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8 घंटे की नौकरी या 10 घंटे की मजबूरी? गर्मी में ऑफिस आने-जाने की परेशानी पर छिड़ी बड़ी चर्चा

Viral Post: भारत में लोगों को काम से ज्यादा थकान रोजाना के ऑफिस आने-जाने से होती है, खासकर भीषण गर्मी में। ट्रैफिक, लंबा सफर और समय की बर्बादी बड़ी समस्या बन चुकी है। इसी मुद्दे पर सुहिता देव ने ऑफिस कल्चर पर सवाल उठाते हुए नए वर्क मॉडल की जरूरत बताई है

Edited By: Anchal Jhaअपडेटेड Apr 29, 2026 पर 9:46 AM
8 घंटे की नौकरी या 10 घंटे की मजबूरी? गर्मी में ऑफिस आने-जाने की परेशानी पर छिड़ी बड़ी चर्चा
Viral Post: चर्चा के दौरान एक यूजर ने सवाल उठाया कि क्या यह भरोसे की कमी का मामला है

भारत में नौकरी करने वाले लोगों के लिए असली थकान सिर्फ काम से नहीं, बल्कि रोजाना के लंबे और मुश्किल सफर से आती है। खासकर गर्मियों में जब तापमान चरम पर होता है, तब ऑफिस आना-जाना किसी चुनौती से कम नहीं लगता। भीड़भाड़, ट्रैफिक, पसीना और समय की बर्बादी—ये सब मिलकर दिन की शुरुआत को ही थका देने वाला बना देते हैं। ऐसे में कई लोग ऑफिस पहुंचने से पहले ही अपनी आधी ऊर्जा खो देते हैं। इसी समस्या को उजागर करते हुए लिंक्डइन यूजर सुहिता देव ने पारंपरिक ऑफिस कल्चर पर सवाल उठाया है।

उनका मानना है कि बदलते समय के साथ काम करने के तरीकों में भी बदलाव जरूरी है। उन्होंने इस बात पर चर्चा शुरू की है कि क्या आज के दौर में रोजाना ऑफिस जाना वाकई जरूरी है, या फिर कंपनियों को कर्मचारियों की सुविधा और वास्तविक परिस्थितियों को समझते हुए नए विकल्पों पर विचार करना चाहिए।

8 घंटे की नौकरी या 10 घंटे की मजबूरी?

सुहिता का कहना है कि ऑफिस सिर्फ 8-9 घंटे की शिफ्ट तक सीमित नहीं है। इसमें रोजाना 1-2 घंटे का सफर भी जुड़ जाता है, जो कर्मचारियों की ऊर्जा और समय दोनों को खा जाता है। यानी असल में नौकरी का समय और भी लंबा हो जाता है।

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