भारत के पूर्व लेग स्पिनर और कमेंटेटर लक्ष्मण शिवरामकृष्णन ने अपने क्रिकेट करियर के दौरान नस्लवाद की घटनाओं को लेकर बड़ा खुलासा किया है। पूर्व भारतीय क्रिकेटर ने एक पुराना अनुभव शेयर किया है, जिसमें उन्होंने टीम के अंदर नस्लभेद (रंग के आधार पर टिप्पणी) का सामना करने की बात कही। उन्होंने बताया कि एक बार उनके एक साथी खिलाड़ी ने मजाक में कहा था कि उनके लिए ‘सही’ केक मंगाया गया है, क्योंकि वे सांवले हैं, इसलिए उनके लिए डार्क चॉकलेट केक लाया गया है।
शेयर किया ये कड़वा किस्सा
शिवरामकृष्णन ने हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस के साथ एक इंटरव्यू में अपने क्रिकेट करियर के बारे में खुलकर बात की। शिवरामकृष्णन ने कहा कि, नस्लवाद की घटनाओं से उन्हें बार-बार गुजरना पड़ा। शिवरामकृष्णन उस समय सिर्फ 17 साल के थे और रणजी ट्रॉफी में उभरते हुए खिलाड़ी थे। उन्हें 1982-83 के पाकिस्तान दौरे के लिए भारतीय टीम में चुना गया था। इसी दौरे के दौरान उन्होंने अपना जन्मदिन मनाया, लेकिन जो पल खुशियों का होना चाहिए था, वह उनके लिए दुखद अनुभव बन गया।
जब सीनियर खिलाड़ी ने जूता साफ करने को...
इंटरव्यू में लक्ष्मण शिवरामकृष्णन ने बताया कि, जब उन्हें जन्मदिन पर केक काटने के लिए बुलाया गया, तब एक साथी खिलाड़ी ने उन पर नस्लभेदी टिप्पणी कर दी। उन्होंने बताया, “उसने कहा, ‘अरे सनी, तुमने सही रंग का केक मंगाया है। एक सांवले लड़के के लिए इतना डार्क चॉकलेट केक।’ यह सुनकर मैं रो पड़ा और केक काटने से मना कर दिया। बाद में सुनील गावस्कर ने मुझे समझाया, तब मैंने आंसू भरी आंखों से केक काटा।” शिवरामकृष्णन ने अपने साथ हुए और भी ऐसे अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि जब वे सिर्फ 14 साल के थे, तब एक सीनियर भारतीय बल्लेबाज ने उन्हें गलती से ग्राउंड स्टाफ समझ लिया और अपने जूते साफ करने को कह दिया।
घरेलू क्रिकेट के दौरान भी उन्हें ऐसे हालात झेलने पड़े। तमिलनाडु के ड्रेसिंग रूम में उन्हें ‘करूपा’ कहकर बुलाया जाता था, वहीं उत्तर भारत में दर्शक उन्हें ‘कालिया’ कहकर चिढ़ाते थे।
पाकिस्तान दौरे झलने पड़ी बड़ी परेशानी
लक्ष्मण शिवरामकृष्णन को कई बार सबके सामने अपमान भी झेलना पड़ा। मुंबई के एक होटल (जो अब नरीमन पॉइंट पर ट्राइडेंट के नाम से जाना जाता है) में एक गेटकीपर ने उम्र और उन्हें देखकर यह मानने से ही इंकार कर दिया कि वे भारतीय टीम का हिस्सा हैं। उन्हें करीब एक घंटे तक बाहर इंतजार करना पड़ा, जब तक एक टीममेट आकर उनकी पहचान की कन्फर्म नहीं कर देता। शिवरामाकृष्णन ने कहा, "उसके बाद, मुझे एहसास हुआ कि मुझे चाबियां अपने साथ ले जानी चाहिए। लेकिन जब मैं गेट के पास पहुंचता तो रिजेक्ट होने और फिर से बाहर निकाले जाने के डर से कांपने लगता था।"।
उन्होंने यह भी बताया कि अपने पहले पाकिस्तान दौरे के दौरान भी उन्हें ऐसे ही बुरे अनुभवों का सामना करना पड़ा। पूरे दौरे के दौरान भीड़ उन्हें चिढ़ाती रहती थी और उन पर अपमानजनक टिप्पणियां करती थी।