Vat Savitri Vrat Rules: हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना के लिए रखा जाता है। इस साल ज्येष्ठ अमावस्या के अवसर पर यह व्रत 16 मई शनिवार को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अगर इस व्रत को सही नियमों के साथ न किया जाए, तो इसका पूरा फल नहीं मिलता है। खासकर जो महिलाएं पहली बार यह व्रत शुरू कर रही हैं, उन्हें पूजा पद्धति और नियमों का बारीकी से पालन करना चाहिए। यहां आपको वट सावित्री व्रत से जुड़े वे 7 प्रमुख नियम बताए गए हैं जिन्हें फॉलो करना जरूरी माना जाता है।
वट सावित्री का व्रत देवी सावित्री और सत्यवान की कथा से प्रेरित है। इसमें सावित्री ने अपने तप के बल पर यमराज से अपने पति के प्राण वापस पा लिए थे। इस साल अमावस्या तिथि 16 मई को सुबह 05:11 बजे से शुरू होकर 17 मई को तड़के 01:30 बजे तक रहेगी।
वट सावित्री व्रत से जुड़े 7 जरूरी नियम जान लीजिए
1. शुभ मुहूर्त में स्नान और संकल्प
व्रत की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के साथ होनी चाहिए। 16 मई को ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:07 से 04:48 तक है। स्नान के बाद स्वच्छ होकर व्रत और अपनी पूजा का संकल्प जरूर लें। बिना संकल्प के कोई भी व्रत अधूरा माना जाता है।
सुहागिन महिलाओं को इस दिन लाल, पीले या नारंगी रंग के कपड़े पहनने चाहिए। अगर संभव हो तो अपनी शादी का जोड़ा या नई साड़ी पहनकर पूर्ण सोलह श्रृंगार करें। काले या गहरे नीले रंग के कपड़ों से परहेज करना चाहिए।
3. वट वृक्ष (बरगद) की महत्ता
बरगद के पेड़ को देव वृक्ष माना गया है। मान्यता है कि इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है। पूजा के दौरान वट वृक्ष की जड़ को जल अर्पित करना पहला और अनिवार्य कदम है।
4. सूत लपेटने और परिक्रमा का नियम
पूजा में कच्चा सूत लेकर वट वृक्ष की परिक्रमा की जाती है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार 7, 12, 51 या 108 बार परिक्रमा करते हुए वृक्ष पर सूत लपेटें। प्रत्येक परिक्रमा के साथ अपने पति की लंबी आयु और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करें।
5. बांस के पंखे का विशेष प्रयोग
वट सावित्री की पूजा में बांस का पंखा (बेना) अत्यंत महत्वपूर्ण सामग्री है। पूजा के बाद इस पंखे से पहले वट वृक्ष को और फिर अपने पति को हवा करने की परंपरा है। यह सेवा और सम्मान का प्रतीक माना जाता है।
6. व्रत के प्रकार (निर्जला या फलाहार)
यह व्रत आपकी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा पर निर्भर करता है। आप इसे निर्जला (बिना पानी के) या फलाहार (फल खाकर) रख सकती हैं। पूजा के दौरान भीगे हुए चने और बरगद के फल (कली) का विशेष महत्व है।
पूजा संपन्न होने के बाद अपनी सास और परिवार की अन्य बुजुर्ग महिलाओं के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेना न भूलें। सौभाग्य की प्राप्ति के लिए बड़ों का आशीर्वाद इस व्रत का एक अभिन्न हिस्सा है।
संकल्प से पहले इन सामग्रियों को एकत्र कर लें। सावित्री-सत्यवान की तस्वीर, बांस का पंखा, कच्चा सूत और भीगे चने, धूप, दीप, घी, फूल और मौसमी फल, सुहाग सामग्री (सिंदूर, बिंदी, चूड़ी इत्यादि)। कई स्थानों पर पूजा के बाद वट वृक्ष की एक कली और एक भीगा हुआ चना पानी के साथ निगलकर व्रत खोला जाता है।