Eid-ul-Fitr 2025: आज देशभर में मनाई जाएगी ईद, जानें क्यों खास है ये त्योहार

Eid-ul-Fitr 2025: रमजान में रोजा रखकर परवरदिगार की इबादत करने से अल्लाह की रहमत बरसती है और अनजाने में हुए गुनाह माफ हो जाते हैं। ईद-उल-फितर पर दान और जकात देना बेहद पुण्यकारी माना जाता है। इस दिन अन्न और धन का दान करना चाहिए। ईद के साथ ही शव्वाल महीने की शुरुआत होती है

अपडेटेड Mar 31, 2025 पर 8:13 AM
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Eid-ul-Fitr 2025: रमजान महीने में रोजे रख इबादत करने से खुदा की रहमत बरसती है।

इस साल आज पूरे देश में ईद-उल-फितर का पावन पर्व उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाएगा। इस्लाम धर्म में इस त्योहार का विशेष महत्व है, क्योंकि ये शव्वाल महीने के पहले दिन पड़ता है। इसे "मीठी ईद" भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन खासतौर पर सेवइयां और अन्य पारंपरिक मिठाइयां बनाई जाती हैं। ईद-उल-फितर की तारीख रमजान के समाप्त होने पर दिखने वाले चांद से तय होती है। इस साल भारत में रमजान की शुरुआत 2 मार्च से हुई थी। एक महीने तक रोजा, इबादत और आत्मसंयम के बाद ये दिन अल्लाह का शुक्रिया अदा करने, खुशियां मनाने और जरूरतमंदों के साथ खुशियां बांटने का अवसर होता है।

इस दिन नए कपड़े पहनने, ईद की नमाज अदा करने, गले मिलकर बधाई देने और स्वादिष्ट पकवानों का आनंद लेने की परंपरा है, जो इसे भाईचारे और प्रेम का प्रतीक बनाती है।

कैसे मनाई जाती है ईद?


ईद का दिन मुसलमानों के लिए खुशियों और भाईचारे का संदेश लेकर आता है। इस दिन लोग सुबह जल्दी उठकर स्नान और इबादत करने के बाद नए कपड़े पहनते हैं। इसके बाद वे मस्जिदों में इकट्ठा होकर ईद की विशेष नमाज अदा करते हैं। नमाज के बाद एक-दूसरे को गले लगाकर मुबारकबाद दी जाती है। इस खास मौके पर घरों में तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान, जैसे कि पूरी, सेवइयां, कबाब और बिरयानी बनाए जाते हैं।

ईद-उल-फितर मनाने की परंपरा

रमजान महीने की 29वीं रात को चांद का दीदार किया जाता है। अगर चांद दिख जाए, तो अगले दिन ईद होती है, वरना 30वां रोजा रखा जाता है और फिर अगली रात चांद देखा जाता है। ईद की तारीख सऊदी अरब में चांद दिखने के अनुसार तय होती है, क्योंकि इस्लामिक कैलेंडर चंद्रमा के चक्र पर आधारित होता है।

हर उम्र के चेहरे पर मुस्कान

ईद का त्योहार आते ही बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में उत्साह देखने लायक होता है। हर कोई इस दिन नए कपड़े पहनकर, इत्र लगाकर और खुद को संवारकर तैयार होता है। फिर सभी सामूहिक रूप से मस्जिदों या ईदगाहों में जाकर नमाज अदा करते हैं। नमाज के बाद गले मिलकर एक-दूसरे को ईद की मुबारकबाद दी जाती है। इसके बाद रिश्तेदारों और दोस्तों के घर जाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। घरों में तरह-तरह की लजीज मिठाइयां और पकवान बनते हैं, जिन्हें सभी मिल-बांटकर खाते हैं।

ईद-उल-फितर पर नमाज क्यों अदा की जाती है?

रमजान के पूरे महीने में मुसलमान अल्लाह की इबादत और रोजे रखते हैं। ये महीना संयम, आत्मसंयम और नेकी का प्रतीक होता है। ईद के दिन खास नमाज पढ़कर अल्लाह का शुक्रिया अदा किया जाता है और उसकी रहमत की दुआ मांगी जाती है। ऐसा माना जाता है कि ईद की नमाज अदा करने से बंदे को खुदा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

फितरा और जकात की अहमियत

ईद-उल-फितर सिर्फ अपनी खुशियों तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरतमंदों के साथ खुशियां बांटने का भी दिन है। इस मौके पर ढाई किलो अनाज या उसके बराबर धन गरीबों और जरूरतमंदों को दान करना बेहद पुण्यकारी माना जाता है। इसे फितरा या सदका-ए-फित्र कहा जाता है। इस्लाम में दान और जकात की परंपरा इंसानियत और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

ईद की नमाज के बाद इमाम का उपदेश

ईद की नमाज पूरी होने के बाद इमाम लोगों को संबोधित करते हैं। वे रमजान और रोजे के धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व के बारे में बताते हैं। इस दौरान अल्लाहु अकबर, ला इलाहा इल्लल्लाह जैसे नारे गूंजते हैं, जो इस दिन की पवित्रता को और बढ़ा देते हैं। ईद-उल-फितर सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक नेक संदेश भी देता है—जो इंसानियत, दया, परोपकार और भाईचारे की मिसाल है।

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