।

Edited By: Shradha Tulsyanअपडेटेड Aug 24, 2025 पर 3:36 PM
Ganesh Chaturthi 2025: भारत का एक ऐसा मंदिर जहां गणपति भगवान की अनोखी मूर्ति करती है सबका मन मोहित, जानिए इस खास मंदिर की परंपरा

जयपुर शहर अपने शानदार महलों, रंगीन बाजारों और सांस्कृतिक विरासत के लिए पूरे देश में मशहूर है, लेकिन कम ही लोगों को पता है कि यहां अरावली की पहाड़ियों पर बसा है एक अद्भुत मंदिर जिसका नाम है गढ़ गणेश। यह वही मंदिर है जहां भगवान गणेश की एक ऐसी अद्वितीय मूर्ति स्थापित है जो पारंपरिक रूप से दिखने वाले गणपति से बिल्कुल अलग है। यहां बप्पा का स्वरूप है बालक रूप में और बिना सूंड के। यही बात गढ़ गणेश मंदिर को बाकी गणेश मंदिरों से अलग और बेहद खास बनाती है।

गढ़ गणेश मंदिर का निर्माण 18वीं सदी में जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने करवाया था। कहा जाता है कि जयपुर शहर की नींव डालने से पहले राजा ने “अश्वमेध यज्ञ” किया था और सुख-समृद्धि तथा जयपुर के उज्ज्वल भविष्य के लिए भगवान गणेश की विशेष पूजा कराई थी। इसी पूजा के बाद ये ऐतिहासिक मंदिर बनवाया गया। राजा ने इस मंदिर की मूर्ति इस तरह स्थापित करवाई थी कि वे सिटी पैलेस के चंद्र महल से दूरबीन से भी भगवान के दर्शन कर सकें। इससे राजा के अटूट विश्वास और गणेश भक्तों के लिए इस मंदिर का महत्तव और बढ़ जाता है।

मंदिर अरावली पर्वत की चोटियों पर स्थित है, जिससे यहां तक पहुंचने के लिए भक्तों को 365 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, हर सीढ़ी एक दिन का प्रतीक है, मानो जीवन के सफर का सफरनामा हो। रास्ता चढ़ते हुए एक अलग शांति और अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य महसूस होता है। ऊपर पहुंचकर दूर-दूर तक दिखाई देता है पूरा गुलाबी शहर जयपुर, जो इस स्थान को और भी पवित्र और सुरम्य बना देता है।

गढ़ गणेश मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थापित गणेश जी की अनोखी प्रतिमा है। आमतौर पर भगवान गणेश की प्रतिमा में हाथी जैसा सिर और लंबी सूंड होती है, लेकिन यहां गणेश जी का स्वरूप बालक के रूप में और बिना सूंड के, जिसे 'विग्रह पुरुषाकृति' भी कहा जाता है। यह मूर्ति स्वयंभू मानी जाती है, यानि कि प्राकृतिक रूप से प्रकट हुई। वैसे भक्तों की मान्यता है कि यहां सात बुधवार तक निस्वार्थ भक्ति से पूजा करने से हर मनोकामना पूरी होती है।

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