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history of bubble wrap: बबल रैप का मजा हर कोई लेता है, लेकिन क्या आप जानते हैं इसकी असली कहानी

history of bubble wrap: बबल रैप की प्रसिद्धि का एक बड़ा कारण इसका साइकोलॉजिकल प्रभाव भी है। शोध बताते हैं कि बुलबुलों को फोड़ते समय होने वाली आवाज और उंगलियों पर दबाव डालना तनाव कम करने में मदद करता है। यही वजह है कि लोग इसे फोड़ने का मजा लेते हुए रिलैक्स महसूस करते हैं

Edited By: Anchal Jhaअपडेटेड Mar 19, 2026 पर 12:38 PM
history of bubble wrap: बबल रैप का मजा हर कोई लेता है, लेकिन क्या आप जानते हैं इसकी असली कहानी
 history of bubble wrap: आईबीएम ने समझा कि हवा भरे बुलबुले कंप्यूटर के लिए आदर्श कुशन हैं।

ऑनलाइन पार्सल खोलते समय हम सभी को वह बबल रैप बेहद मजेदार लगता है, जिसे फोड़ना लगभग आदत बन गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह मजेदार और उपयोगी चीज वैज्ञानिक असफलता का नतीजा थी? हाँ, जिस बबल रैप को आज हम पैकेजिंग का सबसे भरोसेमंद साधन मानते हैं, उसे कभी दीवारों की शोभा बढ़ाने के लिए बनाया गया था। साल 1957 में अमेरिकी इंजीनियर अल्फ्रेड फील्डिंग और मार्क चवनेस ने प्लास्टिक वॉलपेपर बनाने का प्रयोग किया। उनका इरादा था कि दीवारों पर आधुनिक और टेक्सचर्ड डिज़ाइन लगे। लेकिन प्रयोग के दौरान दो प्लास्टिक शीट्स के बीच हवा फंस गई, और शीट बुलबुले वाली निकल आई। वॉलपेपर के तौर पर यह पूरी तरह फेल साबित हुआ।

हालांकि, यही असफलता आगे चलकर बुलबुले वाला प्लास्टिक ऑनलाइन पार्सल और नाजुक सामान की दुनिया में क्रांति लेकर आया। इसे देखकर आईबीएम जैसे बड़े ब्रांडों ने इसे कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक सामान के लिए आदर्श कुशन माना, और यहीं से बबल रैप की कहानी और सफलता की उड़ान शुरू हुई

1957: गलती से हुआ आविष्कार

बबल रैप की कहानी शुरू होती है 1957 में, जब अमेरिकी इंजीनियर अल्फ्रेड फील्डिंग और मार्क चवनेस न्यू जर्सी के एक गैरेज में प्रयोग कर रहे थे। उनका मकसद था ऐसा प्लास्टिक वॉलपेपर बनाना जिसमें उभार या टेक्सचर हो, ताकि दीवारों पर आधुनिक लुक आए।

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