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AC और कूलर से पहले भारत ने खोज लिया था नेचुरल कूलिंग सिस्टम, 50°C की गर्मी में भी ठंडे रहते थे महल

भीषण गर्मी में जहां आज लोग एसी और कूलर के बिना राहत की कल्पना भी नहीं कर पाते, वहीं सदियों पहले भारतीय महलों में बिना बिजली के ही ठंडक का इंतजाम था। पारंपरिक वास्तुकला की एक अनोखी तकनीक ने प्राकृतिक हवा और डिजाइन का ऐसा मेल किया कि भीषण गर्मी के बावजूद अंदर का वातावरण आरामदायक बना रहता था

Edited By: Anchal Jhaअपडेटेड Jul 21, 2026 पर 8:41 AM
AC और कूलर से पहले भारत ने खोज लिया था नेचुरल कूलिंग सिस्टम, 50°C की गर्मी में भी ठंडे रहते थे महल
भारत की कई ऐतिहासिक इमारतें जाली कला की बेहतरीन मिसाल हैं।

भीषण गर्मी के मौसम में जब तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तो अधिकांश लोग राहत पाने के लिए एयर कंडीशनर, कूलर या पंखों पर निर्भर हो जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सदियों पहले, जब बिजली जैसी कोई सुविधा मौजूद नहीं थी, तब भारत के राजमहलों, किलों और हवेलियों में रहने वाले लोग इतनी भीषण गर्मी से कैसे बचते थे? हैरानी की बात यह है कि उस दौर के भारतीय वास्तुकारों ने प्रकृति के नियमों को समझकर ऐसी अनोखी तकनीक विकसित की थी, जो बिना किसी मशीन या बिजली के इमारतों को ठंडा रखने में मदद करती थी। इस पारंपरिक तकनीक का सबसे अहम हिस्सा थी पत्थर की नक्काशीदार जाली (Jaali Screen)।

देखने में बेहद आकर्षक ये जालियां केवल सजावट के लिए नहीं बनाई जाती थीं, बल्कि इनका डिजाइन इस तरह तैयार किया जाता था कि गर्म हवा छनकर ठंडी हो जाए, धूप की तीव्रता कम हो और अंदर लगातार ताजी हवा का प्रवाह बना रहे। यही वजह थी कि बाहर तेज लू चलने के बावजूद महलों के भीतर का वातावरण अपेक्षाकृत ठंडा और आरामदायक बना रहता था।

8वीं शताब्दी से चली आ रही है यह अनोखी तकनीक

जाली वास्तुकला का इतिहास बेहद पुराना है। इसके प्रमाण 8वीं शताब्दी के एलोरा के कैलाश मंदिर और पट्टदकल के मंदिरों में मिलते हैं। बाद में मुगल शासकों ने फारसी ज्यामितीय डिजाइनों और भारतीय शिल्पकला का सुंदर मेल कर इसे नई पहचान दी, लेकिन इस कला की शुरुआत उनसे काफी पहले हो चुकी थी।

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