Chaitra Navratri 2026 first day: आज से हिंदू धर्म के प्रमुख पर्व चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो रही है। नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में हर दिन मां दुर्गा के एक रूप को समर्पित होता है। मां दुर्गा की विधि-विधान से पूजा करने वाले भक्तों के सभी संकट दूर होते हैं। जगत जननि मां दुर्गा की कृपा से उनके जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। चैत्र नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इस दिन घटस्थापना के साथ नौ दिनों के पर्व का आरंभ होता है। आइए जानें मां दुर्गा के इस रूप के बारे में। साथ ही जानें पूजा का मुहूर्त, मां शैलपुत्री की पूजा विधि, उनकी कथा और प्रिय भोग क्या है?
नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना का मुहूर्त
नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना का पहला मुहूर्त सुबह 6:23 बजे से 7:32 बजे तक रहेगा। इसके अलावा शुभ चौघड़िया सुबह 6:54 से 7:57 बजे तक, लाभ चौघड़िया दोपहर 12:29 से 1:59 बजे तक और अभिजीत मुहूर्त 12:05 से 12:53 बजे तक रहेगा। इन मुहूर्तों में विधिपूर्वक घट स्थापना करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
नवदुर्गा का प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री का है, जिन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है। वृषभ यानी बैल की सवारी करने के कारण इन्हें वृषारूढ़ा भी कहा जाता है। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प होता है। मां शैलपुत्री को शक्ति, स्थिरता और धैर्य का प्रतीक माना जाता है। उनकी पूजा से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मबल की वृद्धि होती है।
सफेद आसन पर उत्तर मुंह करके स्थिर मन से मां की पूजा प्रारंभ करें। पूजा स्थान पर लाल वस्त्र बिछाकर मां शैलपुत्री की प्रतिमा स्थापित करें और विधिपूर्वक पूजा शुरू करें। माता शैलपुत्री के सामने घी का दीपक जलाएं। माता शैलपुत्री को सफेद वस्त्र व सफेद पुष्प अर्पित करते हैं। पूजा सामग्री माता को अर्पित करें। सफेद मिठाई या खीर का भोग लगाएं। मां के सामने एक सबूत पान के पत्ते में इक्कीस फूलदार लौंग रखें। मां के मंत्र “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम:” का जाप करें।
माता को गाय के घी से बनी मिठाई या दूध और मखाने से बनी खीर माता को अति प्रिय है। इसका भोग लगाना शुभ माना जाता है। इस दिन माता को सफेद फूलों तथा सफेद मिष्ठान्न का भोग लगाया जाता है। पूजा के बाद कुंवारी कन्याओं को प्रसाद वितरण करें।
माता शैलपुत्री से जुड़े पौराणिक मान्यता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पूर्व जन्म में माता शैलपुत्री का नाम सती था और यह भगवान शिव की पत्नी थीं। सती के पिता दक्ष प्रजापति ने भगवान शिव का अपमान कर दिया था। परिणामस्वरूप माता सती ने अपने आप को यज्ञ की अग्नि में भस्म कर लिया था। अगले जन्म में माता सती ने शैल राज हिमालय की पुत्री के रूप में स्वयं को प्रकट किया। पर्वत राज हिमालय के घर पुत्री के रूप में माता ने जन्म लेने के कारण से माता दुर्गा के इस स्वरूप का नाम शैलपुत्री पड़ा। कठिन तपस्या के बाद भगवान शिव से विवाह किया।